नौ साल बाद बिजली बकाया मांगने पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, हर बिल में लगातार बकाया दिखाना जरूरी

नौ साल बाद बिजली बकाया मांगने पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, हर बिल में लगातार बकाया दिखाना जरूरी

प्रेषित समय :19:25:40 PM / Sat, Sep 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. बिजली उपभोक्ताओं से पुराने बकाये की वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि बिजली की किसी देनदारी के दो साल बीत जाने के बाद उसकी वसूली सामान्य तौर पर नहीं की जा सकती. यदि बिजली वितरण कंपनी दो साल की अवधि के बाद भी किसी पुरानी राशि की वसूली करना चाहती है, तो यह साबित करना होगा कि संबंधित रकम को लगातार बिजली बिलों में बकाया राशि के रूप में दर्शाया जाता रहा था. यदि ऐसा नहीं किया गया है तो दो साल से अधिक पुरानी रकम की वसूली पर कानून की सीमा लागू होगी.

न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड बनाम विद्युत लोकपाल, उत्तर प्रदेश एवं अन्य मामले में बिजली वितरण कंपनी की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया. विवाद करीब 57.74 लाख रुपये की उस मांग से जुड़ा था, जिसे बिजली कंपनी ने वर्ष 2007 में वर्ष 1998 की अवधि के लिए उठाया था. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इतनी देर से की गई मांग, जिसे बीच के वर्षों में लगातार बकाये के रूप में बिलों में नहीं दिखाया गया, कानूनन वसूल योग्य नहीं है.

1998 के बकाये की मांग 2007 में उठी
मामला एक ऐसे उपभोक्ता से जुड़ा था, जिसने शुरुआत में 4000 केवीए बिजली भार के लिए आवेदन किया था. उस समय बिजली उपलब्धता से जुड़ी परिस्थितियों के कारण वितरण कंपनी ने उसे पहले 2000 केवीए भार स्वीकृत कर उपलब्ध कराया.

इसके बाद 24 फरवरी 1997 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ. बाद में बिजली कंपनी ने दावा किया कि बिजली उपलब्धता की स्थिति बेहतर होने के बाद वह उपभोक्ता को अतिरिक्त 2000 केवीए भार उपलब्ध कराने की स्थिति में है.

31 जनवरी 1998 को कंपनी ने अतिरिक्त 2000 केवीए भार देने की पेशकश की. इसके लिए उपभोक्ता से आवश्यक सहमति और समझौते की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया था.

हालांकि उपभोक्ता ने बाद में 14 सितंबर 1998 को पत्र भेजकर अतिरिक्त बिजली भार लेने में रुचि नहीं होने की बात स्पष्ट कर दी. उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अतिरिक्त 2000 केवीए भार वास्तव में उपभोक्ता को जारी या उपलब्ध कराए जाने का भी प्रमाण नहीं था.

नौ साल तक नहीं भेजा गया संबंधित बिल
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही था कि फरवरी 1998 से सितंबर 1998 के बीच की अवधि के लिए जिस अतिरिक्त भार का शुल्क मांगा गया, उसकी मांग तत्काल नहीं की गई.

बिजली कंपनी ने करीब नौ साल बाद 13 फरवरी 2007 को उपभोक्ता के खिलाफ 57,74,164 रुपये की मांग उठाई. यह राशि न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क के रूप में मांगी गई थी.

यानी जिस अवधि के लिए भुगतान की मांग की गई, वह वर्ष 1998 की थी, जबकि उसका बिल वर्ष 2007 में पहली बार सामने आया.

उपभोक्ता ने इस मांग को चुनौती दी और मामला बिजली उपभोक्ता शिकायत निवारण व्यवस्था से होते हुए विद्युत लोकपाल तक पहुंचा. बाद में मामला हाईकोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक गया.

अतिरिक्त बिजली भार लिया ही नहीं गया था
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि उपभोक्ता ने अतिरिक्त 2000 केवीए भार स्वीकार नहीं किया था. बिजली कंपनी ने अतिरिक्त भार उपलब्ध होने की सूचना तो दी थी, लेकिन उपभोक्ता ने उसे लेने के लिए अपनी सहमति नहीं दी.

हाईकोर्ट के समक्ष भी यह तथ्य सामने आया था कि अतिरिक्त भार न तो वास्तव में जारी किया गया और न ही उपभोक्ता ने उसे स्वीकार किया. इसके बावजूद कंपनी ने बाद में न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की मांग की.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी इस पृष्ठभूमि को मामले के तथ्यों का हिस्सा माना गया.

बिजली अधिनियम की धारा 56(2) बनी मुख्य आधार
मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य कानूनी आधार बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 56(2) रही.

इस प्रावधान के तहत किसी उपभोक्ता से देय राशि उस तारीख से दो साल के बाद सामान्य रूप से वसूल नहीं की जा सकती, जिस तारीख को वह राशि पहली बार देय हुई थी. हालांकि कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद है. यदि संबंधित रकम को बिजली शुल्क के बकाये के रूप में लगातार दिखाया जाता रहा है, तो दो साल बाद भी उसकी वसूली का सवाल अलग तरीके से देखा जा सकता है.

यही वजह है कि पुराने बिजली बकाये के मामलों में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि राशि पहले से देय थी. वितरण कंपनी को यह भी दिखाना होगा कि उसने संबंधित रकम को नियमित रूप से उपभोक्ता के बिलों में बकाया के रूप में प्रदर्शित किया था.

सिर्फ पुरानी रकम होने का दावा पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मूल रूप से इसी सिद्धांत को लागू किया. 1998 की कथित देनदारी के संबंध में 2007 में पहली बार मांग की गई थी.

रिकॉर्ड में ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं था जिससे यह साबित हो कि 1998 से 2007 के बीच संबंधित रकम को उपभोक्ता के नियमित बिजली बिलों में लगातार बकाया के रूप में दिखाया गया था.

ऐसे में केवल यह दावा कि रकम पहले से बकाया थी, दो साल की कानूनी सीमा को पार करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया.

हाईकोर्ट ने भी इसी आधार पर कहा था कि यदि कंपनी को अतिरिक्त 2000 केवीए भार से संबंधित कोई राशि वसूलनी थी तो उसे संबंधित समय में नियमित बिजली बिलों के साथ उसकी मांग करनी चाहिए थी. ऐसा नहीं किया गया.

'बकाया' लगातार दिखाना क्यों जरूरी
इस फैसले का उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियमित बिजली बिलों में बकाये की स्थिति से जुड़ा है.

यदि किसी उपभोक्ता के बिल में कोई राशि लगातार बकाया दिखाई जाती है और उपभोक्ता को उसके बारे में नियमित रूप से जानकारी मिलती रहती है, तो बिजली कंपनी यह तर्क दे सकती है कि वह रकम लगातार बकाये के रूप में दर्ज थी.

इसके विपरीत यदि वर्षों तक किसी बिल में ऐसी कोई रकम दिखाई ही नहीं गई और अचानक कई साल बाद बड़ी राशि का बिल भेज दिया गया, तो धारा 56(2) के तहत उसकी वसूली की वैधता पर सवाल उठ सकता है.

इस मामले में भी विवादित रकम नियमित बिलों में लगातार बकाया के रूप में प्रदर्शित होने का कोई ठोस रिकॉर्ड सामने नहीं आया.

बिजली लोकपाल ने पहले ही मांग रद्द की थी
उपभोक्ता ने 2007 में जारी मांग को चुनौती देते हुए उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम का रुख किया था. वहां निर्णय विभाजित रहा. इसके बाद मामला विद्युत लोकपाल के समक्ष पहुंचा.

विद्युत लोकपाल ने 57.74 लाख रुपये की मांग को रद्द कर दिया. उसके निष्कर्षों में यह भी शामिल था कि उपभोक्ता ने अतिरिक्त 2000 केवीए भार स्वीकार नहीं किया था और संबंधित मांग बिजली अधिनियम की धारा 56(2) के तहत समय-सीमा से बाधित थी.

इसके बाद बिजली वितरण कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी मांग को बरकरार रखने से इनकार कर दिया.

हाईकोर्ट के फैसले में भी समय-सीमा पर जोर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 1998 की अवधि के लिए 2007 में पहली बार मांग उठाई गई. इस दौरान संबंधित राशि को लगातार बकाया के रूप में दर्शाए जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं था.

अदालत ने यह भी माना था कि यदि बिजली अधिनियम की धारा 56(2) के अलावा सामान्य परिसीमा कानून के प्रावधानों को भी देखा जाए, तब भी करीब नौ साल बाद की गई मांग को कायम रखना मुश्किल होगा.

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद बिजली कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी हस्तक्षेप से इनकार कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों का भी लिया सहारा
सुप्रीम कोर्ट ने बिजली बकाये की वसूली की समय-सीमा से जुड़े अपने पहले के निर्णयों का भी उल्लेख किया. इनमें सहायक अभियंता बनाम रहमतुल्लाह खान का फैसला भी शामिल है, जिसमें बिजली अधिनियम की धारा 56(2) के तहत पुराने बिजली बकाये की वसूली के संबंध में सिद्धांत स्पष्ट किया गया था.

इन निर्णयों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिजली उपभोक्ता पर वर्षों बाद अचानक ऐसी देनदारी न थोपी जाए, जिसके बारे में उसे नियमित बिलों के जरिए जानकारी ही नहीं दी गई थी.

इस मामले में भी अदालत ने देखा कि विवादित राशि को समय पर बिल नहीं किया गया और बाद के वर्षों में लगातार बकाया के रूप में भी नहीं दिखाया गया.

57.74 लाख की मांग को नहीं मिली मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील खारिज कर दी. इसका सीधा परिणाम यह रहा कि फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि से संबंधित 57,74,164 रुपये की मांग, जिसे 13 फरवरी 2007 को उठाया गया था, कायम नहीं रह सकी.

अदालत ने इस मामले में बिजली वितरण कंपनी की उस कोशिश को स्वीकार नहीं किया जिसमें कई वर्ष पुराने कथित न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की वसूली की मांग की गई थी.

बिजली उपभोक्ताओं के लिए फैसले का संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुराने बिजली बकाये से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. फैसले से यह स्पष्ट होता है कि बिजली वितरण कंपनी को अपने बकाये का रिकॉर्ड नियमित और पारदर्शी तरीके से बनाए रखना होगा.

दो साल बाद बकाया वसूलने के लिए केवल पुरानी देनदारी का हवाला पर्याप्त नहीं होगा. यह भी दिखाना होगा कि संबंधित राशि लगातार बिजली बिलों में बकाया के रूप में दर्ज थी.

इस मामले में 1998 की कथित देनदारी को 2007 में पहली बार मांग के रूप में उठाया गया था और बीच के वर्षों में उसे लगातार बकाये के रूप में प्रदर्शित करने का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं था. इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने बिजली कंपनी की अपील खारिज कर दी.

यह फैसला उपभोक्ताओं के लिए इस मायने में अहम है कि लंबे समय बाद भेजे गए बिजली के बकाया बिल की वैधता पर सवाल उठने की स्थिति में बिलिंग रिकॉर्ड और धारा 56(2) की दो साल की सीमा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-