नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में समाप्त हो चुकी खनन पट्टों से संबंधित खनिजों की बिक्री को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए 11 शर्तों वाला विस्तृत ढांचा तय किया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि समाप्त खनन पट्टों के दौरान पहले से निकाले गए खनिजों की बिक्री या उनके मूल्य के दावे की अनुमति केवल निर्धारित शर्तों के पूरा होने पर ही दी जा सकेगी. इसके साथ ही अदालत ने भविष्य की नीलामी के लिए अलग-अलग श्रेणी के खनन ब्लॉकों को आसपास की अप्रयुक्त वन भूमि के साथ मिलाकर एक संयुक्त ब्लॉक बनाने की अनुमति भी दी है, लेकिन स्पष्ट किया है कि इससे उस वन भूमि पर खनन का अधिकार स्वतः नहीं मिलेगा.
यह आदेश लंबे समय से चल रही जनहित याचिका समाज परिवर्तन समुदाय एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य तथा इससे जुड़ी विशेष अनुमति याचिका में आया. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की. अदालत के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने न्याय मित्र के रूप में लंबित आवेदनों को विभिन्न श्रेणियों में बांटकर संबंधित मुद्दों पर सुझाव रखे थे.
सोमवार को पारित आदेश में मुख्य रूप से दो मुद्दों पर निर्णय लिया गया. पहला, समाप्त हो चुकी खनन पट्टों के दौरान निकाले गए और बचे हुए खनिजों की बिक्री का प्रश्न और दूसरा, भविष्य की नीलामी के लिए विभिन्न श्रेणी के खनन क्षेत्रों को आसपास की अप्रयुक्त वन भूमि के साथ मिलाकर संयुक्त ब्लॉक बनाने का मुद्दा.
समाप्त पट्टों के खनिज की बिक्री पर 11 शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र की ओर से सुझाई गई सभी 11 शर्तों को स्वीकार करते हुए उन्हें खनिज की बिक्री या निपटान के लिए लागू ढांचा माना है. इसका मतलब यह है कि समाप्त खनन पट्टे का पूर्व धारक केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में अपने पास मौजूद खनिज को बेच सकेगा या उसके मूल्य का दावा कर सकेगा.
अदालत के अनुसार, संबंधित पट्टाधारक ने खनिज की बिक्री की अनुमति के लिए पट्टा समाप्त होने से पहले या उसके तुरंत बाद अदालत का रुख किया हो. इसके अलावा खनन पट्टा उन श्रेणियों में होना चाहिए, जिन्हें अदालत के 2013 के फैसले में श्रेणी ए या श्रेणी बी के रूप में वर्गीकृत किया गया था.
श्रेणी बी के मामलों में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना को पूरी तरह लागू किया जाना भी आवश्यक होगा. इसके साथ ही संबंधित खनन गतिविधियों को दोबारा शुरू करने के लिए अदालत के 2012 और 2013 के आदेशों के अनुरूप औपचारिक स्वीकृति होना जरूरी होगा.
पुनर्वास योजना और आर्थिक गारंटी भी जरूरी
अदालत ने यह भी निर्धारित किया है कि संबंधित खनन क्षेत्र की खनन प्रगतिशील वार्षिक योजना को केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति से मंजूरी मिली होनी चाहिए. श्रेणी बी के खनन पट्टों के मामले में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना तथा मुआवजे से संबंधित गारंटी राशि निगरानी समिति के पास जमा होना भी आवश्यक है.
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खनन गतिविधियों से जुड़े सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्वों की अनदेखी न हो. केवल खनिज मौजूद होने के आधार पर उसकी बिक्री की अनुमति नहीं दी जाएगी, बल्कि पट्टाधारक को अदालत द्वारा तय किए गए पुराने दायित्वों और पुनर्वास संबंधी शर्तों का पालन भी साबित करना होगा.
भारतीय खान ब्यूरो के रिकॉर्ड में दर्ज होना जरूरी
बची हुई खनिज सामग्री को लेकर अदालत ने रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी विशेष जोर दिया है. बिक्री के लिए प्रस्तावित खनिज वह होना चाहिए, जिसका विवरण पट्टा समाप्त होने से पहले भारतीय खान ब्यूरो के समक्ष दाखिल किए गए रिटर्न में दर्ज था.
इसके अलावा पट्टा समाप्त होने के समय संबंधित खनन क्षेत्र के पास वैध पर्यावरणीय और वन स्वीकृतियां होना भी आवश्यक शर्तों में शामिल किया गया है. इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि बाद में किसी ऐसे खनिज को वैधता का आधार न मिल जाए, जिसके उत्खनन की प्रक्रिया स्वयं निर्धारित अनुमतियों के अनुरूप नहीं थी.
कुल स्टॉक की पांच प्रतिशत सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने खनिज बिक्री की मात्रा को लेकर भी स्पष्ट सीमा निर्धारित की है. पहले बेचे जा चुके खनिज और अब बेचे जाने वाले खनिज की कुल मात्रा, सितंबर 2011 से पहले भारतीय खान ब्यूरो के समक्ष घोषित स्टॉक के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए.
अदालत ने दो प्रकार के खनिज को इस व्यवस्था से अलग रखा है. पहला, वह खनिज जो ओवरबर्डन डंप से निकाला या संसाधित किया गया हो और दूसरा, स्टॉकयार्ड में पड़ा खनिज, जिस पर 2012 के अदालत के आदेश के तहत अलग व्यवस्था लागू है.
इस तरह अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि समाप्त खनन पट्टों से संबंधित हर खनिज को बिक्री की सामान्य अनुमति नहीं मिलेगी. प्रत्येक मामले में निर्धारित शर्तों का परीक्षण करना होगा.
केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति करेगी विवादित मामलों की जांच
जिन आवेदनों में सभी निर्धारित शर्तों के पूरे होने का दावा किया गया है, उनमें से एक विशेष पट्टे से संबंधित मामले में कर्नाटक के महाधिवक्ता को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है. वहीं जिन अन्य आवेदनों में तथ्य या पात्रता विवादित है, उन्हें नए सिरे से जांच के लिए केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के पास भेजा गया है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तय किए गए 11 बिंदुओं में किसी तरह की छूट स्वतः नहीं दी जाएगी. किसी शर्त में राहत देने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के माध्यम से होगा.
वन भूमि को खनन की अनुमति नहीं माना जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने खनन ब्लॉकों के एकीकरण के दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी आदेश दिया. अदालत ने श्रेणी ए, बी और सी के खनन पट्टों को आसपास की अप्रयुक्त वन भूमि के साथ मिलाकर नीलामी के लिए एक संयुक्त और सुसंगत ब्लॉक बनाने की अनुमति दी है.
हालांकि अदालत ने इस अनुमति के साथ एक महत्वपूर्ण सीमा भी तय की. संयुक्त ब्लॉक में वन भूमि शामिल होने मात्र से उस क्षेत्र में खनन का अधिकार नहीं मिल जाएगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि अप्रयुक्त वन भूमि की कानूनी स्थिति अलग है और उस पर खनन के लिए संबंधित वन कानून के तहत आवश्यक स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होगा.
संयुक्त ब्लॉक से वन क्षेत्र में खनन का अधिकार नहीं
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी संयुक्त खनन पट्टे या नीलामी ब्लॉक में वन क्षेत्र को शामिल करने का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि उस क्षेत्र में खनन की मंजूरी मिल गई है. जिस हिस्से के लिए आवश्यक वन स्वीकृति उपलब्ध नहीं है, वहां खनन नहीं किया जा सकेगा.
इस मुद्दे पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने संयुक्त ब्लॉक बनाने की व्यवस्था का विरोध किया था. उनका तर्क था कि इससे संवेदनशील वन क्षेत्रों के खनन के लिए खुलने और बड़ी कंपनियों के कुछ क्षेत्रों पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने की आशंका पैदा हो सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि एकीकरण की अनुमति दी, लेकिन वन क्षेत्र को स्पष्ट कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हुए कहा कि संयुक्त ब्लॉक का गठन अपने आप में वन भूमि पर खनन का अधिकार नहीं देता.
पुरानी स्वीकृतियां नए नीलामी खरीदार को हस्तांतरित हो सकेंगी
अदालत ने खनन क्षेत्र से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण व्यवस्था को भी मंजूरी दी है. खनन कानून की धारा 8बी के तहत पहले से प्राप्त कुछ स्वीकृतियों को नीलामी में खनन क्षेत्र हासिल करने वाले नए खरीदार को हस्तांतरित करने की अनुमति दी गई है.
इससे उन खनन क्षेत्रों में प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सुविधा मिल सकती है, जहां नीलामी के बाद नया संचालक सामने आता है. संबंधित आवेदनों का अदालत ने इसी व्यवस्था के अनुसार निपटारा किया.
राजस्व और वन भूमि की स्थिति पर हाईकोर्ट करेगा फैसला
अदालत ने एक अलग आवेदन को भी बंद कर दिया, जिसमें किसी पट्टे वाली भूमि की राजस्व भूमि और वन भूमि के रूप में स्थिति को लेकर विवाद था. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न को कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष तय करने के लिए भेज दिया है और हाईकोर्ट को तीन महीने के भीतर इस मुद्दे पर निर्णय लेने को कहा है.
इससे स्पष्ट है कि भूमि की कानूनी प्रकृति से जुड़े विवाद को केवल खनन पट्टे या नीलामी के आधार पर समाप्त नहीं माना जाएगा. संबंधित भूमि की स्थिति का निर्धारण सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा.
29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
कर्नाटक में अवैध खनन से संबंधित यह मामला लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है. अदालत ने अब तक खनन गतिविधियों, पर्यावरणीय प्रभाव, खनिज भंडार और पुनर्वास से जुड़े कई पहलुओं पर निगरानी रखी है.
ताजा आदेश में अदालत ने समाप्त खनन पट्टों में पड़े खनिजों की बिक्री के लिए स्पष्ट नियम तय करने के साथ भविष्य की नीलामी में वन भूमि को लेकर भी सीमाएं निर्धारित कर दी हैं. इससे एक ओर पुराने खनिज स्टॉक के निपटान की प्रक्रिया के लिए कानूनी ढांचा तैयार हुआ है, वहीं दूसरी ओर वन क्षेत्र को केवल संयुक्त नीलामी ब्लॉक का हिस्सा बनाए जाने से वहां स्वतः खनन अधिकार मिलने की संभावना को अदालत ने स्पष्ट रूप से नकार दिया है.
मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी. उस दौरान लंबित आवेदनों और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की जांच से जुड़े पह
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