बेटी कर्मचारी मुआवजे की आश्रित नहीं, मां की लंबित याचिका भी नहीं चला सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बेटी कर्मचारी मुआवजे की आश्रित नहीं, मां की लंबित याचिका भी नहीं चला सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

प्रेषित समय :22:18:08 PM / Tue, Sep 15th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारी की मृत्यु के बाद लंबित मुआवजा दावे में उसके परिवार के सदस्य के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 2(1)(डी) के तहत विवाहित बेटी सामान्यतः ‘आश्रित’ नहीं मानी जाती है. ऐसी स्थिति में यदि मूल दावेदार की मृत्यु मुआवजा प्रकरण के लंबित रहने के दौरान हो जाती है और उस समय तक उसके पक्ष में कोई अवॉर्ड पारित नहीं हुआ है, तो विवाहित बेटी केवल कानूनी उत्तराधिकारी होने के आधार पर उस व्यक्तिगत मुआवजा दावे को आगे नहीं चला सकती.

न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने श्रमिक की मौत से जुड़े मामले में उसकी विवाहित बेटी नंदा सोनी को दी गई मुआवजा राशि को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की राशि मूल दावेदार के जीवनकाल में उसके पक्ष में अवॉर्ड होने पर ही उसकी संपत्ति का हिस्सा बन सकती थी. चूंकि मूल दावेदार की मृत्यु अवॉर्ड पारित होने से पहले हो गई थी, इसलिए दावा आगे चलाने का अधिकार विवाहित बेटी को नहीं मिला.

फैक्ट्री की दीवार गिरने से हुई थी पदुम बहादुर सोनी की मौत
मामला पदुम बहादुर सोनी की मृत्यु से जुड़ा है. बताया गया कि वह एम/एस सूरज पल्सेस इंडस्ट्रीज में कार्यरत थे. 26 अप्रैल 2015 को रोजगार के दौरान फैक्ट्री की सीमा दीवार उनके ऊपर गिर गई. हादसे में उन्हें गंभीर चोटें आईं और उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई.

इसके बाद उनकी पत्नी सुराजी बाई सोनी ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 22 के तहत मुआवजे का दावा प्रस्तुत किया. हालांकि, नियोक्ता ने पदुम बहादुर सोनी और प्रतिष्ठान के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध होने से ही इनकार किया था.

मामले की कार्यवाही आगे बढ़ रही थी, इसी दौरान 10 मई 2021 को साक्ष्य दर्ज किए जाने के दौरान सुराजी बाई सोनी की मृत्यु हो गई.

मां की जगह बेटी ने मांगा प्रतिस्थापन
मूल दावेदार सुराजी बाई सोनी की मृत्यु के बाद उनकी बेटी नंदा सोनी ने उनकी जगह स्वयं को प्रतिस्थापित करने के लिए आवेदन किया. नियोक्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि विवाहित बेटी कर्मचारी मुआवजा अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के अर्थ में ‘आश्रित’ नहीं है.

इसके बावजूद 6 मई 2022 को श्रम न्यायालय ने प्रतिस्थापन आवेदन स्वीकार कर लिया. इसके बाद श्रम न्यायालय ने ₹6,12,360 का मुआवजा निर्धारित किया. इस राशि पर आवेदन की तारीख से 10 प्रतिशत ब्याज भी निर्धारित किया गया था और अवॉर्ड में कुछ शर्तें भी लगाई गई थीं.

इसके बाद नंदा सोनी ने मुआवजा बढ़ाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया. उन्होंने दुर्घटना की तारीख से 12 प्रतिशत ब्याज और पेनल्टी की भी मांग की. दूसरी ओर नियोक्ता ने दावे की पोषणीयता को चुनौती देते हुए अवॉर्ड को निरस्त करने की मांग की.

हाईकोर्ट ने धारा 2(1)(डी) के प्रावधान को देखा
नियोक्ता की ओर से कर्मचारी मुआवजा अधिनियम में ‘आश्रित’ की वैधानिक परिभाषा और Amarsai Amar Singh Netam के फैसले पर भरोसा किया गया. वहीं दावेदार की ओर से प्रतिस्थापन आदेश को अंतिम रूप प्राप्त होने और Praveen Banu Nasir Khan के फैसले का हवाला दिया गया.

हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 2(1)(डी) के तहत ‘आश्रित’ की परिभाषा का परीक्षण किया. कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान को सामान्य रूप से पढ़ने पर विवाहित बेटी इसमें शामिल नहीं होती.

कोर्ट ने कहा—

“उपरोक्त प्रावधान को सरलता से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि विवाहित बेटी को अधिनियम, 1923 की धारा 2(1)(डी) के तहत ‘आश्रित’ रिश्तेदार में शामिल नहीं किया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से केवल ‘अविवाहित बेटी’ को शामिल किया गया है.”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 2(1)(डी)(iii) में निर्धारित विशेष परिस्थितियों में ही विवाहित बेटी वैधानिक परिभाषा के दायरे में आ सकती है. इसके तहत उसे दत्तक और नाबालिग अथवा विधवा और नाबालिग होने जैसी परिस्थितियों में होना चाहिए. कोर्ट ने रिकॉर्ड पर कहा कि “यहां ऐसा मामला नहीं है और विद्वान श्रम न्यायालय के समक्ष इस संबंध में न तो कोई साक्ष्य पर चर्चा की गई और न ही प्रस्तुत किया गया.”

अवॉर्ड पहले हो जाता तो स्थिति अलग होती
हाईकोर्ट ने मूल दावेदार की मृत्यु के बाद लंबित मुआवजा दावे के अधिकार को लेकर Amarsai Amar Singh Netam (since dead) through proposed appellant Sukhchand v. M/s N.C. Nehar & Others मामले में दिए गए सिद्धांत पर भरोसा किया.

कोर्ट ने लंबित व्यक्तिगत दावे और पहले से मिल चुके अवॉर्ड के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना. कोर्ट ने कहा कि यदि मूल दावेदार के पक्ष में अवॉर्ड उसके जीवनकाल में पारित हो गया होता तो कानूनी उत्तराधिकारी उसकी जगह दावा कर सकता था, क्योंकि अवॉर्ड की राशि मृतक की संपत्ति का हिस्सा बन जाती.

कोर्ट ने इस सिद्धांत को इस प्रकार दर्ज किया कि यदि अपीलकर्ता के पिता के पक्ष में अवॉर्ड हो गया होता तो वह कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में उनके स्थान पर प्रतिस्थापन का दावा कर सकता था, क्योंकि अवॉर्ड की राशि उनके मृतक पिता की संपत्ति का हिस्सा बन जाती.

इसके साथ ही कोर्ट ने उस सिद्धांत को भी लागू किया कि दावे का अधिकार मूल दावेदार के लिए व्यक्तिगत था और उसकी मृत्यु के बाद वह अधिकार स्वतः अपीलकर्ता के पक्ष में जीवित नहीं रहता.

विवाहित बेटी के लिए दावा आगे बढ़ाने का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत वैधानिक मुआवजा मांगने का अधिकार मृत कर्मचारी के निर्धारित ‘आश्रितों’ तक सीमित है.

कोर्ट ने कहा कि यदि सुराजी बाई सोनी के जीवनकाल में उनके पक्ष में मुआवजे का अवॉर्ड पारित हो गया होता तो मुआवजा राशि उनकी संपत्ति का हिस्सा बनती और अपीलकर्ता कानूनी प्रतिनिधि के रूप में उस राशि का दावा कर सकती थी.

लेकिन इस मामले में सुराजी बाई सोनी की मृत्यु मुआवजा दावा लंबित रहने के दौरान हुई और किसी भी अवॉर्ड के पारित होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई. इसलिए कारण-ए-दावा नंदा सोनी के पक्ष में जीवित नहीं रहा, क्योंकि वह अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के तहत ‘आश्रित’ नहीं थीं.

ब्याज को लेकर भी कोर्ट ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम की धारा 4ए(3) के तहत ब्याज और पेनल्टी से जुड़े प्रावधानों की भी समीक्षा की.

Shobha v. The Chairman, Vitthal Rao Shinde मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा—

“इसलिए कर्मचारी/मृतक की मृत्यु के तुरंत बाद मुआवजे की राशि देय मानी जा सकती है.”

कोर्ट ने आगे कहा कि बकाया मुआवजे की राशि पर ब्याज की देनदारी दुर्घटना की तारीख से होगी, न कि आयुक्त द्वारा आदेश पारित किए जाने की तारीख से.

इसी प्रकार Ajay Kumar Das v. Divisional Manager मामले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मुआवजा दुर्घटना की तारीख से देय होता है और ब्याज भी उसी तारीख से देय होता है.

कोर्ट ने दर्ज किया कि मुआवजा दुर्घटना की तारीख को ही देय हो जाता है और मुआवजे तथा ब्याज की गणना उसी तारीख से लेकर राशि की वसूली तक की जानी चाहिए, न कि अवॉर्ड की तारीख से.

इस आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि श्रम न्यायालय द्वारा आवेदन की तारीख से 10 प्रतिशत ब्याज देने की शर्त धारा 4ए(3)(ए) के अनुरूप नहीं थी. कोर्ट के अनुसार ब्याज 12 प्रतिशत सालाना दुर्घटना/मृत्यु की तारीख से दिया जाना चाहिए था. हालांकि, चूंकि नंदा सोनी वैधानिक आश्रित नहीं थीं, इसलिए ब्याज से जुड़े ये मुद्दे अंततः केवल सैद्धांतिक रह गए.

श्रम न्यायालय का अवॉर्ड निरस्त
हाईकोर्ट ने अंततः नियोक्ता की अपील MAC No. 1494 of 2022 को स्वीकार कर लिया. कोर्ट ने 13 सितंबर 2022 को कर्मचारी मुआवजा आयुक्त-सह-श्रम न्यायालय, बिलासपुर द्वारा Case No. 06/WC Act/2015/Fatal में पारित निर्णय और अवॉर्ड को निरस्त कर दिया.

इसके परिणामस्वरूप दावेदार द्वारा दायर MAC No. 1311 of 2022 खारिज कर दी गई.

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि मुआवजे की कोई राशि और उस पर अर्जित ब्याज कर्मचारी मुआवजा आयुक्त/श्रम न्यायालय के पास जमा है तो उचित सत्यापन के बाद उसे नियोक्ता को वापस किया जाए.

मामले की प्रमुख जानकारी
मामला: Smt. Nanda Soni v. M/s Suraj Pulses Industries
न्यूट्रल साइटेशन: 2026:CGHC:38956
केस नंबर: MAC No. 1311 of 2022 और MAC No. 1494 of 2022
पीठ: न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी
मृतक: पदुम बहादुर सोनी
मूल दावेदार: सुराजी बाई सोनी
दावेदार: नंदा सोनी
नियोक्ता: एम/एस सूरज पल्सेस इंडस्ट्रीज
दुर्घटना की तारीख: 26 अप्रैल 2015
मूल दावेदार की मृत्यु: 10 मई 2021
श्रम न्यायालय का अवॉर्ड: ₹6,12,360
अवॉर्ड की तारीख: 13 सितंबर 2022
अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व: याचिकाकर्ताओं की ओर से श्री प्रवीण कुमार तुलस्यान के साथ श्री विकास पटेल अधिवक्ता उपस्थित रहे. प्रतिवादियों की ओर से श्री अपूर्व गोयल, अधिवक्ता ने पैरवी की.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-