नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने युवा वकीलों के पेशेवर प्रशिक्षण और अदालत में व्यवहार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि कानून की डिग्री हासिल करने के तुरंत बाद स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर देने वाले युवा वकील यदि किसी अनुभवी या वरिष्ठ वकील के साथ काम करके प्रशिक्षण नहीं लेते हैं, तो वे वकालत के वास्तविक कौशल, पेशेवर व्यवहार और इस पेशे की बारीकियों को सीखने से वंचित रह सकते हैं. उन्होंने युवा वकीलों के लिए तकनीकी कानूनी ज्ञान के साथ-साथ ‘सॉफ्ट स्किल्स’ विकसित करने को भी महत्वपूर्ण बताया.
जस्टिस नागरत्ना की ये टिप्पणियां “Puja Films, now known as M/S. Puja Entertainment (India) Ltd. v. Tips Industries Pvt. Limited, also known as Tips Music Limited” मामले की सुनवाई के दौरान सामने आईं. मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बॉम्बे हाईकोर्ट की कार्यवाही से जुड़ा विवाद था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल विवाद यानी मेरिट पर कोई फैसला नहीं दिया और संबंधित पक्षों को बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा किया. (Live Law Biz)
अदालत में बहस के दौरान युवा वकीलों के व्यवहार का मुद्दा
सुनवाई के दौरान पूजा एंटरटेनमेंट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील और टिप्स इंडस्ट्रीज की ओर से पेश वकील के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई कार्यवाही को लेकर बहस हुई. टिप्स की ओर से पेश वकील ने वरिष्ठ वकील की ओर से रखे गए कुछ तथ्यों पर आपत्ति जताई और दावा किया कि कार्यवाही के दौरान पूरी तरह गलत तथ्य प्रस्तुत किए गए थे.
एक चरण पर प्रतिवादी पक्ष के वकील ने यह भी कहा कि उन्हें दलीलों का जवाब देने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा कि यह नहीं कहा जाना चाहिए कि उन्हें अवसर नहीं दिया गया.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई आदेश पारित नहीं किया है. इसी प्रसंग में जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों के अदालत में व्यवहार और पेशेवर मर्यादा से जुड़े व्यापक पहलुओं पर अपनी बात रखी.
जोश के साथ यह समझना भी जरूरी कि अदालत में क्या बोलना है
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बार के युवा सदस्यों को अपने जोश, उत्साह और प्रयासों के बीच यह समझना चाहिए कि अदालत में क्या कहना है और क्या नहीं कहना है. उनके अनुसार कानूनी पेशे में केवल कानून की जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं है. अदालत की कार्यप्रणाली, न्यायाधीशों के सामने अपनी बात रखने का तरीका, वरिष्ठ वकीलों के तर्क सुनना और पेशेवर संबंधों को बनाए रखना भी प्रशिक्षण का हिस्सा है.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अदालत में काम करने का वास्तविक अनुभव केवल किताबें पढ़कर हासिल नहीं किया जा सकता. इसके लिए अदालत की कार्यवाही को देखना, वरिष्ठों को सुनना और लगातार उनके काम करने के तरीके को समझना जरूरी है.
डिग्री मिली और अगले दिन ऑफिस खोल लिया
जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों में बढ़ती महत्वाकांक्षा का उल्लेख करते हुए कहा कि आज कई युवा कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद तुरंत स्वतंत्र कार्यालय शुरू कर देना चाहते हैं. उन्होंने इस प्रवृत्ति के संदर्भ में सवाल उठाया कि तकनीकी ज्ञान तो कानून की पढ़ाई से मिल सकता है, लेकिन पेशे में जरूरी सॉफ्ट स्किल्स कहां से विकसित होंगी.
उन्होंने कहा कि किसी वरिष्ठ के साथ काम करने के दौरान युवा वकील प्रतिदिन अनेक ऐसी बातें सीखते हैं जो पुस्तकों में नहीं मिलतीं. अदालत में कब बोलना है, किस तरह अपनी बात रखनी है, न्यायाधीश के प्रश्न का उत्तर कैसे देना है और दूसरे पक्ष के वकील के साथ किस तरह पेश आना है—ये सभी बातें व्यावहारिक अनुभव से विकसित होती हैं.
उनके अनुसार, “पेशे की बारीकियां” और अच्छे तौर-तरीके एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते रहे हैं. इसी परंपरा को आगे बढ़ाने में वरिष्ठ वकीलों की भी भूमिका है.
हार्ड स्किल्स के साथ सॉफ्ट स्किल्स भी जरूरी
जस्टिस नागरत्ना ने कानूनी पेशे के प्रशिक्षण को केवल कानून की धाराओं और न्यायिक फैसलों तक सीमित नहीं माना. उन्होंने ‘हार्ड स्किल्स’ और ‘सॉफ्ट स्किल्स’ के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया.
कानून की पढ़ाई से किसी युवा वकील को कानूनी प्रावधान, निर्णयों का अध्ययन, याचिका तैयार करने और कानूनी शोध जैसी तकनीकी क्षमताएं मिल सकती हैं. लेकिन अदालत में संवाद, संयम, सुनने की क्षमता, वरिष्ठों और न्यायालय के प्रति उचित व्यवहार तथा परिस्थितियों के अनुसार अपनी दलील रखने की क्षमता लंबे व्यावहारिक अनुभव से विकसित होती है.
जस्टिस नागरत्ना के अनुसार, ये कौशल वरिष्ठ वकीलों के साथ काम करते हुए रोजमर्रा की अदालत प्रक्रिया में विकसित होते हैं.
खुद के शुरुआती दिनों को भी किया याद
जस्टिस नागरत्ना ने अपने शुरुआती वकालत के दिनों का उल्लेख करते हुए बताया कि उस समय युवा वकीलों के पास कई बार केवल एक मामला या ‘मेंशनिंग’ का काम होता था. बाकी समय वे अदालत कक्ष में बैठकर कार्यवाही देखते और वरिष्ठ वकीलों तथा न्यायाधीशों के काम करने के तरीके को समझते थे.
उन्होंने बताया कि युवा वकील कभी-कभी उन अदालतों में भी बैठते थे जहां न्यायाधीशों के प्रश्न और कार्यप्रणाली को समझने का अवसर मिलता था. इससे उन्हें यह सीखने में मदद मिलती थी कि जब वे स्वयं किसी मामले में उन न्यायाधीशों के सामने पेश हों तो प्रश्नों का जवाब किस तरह देना है और अपनी दलील किस तरीके से रखनी है.
उन्होंने कहा कि वे न्यायाधीशों और दूसरे राज्यों से आने वाले मुख्य न्यायाधीशों की कार्यशैली को देखते थे तथा यह समझने की कोशिश करते थे कि अपने मुवक्किल के हित में खुद को अदालत की अपेक्षाओं के अनुरूप कैसे ढाला जाए.
रजिस्ट्री से व्यवहार भी वकालत की सीख का हिस्सा
पूजा एंटरटेनमेंट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने भी जस्टिस नागरत्ना की बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि वकील अदालत की रजिस्ट्री के साथ बातचीत और कामकाज के दौरान भी बहुत कुछ सीखते हैं.
उन्होंने अपने ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ के अनुभव को याद करते हुए बताया कि वे एओआर बनने की इच्छा रखने वाले वकीलों को रजिस्ट्री के साथ व्यवहार करते समय विनम्र रहने और वहां की कार्यप्रणाली को समझने की सलाह देते थे.
इससे यह पहलू सामने आया कि वकालत का प्रशिक्षण केवल कोर्टरूम में दलील देने तक सीमित नहीं है. न्यायालय की प्रशासनिक प्रक्रिया और रजिस्ट्री के साथ पेशेवर संवाद भी अधिवक्ता के काम का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
वरिष्ठ वकीलों पर भी है जिम्मेदारी
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पेशे की परंपराओं और अच्छे तौर-तरीकों को युवा वकीलों तक पहुंचाना वरिष्ठ वकीलों की जिम्मेदारी है. उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से अपेक्षा जताई कि वे बार के जूनियर सदस्यों को केवल कानूनी काम ही न सिखाएं, बल्कि पेशेवर आचरण और अदालत की परंपराओं से भी परिचित कराएं.
उन्होंने वरिष्ठ वकीलों को इस प्रक्रिया में “मशाल-वाहक” की भूमिका निभाने की बात कही, ताकि कानूनी पेशे में अर्जित अनुभव और परंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहें.
आज विरोधी पक्ष कल साथ खड़ा हो सकता है
जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों को यह भी याद रखने की बात कही कि अदालत में किसी मामले में एक-दूसरे के खिलाफ पेश होने वाले वकील भविष्य में किसी दूसरे मामले में एक ही पक्ष की ओर से साथ पेश हो सकते हैं.
इस टिप्पणी के माध्यम से उन्होंने पेशेवर संबंधों में संयम और शिष्टाचार के महत्व की ओर संकेत किया. अदालत में किसी मामले को लेकर मतभेद होना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर पेशेवर संबंधों और मर्यादा को बनाए रखना भी बार की कार्यसंस्कृति का महत्वपूर्ण पहलू है.
फिल्म और दो गानों को लेकर था मूल विवाद
मामले की पृष्ठभूमि फिल्म “है जवानी तो इश्क होना है” और उससे जुड़े दो गानों “चुनरी चुनरी” तथा “इश्क सोना है” को लेकर विवाद से जुड़ी है. पूजा एंटरटेनमेंट ने बॉम्बे हाईकोर्ट में फिल्म और गानों की रिलीज के खिलाफ तत्काल राहत की मांग की थी.
इससे पहले बिहार के कटिहार की सिविल कोर्ट में भी इसी फिल्म और गानों से संबंधित राहत के लिए कार्यवाही शुरू की गई थी. याचिका के अनुसार सिविल कोर्ट ने 6 मई को एकतरफा यथास्थिति का आदेश पारित किया था. बाद में इस आदेश को पटना हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी.
इसके बाद पूजा एंटरटेनमेंट ने बिहार में लंबित मुकदमा वापस लेने और बॉम्बे हाईकोर्ट में उचित कार्यवाही करने की अनुमति मांगी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने मेरिट पर नहीं दिया फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिल्म की निर्धारित रिलीज से दो दिन पहले तत्काल याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया था. हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि बिहार में पहले से कार्यवाही चल रही थी और बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष दायर आवेदन पर समय रहते आवश्यक राहत की मांग की गई थी या नहीं, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी.
मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मूल कॉपीराइट विवाद के गुण-दोष पर विचार नहीं किया. जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का सरोकार मामले की मेरिट से नहीं है और संबंधित पक्ष बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता की ओर से अंतरिम राहत के लिए दायर अर्जियों पर कानून के अनुसार “जितनी जल्दी हो सके” विचार किया जाए, बशर्ते अर्जियों में मौजूद कमियां दूर कर दी गई हों.
इस प्रकार मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश मूल कॉपीराइट विवाद का अंतिम निर्धारण नहीं करता. सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना की टिप्पणियां मुख्य रूप से युवा वकीलों के व्यावहारिक प्रशिक्षण, अदालत में पेशेवर आचरण, वरिष्ठ-जूनियर संबंधों और कानूनी पेशे की परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी पर केंद्रित रहीं.
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