महिला आयोग के पास मुआवजा तय करने या प्रोजेक्ट रोकने का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

महिला आयोग के पास मुआवजा तय करने या प्रोजेक्ट रोकने का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

प्रेषित समय :15:49:04 PM / Thu, Sep 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि राज्य महिला आयोग की भूमिका सलाहकार और सिफारिशी प्रकृति की है. आयोग के पास पक्षों के अधिकार या दायित्व तय करने, मुआवजा बढ़ाने, प्राथमिकी (FIR) दर्ज करवाने या किसी परियोजना के काम को रोकने जैसे बाध्यकारी आदेश जारी करने का क्षेत्राधिकार नहीं है.

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) की ओर से दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य महिला आयोग के तीन आदेशों (19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026) को असंवैधानिक और अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया.

क्या था मामला?
गेल द्वारा 'पेट्रोलियम एवं मिनरल्स पाइपलाइंस अधिनियम, 1962' के तहत वैधानिक प्रक्रिया पूरी कर गैस पाइपलाइन बिछाने का काम किया जा रहा था, जिसके लिए सक्षम प्राधिकारी ने मुआवजा भी तय कर दिया था. इसके बावजूद, राज्य महिला आयोग ने मामले में दखल देते हुए मुआवजा राशि बढ़ाने, अधिकारियों पर एफआईआर कराने और पाइपलाइन निर्माण कार्य रोकने का निर्देश दिया था. गेल ने इन आदेशों को कानूनी चुनौती दी थी.

आयोग न्यायिक संस्था नहीं: हाई कोर्ट
उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि महिला आयोग कोई न्यायिक प्राधिकरण नहीं है. आयोग महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए संबंधित अधिकारियों को उपचारात्मक कदमों की सिफारिश कर सकता है, लेकिन वह अदालतों की तरह विवादों पर अंतिम न्यायिक फैसला नहीं दे सकता.

अदालत ने अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय के दो प्रमुख फैसलों 'भवानी प्रसाद जेना बनाम उड़ीसा राज्य महिला आयोग' और 'मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स'-का हवाला दिया. शीर्ष अदालत ने इन मामलों में साफ किया था कि साक्ष्य जुटाने या जांच करने की शक्ति का अर्थ यह नहीं है कि आयोग कोई बाध्यकारी आदेश पारित कर सके.

फैसला
कोर्ट ने माना कि छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग ने अपनी वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है. इस आधार पर अदालत ने आयोग द्वारा पारित तीनों आदेशों को रद्द करते हुए गेल की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया.

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