भारत ने स्वदेशी महासागर अनुसंधान पोत सागर मंथन किया लॉन्च, गहरे समुद्र की खोज को मिलेगा नया आधार

भारत ने स्वदेशी महासागर अनुसंधान पोत सागर मंथन किया लॉन्च, गहरे समुद्र की खोज को मिलेगा नया आधार

प्रेषित समय :22:05:22 PM / Wed, Sep 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

कोलकाता. भारत ने गहरे समुद्र की खोज, महासागरीय विज्ञान और समुद्री अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बुधवार को स्वदेशी महासागर अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ को लॉन्च किया. यह पोत नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च (एनसीपीओआर) के लिए तैयार किया जा रहा है. करीब 840 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को भारत की गहरे समुद्र की खोज और वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता के विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

समुद्र की गहराइयों में अनुसंधान की दिशा में बड़ा कदम
‘सागर मंथन’ का लॉन्च ऐसे समय हुआ है जब समुद्र और महासागर से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान का महत्व लगातार बढ़ रहा है. महासागर केवल समुद्री परिवहन और व्यापार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि जलवायु, समुद्री पारिस्थितिकी, प्राकृतिक संसाधनों और पृथ्वी की वैज्ञानिक समझ के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं.

स्वदेशी स्तर पर तैयार किया जा रहा यह अनुसंधान पोत भारत को समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपनी क्षमता विकसित करने में मदद करेगा. इसके माध्यम से देश की समुद्री अनुसंधान गतिविधियों को एक समर्पित प्लेटफॉर्म मिलने की उम्मीद है.

एनसीपीओआर के लिए तैयार हो रहा है पोत
‘सागर मंथन’ का निर्माण राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र के लिए किया जा रहा है. एनसीपीओआर भारत में ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियों का प्रमुख संस्थान है.

इस पोत का निर्माण और लॉन्च भारत की वैज्ञानिक संस्थाओं तथा स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता के बीच सहयोग को भी रेखांकित करता है. जहाज निर्माण क्षेत्र में देश की बढ़ती आत्मनिर्भरता के बीच वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए विशेष पोत तैयार होना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है.

840 करोड़ रुपये की परियोजना
सरकारी अधिकारी के हवाले से दी गई जानकारी के अनुसार इस अनुसंधान पोत की परियोजना की लागत करीब 840 करोड़ रुपये है. इतनी बड़ी लागत वाली परियोजना से स्पष्ट है कि यह केवल एक सामान्य समुद्री जहाज नहीं, बल्कि देश की दीर्घकालिक महासागरीय अनुसंधान जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा पोत है.

इस परियोजना का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि भारत समुद्री क्षेत्र में अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को लगातार विस्तारित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. स्वदेशी पोत का निर्माण इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है.

2028 की शुरुआत तक इस्तेमाल के लिए तैयार होने की उम्मीद
सरकारी अधिकारी ने बताया कि ‘सागर मंथन’ के 2028 की शुरुआत तक इस्तेमाल के लिए तैयार होने की उम्मीद है. यानी लॉन्च के बाद भी पोत को अंतिम रूप देने और उपयोग में लाने की प्रक्रिया आगे जारी रहेगी.

जहाज का लॉन्च निर्माण प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसके बाद परीक्षण, आवश्यक तकनीकी तैयारियां और परिचालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी की जानी होंगी. इसके बाद ही पोत को नियमित वैज्ञानिक गतिविधियों में लगाया जा सकेगा.

गहरे समुद्र की खोज में बढ़ेगी क्षमता
भारत के लिए महासागर अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण पक्ष गहरे समुद्र की वैज्ञानिक खोज है. समुद्र की गहराइयों में ऐसी अनेक प्रक्रियाएं और परिस्थितियां मौजूद हैं, जिनका अध्ययन पृथ्वी के पर्यावरण, समुद्री जीवन और प्राकृतिक संसाधनों को समझने के लिए जरूरी है.

ऐसे में आधुनिक अनुसंधान पोत वैज्ञानिकों को समुद्र में जाकर अध्ययन करने के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं. ‘सागर मंथन’ के माध्यम से भारत की गहरे समुद्र से संबंधित अनुसंधान क्षमता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

यह परियोजना देश के समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश के तौर पर भी देखी जा सकती है. वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अपने पोत का होना भारत को समुद्री अध्ययन के लिए बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है.

समुद्री विज्ञान के लिए स्वदेशी प्लेटफॉर्म
‘सागर मंथन’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका स्वदेशी निर्माण है. भारत में ही इसका निर्माण किया जाना देश के जहाज निर्माण उद्योग और वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच बढ़ते तालमेल को दर्शाता है.

कोलकाता स्थित जीआरएसई लंबे समय से जहाज निर्माण क्षेत्र में काम कर रहा है. ऐसे में महासागर अनुसंधान के लिए विशेष पोत का निर्माण देश की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता को वैज्ञानिक जरूरतों से जोड़ता है.

इस तरह यह परियोजना दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है—एक ओर भारत की जहाज निर्माण क्षमता का प्रदर्शन और दूसरी ओर महासागरीय अनुसंधान के लिए देश की वैज्ञानिक जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम.

ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान को मिलेगा आधार
एनसीपीओआर की भूमिका को देखते हुए ‘सागर मंथन’ का उपयोग भारत के महासागरीय अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है. महासागर और ध्रुवीय क्षेत्र पृथ्वी की जलवायु प्रणाली से गहराई से जुड़े हुए हैं.

महासागरों में होने वाले बदलावों को समझना वैज्ञानिकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समुद्री परिस्थितियों का असर व्यापक पर्यावरणीय प्रक्रियाओं पर पड़ता है. ऐसे में अनुसंधान पोतों की मदद से समुद्र से संबंधित वैज्ञानिक आंकड़े और अध्ययन जुटाने की क्षमता बढ़ती है.

‘सागर मंथन’ का निर्माण इसी आवश्यकता के संदर्भ में भारत की अनुसंधान अवसंरचना को मजबूत करने वाला कदम है.

समुद्री अनुसंधान में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत
भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ समुद्री विज्ञान भी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. समुद्र के संसाधनों और पर्यावरण को समझने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों और अनुसंधान सुविधाओं की आवश्यकता होती है.

स्वदेशी अनुसंधान पोत इस दिशा में आधारभूत क्षमता विकसित करते हैं. इससे वैज्ञानिकों को समुद्र में लंबे समय तक अनुसंधान गतिविधियां संचालित करने के लिए आवश्यक प्लेटफॉर्म मिल सकता है.

‘सागर मंथन’ का निर्माण इसलिए केवल जहाज निर्माण परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता. यह देश की वैज्ञानिक क्षमता, स्वदेशी तकनीकी दक्षता और महासागरीय अनुसंधान के विस्तार से जुड़ी परियोजना है.

कोलकाता से समुद्री अनुसंधान के नए अध्याय की शुरुआत
बुधवार को कोलकाता में आयोजित लॉन्च समारोह ने इस परियोजना को औपचारिक रूप से एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंचा दिया. रिषि बंकिम शिपयार्ड में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यार्ड 3041 को आधिकारिक रूप से ‘ओआरवी सागर मंथन’ नाम दिया गया.

इस लॉन्च के साथ अब परियोजना का अगला चरण शुरू होगा. 2028 की शुरुआत तक इसके उपयोग के लिए तैयार होने की उम्मीद है. इसके बाद यह पोत भारत के महासागरीय अनुसंधान कार्यक्रमों में अपनी भूमिका निभा सकेगा.

समुद्र से जुड़े भविष्य के सवालों की तलाश
महासागर अनुसंधान आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है. जलवायु परिवर्तन, समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री संसाधनों और गहरे समुद्र की वैज्ञानिक समझ से जुड़े सवालों के जवाब खोजने के लिए लगातार नए अनुसंधान की आवश्यकता है.

ऐसे में ‘सागर मंथन’ भारत के लिए एक ऐसा वैज्ञानिक मंच बनने की दिशा में बढ़ रहा है, जो समुद्र की गहराइयों तक अनुसंधान की पहुंच को मजबूत कर सकता है. 840 करोड़ रुपये की इस परियोजना का वास्तविक महत्व इसके समुद्री विज्ञान और गहरे समुद्र के अध्ययन में उपयोग शुरू होने के बाद सामने आएगा.

फिलहाल इसका लॉन्च भारत के लिए इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि देश ने महासागर अनुसंधान के लिए एक और स्वदेशी क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. 2028 की शुरुआत तक इसके परिचालन में आने की उम्मीद के साथ भारत की समुद्री वैज्ञानिक यात्रा को एक नई ताकत मिलने की संभावना है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-