रिटायर कर्मचारी से 39.94 लाख की वसूली पर हाईकोर्ट की रोक, वेतन निर्धारण की गलती का खामियाजा नहीं भुगतेंगे क्लास III कर्मचारी

रिटायर कर्मचारी से 39.94 लाख की वसूली पर हाईकोर्ट की रोक, वेतन निर्धारण की गलती का खामियाजा नहीं भुगतेंगे क्लास III कर्मचारी

प्रेषित समय :19:28:27 PM / Sat, Sep 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मुंबई. वेतन निर्धारण में विभाग या संस्थान की गलती से किसी कर्मचारी को अधिक भुगतान हो जाने के बाद सेवानिवृत्ति के समय उससे पूरी राशि की वसूली नहीं की जा सकती. बॉम्बे हाईकोर्ट ने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त क्लास III कर्मचारी से 39.94 लाख रुपये की वसूली के आदेश को रद्द करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुका था और विवादित वेतनमान विश्वविद्यालय की ओर से निर्धारित किया गया था. ऐसे में कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली उसके सेवानिवृत्ति लाभों से करना अनुचित और मनमाना होगा.

न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे की खंडपीठ ने श्रीनिवास गणेश कुलकर्णी बनाम सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय एवं अन्य मामले में 11 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया. मामला रिट याचिका संख्या 14168/2024 से संबंधित था. हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के 17 अप्रैल 2023 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए सेवानिवृत्त कर्मचारी से 39,94,343 रुपये की कथित अतिरिक्त वेतन राशि वसूलने की प्रक्रिया शुरू की गई थी.

1993 में डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में हुई थी नियुक्ति
मामले के अनुसार श्रीनिवास गणेश कुलकर्णी ने वर्ष 1993 में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में सेवा शुरू की थी. बाद में उन्हें सेवा में नियमित रूप से पुष्टि भी मिली.

सेवा के दौरान उन्हें समय-समय पर विभिन्न वेतन आयोगों के तहत वेतन संबंधी लाभ मिलते रहे. पांचवें और छठे वेतन आयोग के कार्यान्वयन के दौरान भी उनके वेतन का निर्धारण विश्वविद्यालय की ओर से किया गया.

कुलकर्णी ने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में सेवा की और 31 दिसंबर 2022 को सेवानिवृत्त हुए. सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें अपने सेवा लाभ और सेवानिवृत्ति से जुड़े भुगतान मिलने थे. इसी दौरान विश्वविद्यालय की ओर से उनके वेतन निर्धारण को लेकर आपत्ति उठाई गई.

सेवानिवृत्ति के बाद विश्वविद्यालय ने निकाली 39.94 लाख की देनदारी
सेवानिवृत्ति के करीब चार महीने बाद विश्वविद्यालय ने 17 अप्रैल 2023 को कुलकर्णी को पत्र जारी किया. इसमें कहा गया कि छठे वेतन आयोग के तहत उनका वेतन गलत तरीके से निर्धारित किया गया था.

विश्वविद्यालय के अनुसार उन्हें जिस वेतनमान का लाभ दिया गया, वह उनके पद और पात्रता के अनुरूप नहीं था. संस्थान ने दावा किया कि इस गलत वेतन निर्धारण के कारण सेवा अवधि के दौरान उन्हें 39,94,343 रुपये अधिक भुगतान हो गया.

विश्वविद्यालय ने इस कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली उनके सेवानिवृत्ति लाभों से करने की प्रक्रिया शुरू कर दी. सेवानिवृत्त कर्मचारी ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी.

कर्मचारी ने कहा वेतनमान खुद विश्वविद्यालय ने तय किया
कुलकर्णी की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि उन्होंने खुद किसी गलत वेतनमान का दावा नहीं किया था. उनके वेतन का निर्धारण विश्वविद्यालय और संबंधित अधिकारियों की ओर से किया गया था.

उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि यदि संस्थान ने उनके वेतन की गणना या निर्धारण में कोई गलती की थी तो उसका जिम्मेदार कर्मचारी को नहीं बनाया जा सकता. कर्मचारी ने यह भी कहा कि लंबे समय तक निर्धारित वेतन के आधार पर सेवा करने के बाद सेवानिवृत्ति के समय अचानक इतनी बड़ी राशि की वसूली करना उसके लिए गंभीर आर्थिक बोझ पैदा करेगा.

दूसरी ओर विश्वविद्यालय ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि अतिरिक्त वेतन का भुगतान गलत वेतन निर्धारण के कारण हुआ था और कर्मचारी ने छठे वेतन आयोग के कार्यान्वयन के समय एक ऐसा वचन भी दिया था, जिसके आधार पर अधिक भुगतान होने पर राशि लौटाई जा सकती थी.

विश्वविद्यालय ने वचनपत्र को बनाया आधार
विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट के समक्ष उस कथित वचनपत्र का भी सहारा लिया, जो वेतन आयोग के कार्यान्वयन के समय कर्मचारी से लिया गया था. विश्वविद्यालय का तर्क था कि यदि बाद में यह पता चलता है कि कर्मचारी को निर्धारित पात्रता से अधिक भुगतान हो गया है तो उसकी वसूली की जा सकती है.

हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने मामले की परिस्थितियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए उन सिद्धांतों की कसौटी पर परखा, जिनमें कर्मचारियों से गलती से हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर सीमाएं तय की गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को महत्वपूर्ण माना. इस फैसले में शीर्ष अदालत ने उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया था, जिनमें कर्मचारी को भुगतान की गई अतिरिक्त राशि की वसूली अनुचित मानी जा सकती है.

विशेष रूप से क्लास III और क्लास IV कर्मचारियों से गलती से हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली और सेवानिवृत्त कर्मचारियों से ऐसी वसूली के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा प्रदान की है.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में कर्मचारी निर्विवाद रूप से क्लास III श्रेणी में था और वसूली की मांग उसकी सेवानिवृत्ति के बाद उठाई गई थी. इसलिए रफीक मसीह में निर्धारित सिद्धांत इस मामले पर लागू होते हैं.

39.94 लाख की वसूली को अदालत ने बताया मनमाना
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों को देखते हुए कहा कि सेवानिवृत्त क्लास III कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभों से 39,94,343 रुपये की वसूली करना अवैध और मनमाना होगा.

अदालत ने विशेष रूप से इस बात को महत्व दिया कि कथित अतिरिक्त भुगतान कर्मचारी की ओर से किसी गलत जानकारी या धोखाधड़ी के आधार पर नहीं हुआ था. विवादित वेतनमान विश्वविद्यालय की ओर से तय किया गया था और कर्मचारी ने उसी के आधार पर वर्षों तक सेवा की.

ऐसी स्थिति में सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी पर अचानक बड़ी वित्तीय देनदारी डालना न्यायसंगत नहीं माना गया.

सेवानिवृत्ति लाभ रोकने पर भी अदालत सख्त
मामले में केवल वसूली का सवाल नहीं था. विश्वविद्यालय ने कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली सुनिश्चित करने के लिए कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभों को भी प्रभावित किया था.

हाईकोर्ट ने इस पर भी आपत्ति जताई और कहा कि कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली के लिए सेवानिवृत्त कर्मचारी के वैधानिक सेवानिवृत्ति लाभों को रोकना उचित नहीं है.

अदालत के अनुसार जब कर्मचारी ने लंबे समय तक संस्थान की ओर से तय वेतन के आधार पर सेवा की हो और वह सेवानिवृत्त हो चुका हो, तब केवल विभागीय वेतन निर्धारण की गलती को आधार बनाकर उसके सेवानिवृत्ति लाभों से भारी राशि काटना कानून की कसौटी पर कायम नहीं रह सकता.

पहले से वसूली हुई राशि भी लौटानी होगी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने केवल भविष्य की वसूली पर रोक नहीं लगाई, बल्कि यदि विश्वविद्यालय ने 39.94 लाख रुपये की राशि में से कोई रकम पहले ही वसूल कर ली है तो उसे वापस करने का भी निर्देश दिया.

अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि पहले से वसूल की गई राशि तीन महीने के भीतर वापस की जाए.

इससे सेवानिवृत्त कर्मचारी को बड़ी राहत मिली है. साथ ही विश्वविद्यालय को यह भी निर्देश दिया गया कि कर्मचारी के बकाया सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान निर्धारित अवधि में पूरा करे.

एसीपीएस लाभ और बकाया भी देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने कर्मचारी के अन्य लंबित सेवा लाभों पर भी विश्वविद्यालय को निर्देश दिए. अदालत ने जून 2017 से आश्वस्त करियर प्रगति योजना (एसीपीएस) के लाभ प्रदान करने और उसके आधार पर बनने वाले बकाये का भुगतान करने को कहा.

इन बकायों पर उचित ब्याज देने का निर्देश भी दिया गया है.

इसके अलावा संचित अवकाश के बदले मिलने वाली राशि और भविष्य निधि पर जमा ब्याज सहित अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को भी जारी करने का निर्देश विश्वविद्यालय को दिया गया.

सातवें वेतन आयोग का लाभ भी लागू करने का निर्देश
अदालत ने कर्मचारी को सातवें वेतन आयोग के तहत मिलने वाले लाभों को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिया. विश्वविद्यालय को 1 जून 2016 से सातवें वेतन आयोग को लागू करने के लिए कहा गया है.

कर्मचारी को निर्धारित वेतनमान 9,300 से 34,800 रुपये तथा 4,300 रुपये ग्रेड पे के आधार पर लाभ देने का निर्देश दिया गया. यह लाभ 24 वर्ष की निरंतर सेवा के आधार पर एसीपीएस लाभ दिए जाने के बाद लागू किया जाना है.

इस तरह हाईकोर्ट ने केवल 39.94 लाख रुपये की वसूली को रद्द नहीं किया, बल्कि कर्मचारी के लंबित वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर उन्हें जारी करने की पूरी प्रक्रिया को भी निर्धारित किया.

तीन महीने में सभी निर्देशों का पालन करना होगा
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को सभी निर्देशों का पालन तीन महीने के भीतर करने को कहा है. इसमें यदि कोई राशि पहले ही वसूल की गई है तो उसकी वापसी, एसीपीएस के बकाये का भुगतान, अवकाश नकदीकरण, भविष्य निधि ब्याज और सातवें वेतन आयोग के लाभ शामिल हैं.

अदालत ने विश्वविद्यालय की ओर से उठाए गए वसूली के कदम को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिस सीमा तक वह कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभों से 39.94 लाख रुपये की वसूली से संबंधित था.

फैसले का संदेश सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण
इस फैसले का व्यापक महत्व उन मामलों में है, जहां कर्मचारी को विभागीय या संस्थागत स्तर पर वेतन निर्धारण की गलती के कारण निर्धारित वेतन से अधिक भुगतान हो जाता है. अदालत के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि ऐसी गलती का पूरा आर्थिक बोझ हर स्थिति में कर्मचारी पर डालना उचित नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब कर्मचारी क्लास III या क्लास IV श्रेणी में हो अथवा सेवानिवृत्त हो चुका हो.

इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह सिद्धांतों को लागू करते हुए सेवानिवृत्त क्लास III कर्मचारी को राहत दी. 39.94 लाख रुपये की वसूली का आदेश रद्द करने के साथ विश्वविद्यालय को लंबित सेवानिवृत्ति और वेतन संबंधी लाभ तीन महीने में जारी करने का निर्देश दिया गया है.

केस: श्रीनिवास गणेश कुलकर्णी बनाम सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय एवं अन्य
रिट याचिका: 14168/2024
पीठ: न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे
निर्णय: 11 सितंबर 2026

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-