आपराधिक मामला खत्म होने से अवैध खनन में जब्त वाहन की रिहाई तय नहीं होगी, खनन विभाग की कार्यवाही भी देखना जरूरी

आपराधिक मामला खत्म होने से अवैध खनन में जब्त वाहन की रिहाई तय नहीं होगी, खनन विभाग की कार्यवाही भी देखना जरूरी

प्रेषित समय :20:03:17 PM / Fri, Sep 11th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध खनन और अवैध खनिज परिवहन से जुड़े मामलों में जब्त वाहनों की रिहाई को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि वाहन से संबंधित आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है, उसे स्वतः रिहा करने का अधिकार नहीं बन जाता. यदि वाहन के संबंध में खनन विभाग की ओर से जब्ती की कार्यवाही लंबित है तो उसकी स्थिति पर भी विचार करना जरूरी होगा. अदालत ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत चलने वाली आपराधिक कार्यवाही और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत खनन विभाग की ओर से की जाने वाली जब्ती की कार्यवाही अलग-अलग प्रकृति की हैं.

यह फैसला जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की अदालत ने एम/एस श्रीराम एंटरप्राइजेज बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया. अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को वाहन की रिहाई के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष नई अर्जी दाखिल करने की छूट दी है. साथ ही मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह खनन विभाग से आवश्यक रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद वाहन की रिहाई के संबंध में कानून के अनुसार फैसला करे.

मोटर वाहन अधिनियम के मामले में जब्त हुआ था वाहन
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता का वाहन मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज एक शिकायत के सिलसिले में जब्त किया गया था. वाहन चालक ने अपने खिलाफ लगाए गए अपराध को स्वीकार कर लिया था. इसके बाद उसे अपराधियों की परिवीक्षा अधिनियम का लाभ देते हुए रिहा कर दिया गया.

कार्यवाही के दौरान मजिस्ट्रेट ने वाहन के संबंध में यह निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं है तो उसे रिहा किया जा सकता है. याचिकाकर्ता की ओर से इसके आधार पर वाहन की रिहाई की मांग की गई, लेकिन पुलिस ने वाहन को रिहा नहीं किया.

पुलिस की ओर से बताया गया कि वाहन का कथित तौर पर अवैध खनिज के परिवहन में इस्तेमाल किया गया था और उसके संबंध में खनन विभाग के समक्ष जब्ती की कार्यवाही लंबित है. इसी कारण केवल मोटर वाहन अधिनियम के मामले में हुई कार्यवाही के आधार पर वाहन को छोड़ना उचित नहीं माना गया.

याचिकाकर्ता ने पुलिस पर उठाया सवाल
याचिकाकर्ता का पक्ष था कि मजिस्ट्रेट द्वारा वाहन को रिहा किए जाने का आदेश दिए जाने के बावजूद पुलिस ने उसका पालन नहीं किया. याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि वाहन चालक से संबंधित आपराधिक कार्यवाही पूरी हो चुकी है और अदालत ने वाहन को रिहा किए जाने की अनुमति भी दे दी है. ऐसे में पुलिस द्वारा वाहन को अपने कब्जे में बनाए रखना उचित नहीं है.

दूसरी ओर, पुलिस की ओर से वाहन की रिहाई का विरोध करते हुए कहा गया कि मामला केवल मोटर वाहन अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत तक सीमित नहीं है. वाहन के अवैध खनिज परिवहन में इस्तेमाल होने का आरोप है और इस संबंध में खनन विभाग की अलग कार्यवाही चल रही है. इसलिए मजिस्ट्रेट के आदेश को खनन विभाग की कार्यवाही से अलग करके नहीं देखा जा सकता.

दोनों कानूनों के तहत कार्यवाही अलग-अलग
हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए मोटर वाहन अधिनियम और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम के तहत होने वाली कार्यवाहियों की प्रकृति को अलग माना. अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत किसी अपराध में वाहन जब्त होने और उस मामले की आपराधिक कार्यवाही समाप्त होने का यह अर्थ नहीं है कि वाहन के खिलाफ किसी अन्य कानून के तहत चल रही कार्यवाही भी समाप्त हो गई.

अदालत के अनुसार, यदि वाहन अवैध खनिज के परिवहन में इस्तेमाल किए जाने के आरोप के कारण खनन विभाग की कार्रवाई के दायरे में है, तो उस कार्यवाही का वाहन की रिहाई पर सीधा प्रभाव पड़ेगा. इसलिए वाहन को छोड़ने से पहले यह पता करना जरूरी है कि खनन विभाग के स्तर पर उसके संबंध में कोई जब्ती की कार्यवाही लंबित है या नहीं.

मजिस्ट्रेट का आदेश बिना शर्त रिहाई का नहीं था
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश की भी व्याख्या की. अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने वाहन को बिना किसी शर्त के रिहा करने का निर्देश नहीं दिया था. आदेश में यह स्पष्ट किया गया था कि यदि वाहन किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं है, तभी उसे रिहा किया जा सकता है.

हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट के सामने उस समय केवल मोटर वाहन अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत से संबंधित मामला था. खनन विभाग की कार्यवाही के संबंध में न तो आवश्यक रिपोर्ट मंगाई गई थी और न ही उसके आधार पर कोई स्वतंत्र निष्कर्ष दर्ज किया गया था.

इस स्थिति में मजिस्ट्रेट के आदेश को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि खनन विभाग की ओर से चल रही जब्ती की कार्यवाही भी स्वतः समाप्त हो गई है.

खनन विभाग की रिपोर्ट लेना जरूरी
अदालत ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि ऐसा कोई आदेश या आवेदन रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था, जिसमें मजिस्ट्रेट ने खनन विभाग की रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद उस पर विचार किया हो. इसलिए वाहन की रिहाई के संबंध में नए सिरे से प्रक्रिया अपनाने की जरूरत बताई गई.

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष वाहन की रिहाई के लिए नई अर्जी दाखिल करने की स्वतंत्रता दी. इसके साथ ही मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि वह खनन विभाग से रिपोर्ट मंगाए और उस रिपोर्ट पर विचार करने के बाद वाहन की रिहाई के संबंध में कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करे.

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक कानून के तहत आपराधिक कार्यवाही के समाप्त होने का लाभ उठाकर दूसरे कानून के तहत लंबित वैधानिक कार्यवाही को नजरअंदाज न किया जाए.

जब्ती की कार्यवाही का स्वतंत्र महत्व
इस फैसले में अदालत ने मूल रूप से यह स्पष्ट किया कि किसी वाहन की जब्ती केवल आपराधिक मुकदमे से जुड़ी हुई कार्रवाई नहीं होती. जब किसी वाहन के अवैध खनिज के परिवहन में इस्तेमाल होने का आरोप हो और खनन विभाग ने उसके खिलाफ अलग से कार्रवाई शुरू की हो तो उस कार्रवाई का अपना स्वतंत्र कानूनी महत्व है.

ऐसे मामलों में वाहन की रिहाई का फैसला करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि वाहन चालक के खिलाफ आपराधिक मामला समाप्त हो गया है या उसे किसी राहत का लाभ मिल चुका है. यह भी देखना होगा कि वाहन स्वयं किसी अन्य वैधानिक कार्रवाई के अधीन तो नहीं है.

फैसले का व्यापक असर
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला अवैध खनन और अवैध खनिज परिवहन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. अक्सर ऐसे मामलों में वाहन को आपराधिक प्रकरण के साथ जब्त किया जाता है और बाद में आपराधिक कार्यवाही समाप्त होने पर वाहन मालिक उसकी रिहाई की मांग करता है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी मांग पर निर्णय लेते समय अन्य लंबित वैधानिक कार्यवाहियों की स्थिति की जांच करना आवश्यक है.

फैसले का सीधा संदेश है कि आपराधिक मामला समाप्त होना अपने आप वाहन की रिहाई का आधार नहीं बनता. यदि खनन विभाग के स्तर पर वाहन की जब्ती से संबंधित कार्यवाही लंबित है तो पहले उसकी स्थिति स्पष्ट करनी होगी. मजिस्ट्रेट को भी वाहन की रिहाई पर निर्णय लेने से पहले संबंधित विभाग की रिपोर्ट पर विचार करना होगा.

इस तरह अदालत ने वाहन मालिक के अधिकार और खनन कानून के तहत राज्य की वैधानिक कार्रवाई, दोनों के बीच कानूनी प्रक्रिया का संतुलन कायम रखने पर जोर दिया है. मामले में याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने अंतिम रूप से वाहन को स्वतः रिहा करने का निर्देश देने के बजाय संबंधित मजिस्ट्रेट को खनन विभाग की रिपोर्ट के आधार पर कानून के अनुसार निर्णय लेने का रास्ता निर्धारित किया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-