पुलिस अधिकारी ने जो कहा वही छापना मानहानि नहीं, रिपोर्टर पर आपराधिक केस को झारखंड हाई कोर्ट ने ठहराया गलत

पुलिस अधिकारी ने जो कहा वही छापना मानहानि नहीं, रिपोर्टर पर आपराधिक केस को झारखंड हाई कोर्ट ने ठहराया गलत

प्रेषित समय :19:38:41 PM / Thu, Sep 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

रांची. झारखंड हाई कोर्ट ने पत्रकारिता और समाचार प्रकाशन से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई रिपोर्टर किसी पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी और बयान के आधार पर खबर प्रकाशित करता है, तो केवल खबर प्रकाशित करने के आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक मानहानि की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती. अदालत ने कहा कि रिपोर्टर ने यदि अधिकारी के बयान को ही समाचार के रूप में प्रकाशित किया है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला चलाने का आधार नहीं बनता.

न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने देवघर के एक मामले में यह टिप्पणी की. अदालत ने सेशन कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया गया था. इसके साथ ही संबंधित अपील खारिज कर दी गई.

खबर में पुलिस अधिकारी का बयान था
मामला देवघर स्थित ए.एस. कॉलेज से जुड़ा था. शिकायतकर्ता कॉलेज में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत था. उसका आरोप था कि एक समाचार पत्र में उसके संबंध में ऐसी खबर प्रकाशित की गई, जिसमें उसके निलंबन और तत्कालीन प्राचार्य डॉ. एच. नारायण के कार्यकाल में उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की बात कही गई थी.

शिकायतकर्ता ने दावा किया कि इस खबर के प्रकाशन से समाज में उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई और उसे मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा. इसी आधार पर उसने आपराधिक मानहानि की शिकायत की थी.

ट्रायल कोर्ट ने मामले में प्रतिवादी संख्या 2 से 4 को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत दोषी ठहराते हुए एक वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई थी. हालांकि, बाद में सेशन कोर्ट ने इस सजा को रद्द कर दिया. इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा.

फर्जी प्रमाणपत्र से दाखिले की खबर
हाई कोर्ट ने संबंधित समाचार रिपोर्ट का भी परीक्षण किया. रिपोर्ट में देवघर के तत्कालीन एसडीपीओ विपुल शुक्ला का बयान प्रकाशित किया गया था.

पुलिस अधिकारी के अनुसार, बीए और बीकॉम में प्रवेश के लिए जाली प्रमाणपत्र जमा किए गए थे और कुछ लोगों को इन प्रमाणपत्रों के आधार पर हुए अवैध दाखिलों के लिए जिम्मेदार पाया गया था.

अदालत ने देखा कि समाचार में हेड क्लर्क की भूमिका और उसके कामकाज से जुड़ी जानकारी भी दी गई थी. अदालत के अनुसार, समाचार का यह हिस्सा उन मामलों में हेड क्लर्क की भूमिका से संबंधित था, जिनमें कथित रूप से फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर दाखिले किए गए थे.

रिपोर्टर ने अपनी ओर से आरोप नहीं लगाया
मामले में रिपोर्टर की भूमिका को लेकर हाई कोर्ट ने विशेष रूप से ध्यान दिया. अदालत ने पाया कि संबंधित रिपोर्टर ने पुलिस अधिकारी के बयान को समाचार के रूप में प्रकाशित किया था.

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शिकायतकर्ता ने उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ मानहानि की कोई कार्रवाई नहीं की थी, जिसके बयान को समाचार में प्रकाशित किया गया था.

यही तथ्य रिपोर्टर की भूमिका तय करने में महत्वपूर्ण रहा. अदालत ने माना कि रिपोर्टर का काम उपलब्ध जानकारी को समाचार के रूप में प्रकाशित करना था और जब खबर में पुलिस अधिकारी का बयान स्पष्ट रूप से मौजूद था, तो केवल उसके प्रकाशन के आधार पर रिपोर्टर को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

खबर प्रकाशित करना पत्रकार के काम का हिस्सा
हाई कोर्ट ने रिपोर्टर के संबंध में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि वह केवल रिपोर्टर था और उसने एसडीपीओ द्वारा कही गई बात को प्रकाशित किया. अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में रिपोर्टर पर आपराधिक जिम्मेदारी डालने का आधार नहीं बनता.

इस टिप्पणी का महत्व इसलिए है क्योंकि समाचार रिपोर्टिंग में पत्रकार अक्सर पुलिस, प्रशासन, जांच अधिकारियों या अन्य अधिकृत स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर घटनाओं की खबर प्रकाशित करते हैं. यदि किसी अधिकारी के बयान को रिपोर्ट करते समय पत्रकार ने उसे अपने तथ्य के रूप में गढ़कर पेश नहीं किया है, तो उसकी भूमिका और मूल बयान देने वाले व्यक्ति की भूमिका को अलग-अलग देखना जरूरी है.

मानहानि के आरोप पर अदालत की कसौटी
अदालत ने मामले में प्रकाशित खबर और संबंधित परिस्थितियों को देखते हुए सेशन कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं मानी. खंडपीठ ने अपील खारिज कर दी.

इस तरह रिपोर्टर के खिलाफ आपराधिक मानहानि की कार्रवाई को आगे बढ़ाने का रास्ता बंद हो गया. अदालत ने यह नहीं कहा कि पत्रकारों को किसी भी प्रकार की खबर प्रकाशित करने पर मानहानि से पूर्ण छूट प्राप्त है. बल्कि इस मामले में रिपोर्टर की वास्तविक भूमिका, समाचार का स्रोत और प्रकाशित सामग्री की प्रकृति महत्वपूर्ण रही.

अर्थात यदि कोई पत्रकार जानबूझकर किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी और अपमानजनक सामग्री तैयार करता है या उसे तथ्य के रूप में प्रकाशित करता है, तो स्थिति अलग हो सकती है. लेकिन किसी सक्षम पुलिस अधिकारी के बयान को समाचार के रूप में प्रकाशित करने मात्र से रिपोर्टर पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती.

पत्रकारिता में स्रोत और प्रस्तुति की अहमियत
फैसले से पत्रकारिता के लिए एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि समाचार के स्रोत और उसकी प्रस्तुति दोनों का महत्व होता है. पुलिस अधिकारी ने क्या कहा, रिपोर्टर ने उसे किस रूप में प्रकाशित किया और क्या रिपोर्ट में उसे अधिकारी के बयान के तौर पर स्पष्ट किया गया था—इन सभी पहलुओं को देखकर ही जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.

देवघर के इस मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि रिपोर्टर ने एसडीपीओ के बयान को ही प्रकाशित किया था. इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक मानहानि की जिम्मेदारी तय करने का आधार नहीं था.

खंडपीठ ने सेशन कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी. लंबित अंतरिम अर्जियां भी समाप्त कर दी गईं.

मामला बिमलेंदु नारायण बल्ल बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य से संबंधित था.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-