ऑस्ट्रेलिया में भारतीय सुरों की नई आवाज बनी 19 साल की नीरू, ‘मूनबो’ में दिखा संस्कृति और संगीत का अनोखा संगम

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय सुरों की नई आवाज बनी 19 साल की नीरू, ‘मूनबो’ में दिखा संस्कृति और संगीत का अनोखा संगम

प्रेषित समय :21:56:01 PM / Sat, Sep 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मेलबर्न. भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें, सेल्टिक लोकधुनों की मिठास, जैज की स्वतंत्रता और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की संरचना—इन अलग-अलग संगीत परंपराओं को एक साथ पिरोने की कोशिश 19 वर्षीय ऑस्ट्रेलियाई गायिका और संगीतकार नीरू कर रही हैं. निहारिका श्यजू के नाम से जन्मी नीरू ने अपने पहले संकल्पना आधारित एल्बम ‘मूनबो’ के जरिए अपनी संगीत यात्रा को एक अलग पहचान देने की कोशिश की है.

ऑस्ट्रेलिया में पली-बढ़ी नीरू का संगीत किसी एक शैली या भौगोलिक सीमा में बंधा नहीं है. केरल से जुड़े अपने पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल को वह ऑस्ट्रेलिया में मिले विविध संगीत अनुभवों के साथ जोड़ती हैं. विक्टोरियन कॉलेज ऑफ द आर्ट्स सेकेंडरी स्कूल की पूर्व छात्रा नीरू ने 2025 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और अब सिडनी कंजर्वेटोरियम ऑफ म्यूजिक में अपने संगीत कौशल को और निखार रही हैं.

उनका पहला एल्बम ‘मूनबो’ 5 सितंबर को जारी हुआ. यह सिर्फ गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि रात के एक पूरे सफर को संगीत में व्यक्त करने की कोशिश है. एल्बम में 12 अध्याय हैं और प्रत्येक रचना रात के एक खास समय तथा उससे जुड़े भाव को सामने रखती है. शाम 7:30 बजे से शुरू होकर सुबह 5:30 बजे तक का यह संगीत सफर आश्चर्य, आत्ममंथन, संघर्ष, अभिव्यक्ति, प्रेम और अंततः शांति की ओर बढ़ता है.

संगीत में कृत्रिम मिश्रण नहीं, स्वाभाविक मेल चाहती हैं नीरू
नीरू के संगीत की सबसे खास बात अलग-अलग परंपराओं को एक साथ लाने का उनका तरीका है. उनके संगीत में भारतीय शास्त्रीयता के साथ सेल्टिक लोक संगीत, जैज और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के तत्व सुनाई देते हैं. लेकिन नीरू इसे जबरन किया गया फ्यूजन नहीं मानतीं.

उनका कहना है कि अलग-अलग संगीत परंपराओं की सीमाएं हर व्यक्ति अपने तरीके से तय करता है. वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में संगीत के तत्वों के इस्तेमाल को समझना चाहती हैं और फिर उन्हें अपनी रचनाओं में शामिल करती हैं. उनका उद्देश्य संगीत की विभिन्न धाराओं को जबरन मिलाना नहीं, बल्कि उन्हें स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे में घुलने देना है.

यही सोच उनके एल्बम ‘मूनबो’ में भी दिखाई देती है. इसमें अलग-अलग सांस्कृतिक प्रभावों के बावजूद संगीत किसी एक शैली की नकल जैसा नहीं लगता, बल्कि नीरू की अपनी पहचान बनाने की कोशिश के रूप में सामने आता है.

‘मूनबो’ में एक रात की कहानी
‘मूनबो’ का विचार नीरू के मन में पहले आया और इसके बाद गीतों को रात के अलग-अलग समय से जोड़ा गया. रात हमेशा से उन्हें आकर्षित करती रही है. उन्होंने इसी समय को आधार बनाकर ऐसा संगीत तैयार करने की कोशिश की, जो श्रोता को शाम से सुबह तक भावनाओं की एक यात्रा पर ले जाए.

एल्बम की प्रत्येक रचना को एक खास समय और मनःस्थिति से जोड़ा गया है. इस तरह श्रोता केवल अलग-अलग गीत नहीं सुनता, बल्कि एक रात के गुजरने का अनुभव करता है.

एल्बम का अंतिम गीत ‘ऑरोरा’ उम्मीद, प्रेम और जुड़ाव की भावना के साथ यात्रा को समाप्त करता है. नीरू के अनुसार रात के अंधेरे के बाद रोशनी का महत्व ज्यादा समझ में आता है. इसलिए उन्होंने एल्बम का अंत लोरी जैसी अनुभूति देने वाली रचना से किया.

‘पेंटेड मेडन’ में स्त्री की पहचान और अपेक्षाओं का सवाल
नीरू के संगीत में केवल सांस्कृतिक मेल ही नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों की झलक भी मिलती है. ‘पेंटेड मेडन’ ऐसा ही गीत है, जिसमें महिलाओं से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं को विषय बनाया गया है.

नीरू ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में महिलाओं पर डाली जाने वाली कई ऐसी अनकही अपेक्षाएं देखी हैं, जिनका खुलकर उल्लेख नहीं होता. इस गीत में उन्होंने चित्र बनाने के रूपक के माध्यम से यह सवाल उठाया है कि किसी महिला की पहचान और उसकी छवि आखिर कौन तय करता है.

उनके लिए यह गीत शिकायत से ज्यादा सशक्तिकरण की अभिव्यक्ति है. हर व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह खुद तय करे कि दुनिया के सामने उसे किस रूप में देखा जाए.

केरल की लोककथा ‘पेरुमथाचन’ से पश्चिमी संगीत तक
नीरू के संगीत की जड़ें उनके मूल राज्य केरल से भी गहराई से जुड़ी हैं. उन्होंने केरल की प्रसिद्ध लोककथा के पात्र पेरुमथाचन को एक पियानो तिकड़ी की रचना के लिए प्रेरणा बनाया. खास बात यह है कि इस रचना में उन्होंने पश्चिमी कक्षीय संगीत के तीन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया.

पेरुमथाचन की कथा उनके लिए इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि यह केरल की लोक परंपरा के प्रमुख पात्रों में से एक है. इस कथा को अलग-अलग रूपों में समझने के दौरान नीरू का ध्यान पिता-पुत्र के जटिल संबंध की ओर गया.

उनकी रचना में इस रिश्ते से जुड़ी बेचैनी और अंततः एक तरह की शांति को व्यक्त करने का प्रयास है. लेकिन यह शांति पूरी तरह सहज नहीं है. इसमें यह सवाल भी छिपा है कि किसी संघर्ष का समाधान तो हो गया, लेकिन उसकी कीमत क्या चुकानी पड़ी.

इस रचना का प्रीमियर पोर्ट फेयरी स्प्रिंग फेस्टिवल के यूरेशियन एक्सपीडिशंस में हुआ, जिससे नीरू की संगीत यात्रा को अंतरराष्ट्रीय मंच भी मिला.

ऑस्ट्रेलिया की जमीन के प्रति सम्मान भी संगीत में
भारत और केरल से जुड़े सांस्कृतिक अनुभवों के साथ नीरू ने ऑस्ट्रेलिया की मूलनिवासी समुदायों और वहां की जमीन के प्रति सम्मान को भी अपनी रचनात्मकता में स्थान दिया है. ‘रिस्पेक्ट द लैंड’ ऐसी ही रचना है, जिसमें उन्होंने फर्स्ट नेशंस समुदायों के जमीन के साथ आध्यात्मिक संबंध को सम्मान देने की कोशिश की है.

नीरू मानती हैं कि गैर-मूलनिवासी ऑस्ट्रेलियाई होने के कारण वह फर्स्ट नेशंस समुदायों की पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों और सांस्कृतिक परंपराओं की पूरी गहराई को समझने का दावा नहीं कर सकतीं. इसलिए उनकी कोशिश किसी संस्कृति की ओर से बोलने के बजाय उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने की रही.

उनके अनुसार ऑस्ट्रेलियाई जमीन और फर्स्ट नेशंस समुदायों के बीच संबंध केवल अधिकार या भूगोल का विषय नहीं, बल्कि प्रेम और आध्यात्मिक जुड़ाव से जुड़ा है.

लाइव इंस्ट्रूमेंटेशन पर दिया जोर
‘मूनबो’ तैयार करते समय नीरू ने लाइव इंस्ट्रूमेंटेशन का इस्तेमाल किया. उनके लिए यह सिर्फ तकनीकी फैसला नहीं था. वह चाहती थीं कि एल्बम की ध्वनि स्वाभाविक लगे और संगीत में इंसानी स्पर्श बना रहे.

उनका मानना है कि लाइव वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल से कलाकार और श्रोता के बीच गहरा भावनात्मक संबंध बन सकता है. डिजिटल संगीत के दौर में यह सोच उन्हें उन कलाकारों से अलग करती है जो पूरी तरह तकनीकी उत्पादन पर निर्भर रहते हैं.

एल्बम के निर्माण में लॉस एंजिलिस स्थित निर्माता, इंजीनियर और मिक्सर एडम कगन ने भी काम किया. नीरू ने उनके अनुभव और सुझावों को अपनी संगीत यात्रा के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणा बताया.

परिवार ने दिया संगीत की राह पर आगे बढ़ने का हौसला
नीरू के अनुसार संगीत उनके परिवार के जीवन का हिस्सा रहा है. संगीत पसंद करने वाले परिवार में पली-बढ़ी होने के कारण उन्होंने इसे केवल पेशे के रूप में नहीं, बल्कि आराम और खुशी के स्रोत के रूप में देखा.

संगीत और कला का क्षेत्र चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में परिवार का समर्थन उनके लिए महत्वपूर्ण रहा. उन्होंने माना कि उपलब्धियों के साथ मुश्किल दौर भी आते हैं और ऐसे समय में परिवार का साथ कलाकार को आगे बढ़ने की ताकत देता है.

संगीत के अलावा मानव शरीर विज्ञान में रुचि
नीरू की दिलचस्पी केवल संगीत तक सीमित नहीं है. वह मानव शरीर रचना से जुड़े वैज्ञानिक शोध में भी रुचि रखती हैं. उनका कहना है कि यदि उन्होंने संगीत को अपना करियर नहीं बनाया होता तो वह विज्ञान और मानव शरीर से संबंधित किसी क्षेत्र में आगे बढ़ना पसंद करतीं.

यह रुचि उनके व्यक्तित्व के एक अलग पक्ष को सामने लाती है. एक तरफ वह भावनाओं और ध्वनियों को संगीत में ढाल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मानव शरीर और विज्ञान के प्रति उनकी जिज्ञासा भी बनी हुई है.

मंच पर खुद पर भरोसा बढ़ा, लेकिन ऑर्केस्ट्रा को लेकर चुनौती
नीरू ने गायिका के रूप में मंच पर भी जोखिम उठाया है और ‘द टैलेंट’ जैसे कार्यक्रम में प्रस्तुति दी है. उनका कहना है कि हर नई प्रस्तुति के साथ वह अपनी रचनात्मक प्रक्रिया में ज्यादा सहज महसूस करने लगी हैं.

हालांकि, अपने संगीत को किसी ऑर्केस्ट्रा के सामने प्रस्तुत करवाना उनके लिए थोड़ा अधिक चुनौतीपूर्ण है. इसकी वजह यह है कि रचना तैयार करने के बाद उसे दूसरे संगीतकार किस तरह समझेंगे और प्रस्तुत करेंगे, इस पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं रहता.

उनके दिमाग में संगीत जिस तरह सुनाई देता है, जरूरी नहीं कि ऑर्केस्ट्रा की प्रस्तुति में वह बिल्कुल उसी तरह सामने आए. इसी अनिश्चितता को वह अपनी रचनात्मक यात्रा का एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं.

19 वर्ष की उम्र में नीरू जिस तरह भारतीय शास्त्रीय संगीत, केरल की लोक परंपरा, सेल्टिक संगीत, जैज और पश्चिमी शास्त्रीय धुनों के बीच अपनी राह तलाश रही हैं, वह उनकी संगीत दृष्टि को अलग पहचान देता है. ‘मूनबो’ के जरिए उनकी कोशिश केवल अलग-अलग संगीत शैलियों को मिलाने की नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों और अनुभवों के बीच एक स्वाभाविक संवाद कायम करने की है. उनकी यह यात्रा अभी शुरुआत में है, लेकिन इसमें एक ऐसी कलाकार की पहचान उभर रही है जो अपनी जड़ों को साथ लेकर दुनिया के व्यापक संगीत परिदृश्य में अपनी अलग आवाज तलाश रही है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-