प्रवीण कुमार
उदयपुर केवल राजा-महाराजाओं के किलों और महलों के लिए ही नहीं, बल्कि झीलों, पहाड़ियों और हरियाली के लिए भी अपनी अलग पहचान रखता है. लेकिन शहर के उत्तरी हिस्से में बसा सुखेर गांव इस पहचान के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करता है. अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसा यह इलाका कभी खेतों, पेड़-पौधों, खुले भू-भाग और मौसमी जलधाराओं से घिरा शांत ग्रामीण क्षेत्र था. यहां जमीन केवल खेती का आधार नहीं थी, बल्कि वह स्थानीय पारिस्थितिकी, जल संचयन और ग्रामीण जीवन की पूरी व्यवस्था को संभाले हुए थी.
तेजी से फैलते उदयपुर ने सुखेर की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है. पर्यटन के विस्तार, शहर में बढ़ती जमीन की कीमतों और आवासीय जरूरतों ने निर्माण को शहर की सीमाओं से बाहर तक पहुंचा दिया. धीरे-धीरे खेतों की जगह मकानों और कॉलोनियों ने लेनी शुरू कर दी. जिस जमीन पर कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब कंक्रीट की दीवारें और निर्माणाधीन इमारतें दिखाई देने लगी हैं. यह बदलाव सिर्फ भूमि उपयोग का परिवर्तन नहीं है, बल्कि इसके साथ उस प्राकृतिक व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ रहा है, जिस पर गांव का जीवन लंबे समय से निर्भर रहा है.
शहरी विस्तार का सबसे बड़ा असर पानी पर दिखाई देता है. आबादी बढ़ती है तो घरेलू जरूरतें बढ़ती हैं, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पानी की मांग बढ़ती है और निर्माण के साथ प्राकृतिक जमीन का क्षेत्र घटता जाता है. इसका सीधा दबाव भूजल पर पड़ता है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2023 के आकलन में उदयपुर शहरी क्षेत्र में भूजल दोहन उपलब्ध वार्षिक निकासी योग्य संसाधन के लगभग 99.86 प्रतिशत तक दर्ज किया गया था. यह आंकड़ा बताता है कि शहर और उसके आसपास भूजल पर निर्भरता किस गंभीर स्तर तक पहुंच चुकी है.
राजस्थान की व्यापक स्थिति भी चिंता बढ़ाती है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के मई 2025 के आकलन में अगस्त 2024 से मई 2025 के बीच विश्लेषित 972 निगरानी केंद्रों में से 76 प्रतिशत पर जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई. ऐसे समय में शहर के आसपास मौजूद खुले भू-भाग का तेजी से निर्माण क्षेत्र में बदलना भविष्य की जल सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत है. खेत और खाली जमीन बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जब यही जमीन सीमेंट और डामर से ढक जाती है तो भूजल पुनर्भरण की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है.
सुखेर के आसपास औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार इस चिंता को और बढ़ाता है. उद्योग किसी भी क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक अवसर लेकर आते हैं, लेकिन विकास का लाभ तभी व्यापक माना जा सकता है जब उसके साथ पर्यावरणीय संतुलन भी कायम रहे. सुखेर औद्योगिक क्षेत्र में ई-कचरा प्रबंधन से जुड़ी अधिकृत इकाइयों का सरकारी रिकॉर्ड मौजूद है. इससे पता चलता है कि यह इलाका अब केवल ग्रामीण गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहां आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों का दायरा भी बढ़ चुका है.
शहरीकरण का एक दूसरा दबाव कचरे का है. उदयपुर नगर निकाय क्षेत्र में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है. राजस्थान सरकार के 2025 के अनुपालन संबंधी आंकड़ों में नगर निकाय क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 279.12 टन ठोस कचरा पैदा होने का अनुमान दर्ज किया गया है. यदि कचरे के प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था उसी गति से विकसित नहीं होती जिस गति से शहर फैल रहा है, तो इसका प्रभाव आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचना स्वाभाविक है.
कचरा केवल शहर की सुंदरता का प्रश्न नहीं है. प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट खुले क्षेत्रों में पहुंचने पर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं और बरसात के दौरान जलस्रोतों तक भी पहुंच सकते हैं. सुखेर जैसे क्षेत्रों में जहां प्राकृतिक भू-भाग लगातार कम हो रहा है, वहां कचरे और निर्माण का दोहरा दबाव स्थानीय पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकता है.
सुखेर की स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह क्षेत्र न तो पूरी तरह गांव रह गया है और न ही शहर का हिस्सा बनने के बाद उसे शहरी सुविधाओं और पर्यावरणीय प्रबंधन की पूरी व्यवस्था मिली है. खेत घट रहे हैं, मकान बढ़ रहे हैं, सड़कें और वाहन बढ़ रहे हैं तथा औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है. इस बदलाव के बीच बरसाती पानी के प्राकृतिक रास्तों के बाधित होने, खुले क्षेत्रों के कम होने और भूजल पुनर्भरण की जमीन घटने का खतरा लगातार बढ़ रहा है.
उदयपुर जैसे शहर के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी पहचान ही प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है. झीलें, अरावली की पहाड़ियां और आसपास के हरित क्षेत्र केवल पर्यटन की तस्वीर का हिस्सा नहीं हैं. ये शहर के पर्यावरणीय संतुलन के भी महत्वपूर्ण आधार हैं. यदि शहर का विस्तार आसपास के गांवों की प्राकृतिक संरचना को लगातार कमजोर करता रहा तो इसका असर भविष्य में पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
इसका समाधान विकास को रोकना नहीं है. उदयपुर को आवास चाहिए, रोजगार चाहिए, उद्योग चाहिए और बेहतर सुविधाएं भी चाहिए. सवाल यह है कि इन जरूरतों को पूरा करने का तरीका क्या हो. गांव की हर खाली जमीन को केवल भविष्य की निर्माण भूमि मान लेना दूरदर्शी विकास नहीं कहा जा सकता. विकास योजनाओं में कृषि भूमि, जलस्रोत, प्राकृतिक नाले, बरसाती जलधाराएं, हरित क्षेत्र और भूजल पुनर्भरण वाले इलाकों की स्पष्ट पहचान और सुरक्षा जरूरी है.
सुखेर जैसे क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन को केवल भवन निर्माण की औपचारिक शर्त बनाने के बजाय स्थानीय जल व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. भूजल दोहन की नियमित निगरानी होनी चाहिए और प्राकृतिक जल प्रवाह वाले क्षेत्रों में निर्माण को लेकर स्पष्ट नियम होने चाहिए. औद्योगिक इकाइयों की पर्यावरणीय निगरानी भी नियमित हो और कचरे के निस्तारण की व्यवस्था कागजों के बजाय जमीन पर दिखाई दे, तभी विकास का वास्तविक लाभ सामने आएगा.
इस बदलाव में स्थानीय लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. वर्षों से इस इलाके में रहने वाले लोग जमीन, पानी, पेड़ों और मौसम के बदलाव को सबसे करीब से महसूस करते हैं. उनकी जानकारी को विकास योजनाओं में शामिल किया जाए तो कई ऐसे पर्यावरणीय खतरे समय रहते पहचाने जा सकते हैं, जो सरकारी आंकड़ों में बाद में दिखाई देते हैं.
सुखेर की कहानी केवल उदयपुर के एक गांव की कहानी नहीं है. यह उन तमाम गांवों की तस्वीर है जो तेजी से फैलते शहरों की सीमा पर खड़े हैं. शहर की जरूरतें जैसे-जैसे बढ़ती हैं, उसकी नजर आसपास की जमीन पर जाती है. खेत धीरे-धीरे कॉलोनियों में बदलते हैं, खुले क्षेत्र निर्माण स्थल बनते हैं और प्राकृतिक जलधाराएं रास्तों तथा इमारतों के बीच अपना रास्ता खोने लगती हैं.
विकास के आंकड़ों में यह विस्तार उपलब्धि की तरह दिखाई दे सकता है, लेकिन जमीन पर इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उदयपुर कितना फैलेगा, बल्कि यह भी है कि फैलते हुए शहर के बीच कितना प्राकृतिक उदयपुर बचा रहेगा.
आने वाले समय में विकास की असली कसौटी नई इमारतों और नई सड़कों की संख्या नहीं होगी. यह भी देखा जाएगा कि कितनी मिट्टी बची, कितने पेड़ सुरक्षित रहे, कितने जलस्रोत बचे और बारिश का कितना पानी जमीन के भीतर पहुंच सका. सुखेर आज इसी संतुलन के सामने खड़ा है. यदि विकास की रफ्तार हरियाली, पानी और मिट्टी को पीछे छोड़ देगी तो कंक्रीट का विस्तार जरूर दिखाई देगा, लेकिन उसके भीतर जीवन का प्राकृतिक आधार लगातार कमजोर होता जाएगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

