अहमदाबाद. गुजरात विधानसभा ने शुक्रवार को गुजरात किराया विधेयक 2026 को सर्वसम्मति से पारित कर दिया. नए कानून का उद्देश्य मकान मालिक और किरायेदार दोनों के अधिकारों को स्पष्ट करना, किराये के मकानों की व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और किराये से जुड़े विवादों के त्वरित निपटारे के लिए अलग न्यायिक व्यवस्था तैयार करना है. नए प्रावधानों के तहत सुरक्षा जमा यानी सिक्योरिटी डिपॉजिट तीन महीने के किराये से अधिक नहीं लिया जा सकेगा.
शहरी विकास मंत्री कनुभाई देसाई ने विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा कि गुजरात में अब तक 1947 के मुंबईकालीन किराया कानून के आधार पर व्यवस्था चल रही थी. समय-समय पर इसमें बदलाव और विस्तार किए जाने के कारण मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच कई कानूनी उलझनें पैदा होती रही हैं. नए कानून का उद्देश्य दोनों पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना है.
लिखित समझौता जरूरी
नए कानून के लागू होने के बाद गुजरात में किसी भी परिसर को किराये पर देने के लिए लिखित किराया समझौता अनिवार्य होगा. मकान मालिक और किरायेदार को समझौता होने के दो महीने के भीतर इसकी जानकारी किराया प्राधिकरण को संयुक्त रूप से देनी होगी.
यदि दोनों पक्ष निर्धारित अवधि में जानकारी नहीं देते हैं तो उन्हें अगले एक महीने के भीतर अलग-अलग इसकी सूचना देनी होगी. किराया प्राधिकरण के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा. प्रत्येक किराया समझौते को एक विशिष्ट पहचान संख्या दी जाएगी और उससे संबंधित विवरण वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाएगा.
तीन महीने से ज्यादा सुरक्षा जमा नहीं
किरायेदारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में सुरक्षा जमा की अधिकतम सीमा तय करना है. नए कानून के तहत मकान मालिक तीन महीने के किराये से अधिक सिक्योरिटी डिपॉजिट नहीं ले सकेगा.
किरायेदार द्वारा मकान खाली कर कब्जा वापस करने के बाद सुरक्षा राशि एक महीने के भीतर लौटानी होगी. हालांकि, कानून के अनुसार वैध कटौती की जा सकेगी. किराये की राशि भी वही मानी जाएगी, जो लिखित समझौते में दर्ज होगी.
अवधि खत्म होने पर दोगुना किराया
यदि किराया समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद किरायेदार बिना नवीनीकरण के मकान में रहता है तो उसे सामान्य मासिक किराये की दोगुनी राशि देनी होगी.
वहीं, बाढ़, भूकंप, चक्रवात या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा के कारण किराये का परिसर रहने योग्य नहीं रह जाता है तो उसे दोबारा रहने योग्य बनाए जाने तक किराया नहीं लिया जाएगा. ऐसी स्थिति में किरायेदार को समझौता बढ़ाने का उचित अवसर भी मिल सकता है.
बिना नोटिस मकान में प्रवेश नहीं
नए कानून में मकान मालिक के अधिकारों के साथ किरायेदार की निजता का भी ध्यान रखा गया है. मकान मालिक जरूरी स्थिति में किराये के परिसर में प्रवेश कर सकता है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में उसे कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देनी होगी.
प्रवेश सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही किया जा सकेगा. आपात स्थिति में इस नियम में छूट रहेगी.
मकान मालिक किरायेदार के लिए आवश्यक सेवाएं भी बंद नहीं कर सकेगा. पानी, बिजली और पाइप से मिलने वाली खाना पकाने की गैस जैसी जरूरी सेवाओं को रोकना प्रतिबंधित होगा.
संपत्ति प्रबंधक नियुक्त कर सकेगा मालिक
मकान मालिक लिखित रूप से किसी संपत्ति प्रबंधक की नियुक्ति कर सकेगा. यह व्यक्ति किराया वसूलने, मरम्मत की व्यवस्था करने और किरायेदार से संबंधित आवश्यक कार्यों को संभाल सकेगा.
इस प्रावधान से उन मकान मालिकों को सुविधा मिलने की उम्मीद है, जो स्वयं किसी दूसरे शहर या राज्य में रहते हैं और अपनी संपत्ति की नियमित देखरेख नहीं कर पाते.
तय अवधि में आसानी से नहीं होगी बेदखली
नए कानून के तहत किरायेदार को किराया समझौते की निर्धारित अवधि के दौरान मनमाने तरीके से बाहर नहीं किया जा सकेगा. बेदखली के लिए किराया न्यायालय की प्रक्रिया अपनानी होगी और कानून में निर्धारित आधार ही मान्य होंगे.
इन आधारों में नोटिस दिए जाने के बाद दो महीने तक किराया नहीं देना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, बिना अनुमति परिसर को किसी अन्य व्यक्ति को किराये पर देना और मकान मालिक द्वारा पुनर्निर्माण के लिए संपत्ति की आवश्यकता जैसे मामले शामिल हैं.
तीन स्तर पर विवादों का निपटारा
किराये से जुड़े मामलों के लिए तीन स्तर की व्यवस्था बनाई जाएगी. सबसे पहले किराया प्राधिकरण के पास आवेदन और संबंधित प्रक्रियाएं होंगी.
बेदखली से जुड़े मामलों की सुनवाई किराया न्यायालय करेगा. इसकी अध्यक्षता अतिरिक्त कलेक्टर या उप नगर आयुक्त से नीचे के पद के अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी.
इसके बाद अपील की सुनवाई किराया अधिकरण में होगी. इसकी अध्यक्षता जिला न्यायाधीश या अतिरिक्त जिला न्यायाधीश स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी.
इस व्यवस्था के जरिए किराये से जुड़े विवादों के लिए अलग संस्थागत ढांचा तैयार किया जा रहा है.
कई संपत्तियां कानून से बाहर
विधेयक में कुछ श्रेणी की संपत्तियों को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है. इनमें सरकारी भवन, कंपनियों के कर्मचारियों के लिए बनाए गए आवास, धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्तियां, वक्फ संपत्तियां तथा सार्वजनिक न्यास की संपत्तियां शामिल हैं.
हालांकि, यदि दोनों पक्ष सहमत हों तो ऐसी संपत्तियों को कानून के दायरे में लाया जा सकता है.
1947 के कानून में बदलाव
नए कानून के लागू होने के बाद 1947 के पुराने किराया कानून को नई किराया व्यवस्थाओं के लिए समाप्त किया जाएगा. सरकार का कहना है कि नया कानून बदलती आर्थिक और शहरी परिस्थितियों के अनुरूप किराये के बाजार को व्यवस्थित करने में मदद करेगा.
कनुभाई देसाई ने कहा कि यह विधेयक केवल कानूनी प्रावधानों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि राज्य के आर्थिक और सामाजिक जीवन से जुड़ी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास है. उनके मुताबिक इससे मकान मालिक को उचित कानूनी उपाय मिलेगा और किरायेदार को सम्मानजनक आवास का अधिकार मजबूत होगा. सरकार का दावा है कि नए प्रावधानों से रहने की सुविधा और रियल एस्टेट बाजार में अनुशासन दोनों को बढ़ावा मिलेगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

