भोपाल. मध्य प्रदेश के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की करीब 10.99 करोड़ रुपये की कंप्यूटर, प्रिंटर और यूपीएस खरीद अब आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच के दायरे में है. जांच एजेंसी ने प्रथम दृष्टया आरोप लगाया है कि जेम पोर्टल पर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती दिखाई देने वाली चार फर्मों के पीछे एक ही व्यक्ति का नियंत्रण था. आरोप है कि आपसी मुकाबले का दिखावा कर सरकारी टेंडर हासिल किया गया और इसके बाद पुराने तथा निर्धारित गुणवत्ता से अलग उपकरणों की आपूर्ति के साथ कुछ सामान के लिए बाजार या जेम दर से कहीं अधिक भुगतान कराया गया. इसी जांच के आधार पर ईओडब्ल्यू ने 1 सितंबर 2026 को चार नामजद आरोपितों और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया है.
मामला शिवम यादव और विनय रायकरवार के आवेदनों पर की गई शिकायत की जांच से सामने आया. जांच में मेसर्स साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, मेसर्स शांति ट्रेडर्स, मेसर्स एचटीएम इंडिया और मेसर्स सूरज इंटरप्राइजेज की भूमिका पर सवाल उठे. ईओडब्ल्यू के अनुसार इन फर्मों के दस्तावेज और संपर्क विवरण ऐसे पाए गए, जिनसे इनके बीच कारोबारी संबंधों के बजाय एक ही नियंत्रण की आशंका मजबूत हुई. जांच में शांति ट्रेडर्स के जीएसटी रिकॉर्ड में दर्ज मोबाइल नंबर साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के नंबर से समान पाया गया. एचटीएम इंडिया की ईमेल पहचान भी साईबाबा कंपनी के नाम से जुड़ी मिली. इतना ही नहीं, एचटीएम इंडिया ने जीएसटी में जो दूसरा कार्यालय पता दर्ज कराया था, वह साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के पते से ही मेल खाता था.
जांच एजेंसी ने मोबाइल नंबर के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज भी खंगाले. उसके अनुसार संबंधित मोबाइल नंबर के लिए कंपनी के रिकॉर्ड में रणधीर कुमार पटेल का नाम और आधार कार्ड दर्ज मिला. यही व्यक्ति साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से संबंधित बताया गया है. जांच का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चारों फर्मों के केवल इसी टेंडर में साथ दिखाई देने की बात नहीं कही गई है, बल्कि जेम पोर्टल के दूसरे टेंडरों में भी इनके बार-बार एक साथ बोली लगाने की जानकारी सामने आई. जांच के मुताबिक कई मौकों पर इनके बीच बोली की दरों में मामूली अंतर रहा और ठेका बारी-बारी से इन्हीं फर्मों में से किसी एक को मिलता रहा.
ईओडब्ल्यू की जांच में 15 अक्टूबर 2024 का एक पत्र भी महत्वपूर्ण माना गया है. शांति ट्रेडर्स ने अपने लेटरहेड पर विभाग को टेंडर से संबंधित पत्र दिया था. जांच एजेंसी के अनुसार यह दस्तावेज इस आरोप की कड़ी बनता है कि एक ही नियंत्रण वाली दूसरी फर्म ने अलग बोलीदाता के रूप में सामने आकर टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया. हालांकि इस आरोप का अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा.
सामान की आपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों ने भी जांच को नया आधार दिया. जांच के दौरान संबंधित विनिर्माता कंपनियों से प्राप्त जानकारी में सामने आया कि बेस्ट पावर इक्विपमेंट्स ने इस टेंडर के लिए चारों फर्मों को एक ही सामान के अलग-अलग अधिकृत पत्र दिए थे, जबकि एसर इंडिया के रिकॉर्ड में तीन फर्मों के लिए अधिकृत पत्र जारी होने की जानकारी बताई गई. इससे जांच एजेंसी ने इस बात की पड़ताल की कि जो कंपनियां टेंडर में एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी थीं, वे समान सामान की बिक्री के लिए किस तरह अधिकृत थीं.
सूरज इंटरप्राइजेज से जुड़ा मामला भी जांच में खास तौर पर सामने आया. फर्म ने जेम पोर्टल पर एसर वेरिटॉन जेड4694जी मॉडल के लिए अधिकृत विक्रेता का दर्जा हासिल किया था, लेकिन एसर इंडिया के रिकॉर्ड में इस फर्म को अधिकृत पत्र दिए जाने का उल्लेख नहीं मिला. ईओडब्ल्यू ने इसे संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त किया गया दर्जा माना है. इसी फर्म द्वारा टेंडर की जमा राशि के रूप में बैंक ऑफ इंडिया का जो चेक दिया गया था, उस पर खाता संख्या तक दर्ज नहीं होने की बात जांच में सामने आई.
सबसे गंभीर सवाल कंप्यूटरों की आपूर्ति को लेकर सामने आया. विभाग को दिए गए कंप्यूटरों के संबंध में कंपनी के वारंटी रिकॉर्ड में स्थापना की तारीख 22 जुलाई 2024 दर्ज मिली, जबकि विभाग की खरीद प्रक्रिया 23 सितंबर 2024 के टेंडर के बाद हुई थी. जांच एजेंसी ने इसे इस आशंका से जोड़ा कि पहले से इस्तेमाल या स्थापित कंप्यूटरों को बाद में नई खरीद के रूप में विभाग को दिया गया. यानी जिस सामान की खरीद नई आपूर्ति के तौर पर हुई, उसका उपयोग टेंडर से करीब दो महीने पहले ही दर्ज था.
विभाग की अपनी जांच समिति द्वारा कंप्यूटर खोलकर किए गए परीक्षण में भी कथित विसंगतियां मिलीं. समिति को निर्धारित शर्तों से अलग रैम और एसर की जगह किसी स्थानीय कंपनी की एसएसडी लगी होने की जानकारी मिली. इसी आधार पर समिति ने साईबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश भी की थी. यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आपूर्ति किए गए उपकरणों की वास्तविक तकनीकी गुणवत्ता तक पहुंच गया.
यूपीएस की खरीद ने जांच में कीमत को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया. प्रेस ब्रीफ के अनुसार जिस यूपीएस की कीमत जेम पोर्टल पर 3,754 रुपये बताई गई थी, उसी के लिए विभाग ने 11,247 रुपये प्रति यूनिट भुगतान किया. यानी जेम पर उपलब्ध कीमत के मुकाबले भुगतान लगभग तीन गुना रहा. वहीं डिब्बे पर छपी कीमत 6,086 रुपये थी. इसके साथ मॉडल नंबर को लेकर भी विसंगति मिली. निर्माता साइबर पावर ने जांच में बताया कि दस्तावेजों में दर्ज यूटी1200ई मॉडल इस टेंडर में उसके द्वारा दिया ही नहीं गया था. जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि वास्तविक मॉडल के बजाय अलग मॉडल नंबर दर्ज कर अधिक कीमत का आधार तैयार किया गया.
इन सभी बिंदुओं को जोड़ते हुए ईओडब्ल्यू ने रणधीर कुमार पटेल, हेमलता पटेल, अशोक कुमार सिंह और देवेंद्र सिंह सहित अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 61(2), 318(4), 336(3) और 340(2) के तहत अपराध क्रमांक 93/2026 दर्ज किया है. मामला अब विवेचना में है.
जांच की दिशा से साफ है कि आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ केवल टेंडर जीतने वाली फर्मों के आपसी संबंधों की पड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि बोली प्रक्रिया, अधिकृत विक्रेता के दस्तावेज, आपूर्ति किए गए उपकरणों की वास्तविक स्थिति, वारंटी रिकॉर्ड और भुगतान की दरों को भी एक साथ देख रहा है. यदि जांच में लगाए गए आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह मामला सरकारी खरीद में प्रतिस्पर्धा की विश्वसनीयता और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, दोनों पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा. फिलहाल एफआईआर दर्ज होना आरोपों की अंतिम पुष्टि नहीं है और मामले में आगे की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही दोष तय होगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

