महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न शिकायतों के लिए देशभर में बनेगा अलग तंत्र, केंद्र और बीसीआई से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा नियमों का मसौदा

महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न शिकायतों के लिए देशभर में बनेगा अलग तंत्र, केंद्र और बीसीआई से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा नियमों का मसौदा

प्रेषित समय :21:33:26 PM / Fri, Sep 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निवारण को लेकर महत्वपूर्ण दिशा में पहल करते हुए केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से देशभर की अदालतों और न्यायिक-अर्धन्यायिक संस्थाओं के लिए एक समान नियम तैयार करने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट, जिला और तालुका अदालतों के साथ-साथ केंद्र एवं राज्य सरकारों के ट्रिब्यूनल तथा अन्य अर्धन्यायिक प्राधिकरणों में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है. 

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के समक्ष “Seema Joshi v. Bar Council of India and Ors.”, रिट याचिका (सिविल) नंबर 805/2025 की सुनवाई हुई. अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में लागू 2013 के जेंडर सेंसिटाइजेशन और यौन उत्पीड़न संबंधी नियम विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट परिसर के लिए बनाए गए हैं. अब इसी तरह की व्यवस्था देश के अन्य न्यायिक और अर्धन्यायिक परिसरों में लागू करने के लिए अलग नियमों की जरूरत है. 

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 यानी पीओएसएच कानून को कानूनी पेशे से जुड़ी महिलाओं पर एक ही तरह के ढांचे में लागू नहीं किया जा सकता. अदालत के अनुसार वकीलों की पेशेवर स्थिति पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से अलग होती है. ऐसे में शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी पेशे की परिस्थितियों के अनुरूप अलग संस्थागत व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है. 

पीठ ने संबंधित पक्षों के वकीलों से आपसी विचार-विमर्श कर ऐसा नियमों का सेट तैयार करने को कहा, जो हाईकोर्ट, जिला न्यायपालिका, तालुका अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य अर्धन्यायिक संस्थाओं में लागू हो सके.

सुप्रीम कोर्ट के 2013 के नियमों को बनाया आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहां लागू ‘जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वूमेन एट द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल रेगुलेशंस, 2013’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नियमों में सुप्रीम कोर्ट परिसर में महिला वकीलों के लिए शिकायत निवारण की व्यवस्था मौजूद है. 

जस्टिस नागरत्ना ने संकेत दिया कि इसी व्यवस्था को आधार बनाकर प्रत्येक राज्य के हाईकोर्ट परिसर और फिर संबंधित अदालतों के स्तर पर आवश्यकतानुसार नियम बनाए जा सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि नियमों को सभी बार काउंसिल के माध्यम से लागू करने की संभावना पर विचार किया जाना चाहिए.

अदालत के समक्ष मुख्य चुनौती यही है कि सुप्रीम कोर्ट में काम कर रहे मौजूदा तंत्र के अनुभव को देशभर की अलग-अलग न्यायिक संरचनाओं में किस तरह लागू किया जाए.

बीसीआई से राज्य बार काउंसिलों की स्थिति जानने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह पता लगाने का निर्देश दिया कि क्या विभिन्न राज्य बार काउंसिल पहले से महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न शिकायतों के लिए कोई नियम या व्यवस्था लागू कर रही हैं.

बीसीआई की ओर से पेश वकील राधिका गौतम ने अदालत को बताया कि वह आवश्यक निर्देश प्राप्त करेंगी और कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं के लिए एक समान नियम लाने का प्रयास करेंगी. उन्होंने राज्य बार काउंसिलों से मौजूदा व्यवस्थाओं की जानकारी लेने के लिए समय भी मांगा. 

इससे यह प्रक्रिया सामने आती है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था तैयार करने से पहले अलग-अलग राज्यों में लागू मौजूदा तंत्र का अध्ययन किया जाएगा.

यह मामला मूल रूप से महिला वकीलों को पीओएसएच कानून के तहत संरक्षण दिए जाने की मांग से जुड़ा है. अधिवक्ता सीमा जोशी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. उनकी याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि अदालतों में स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों के लिए यौन उत्पीड़न की शिकायतों के निवारण का प्रभावी संस्थागत तंत्र होना चाहिए. मामले का वर्तमान रिकॉर्ड इसे Seema Joshi v. Bar Council of India and Ors., W.P. (C) No. 805 of 2025 के रूप में दर्ज करता है. 

याचिका की पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट का वह दृष्टिकोण भी रहा, जिसमें पीओएसएच कानून के संदर्भ में बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के कर्मचारियों तथा प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं के बीच अंतर पर विचार किया गया था. सुप्रीम कोर्ट में दायर चुनौती ने इसी कानूनी स्थिति को व्यापक प्रश्न के रूप में उठाया. )

नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध नहीं होने से पैदा होती है कानूनी जटिलता
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने उस व्यावहारिक समस्या की ओर ध्यान दिलाया कि वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिवक्ताओं के बीच सामान्य अर्थों में नियोक्ता-कर्मचारी जैसा संबंध नहीं होता. ऐसे में केवल किसी कार्यालय या न्यायालय के कर्मचारियों के लिए बनाई गई पीओएसएच व्यवस्था से महिला वकीलों की शिकायतों का पूरा समाधान नहीं हो सकता.

यही कारण है कि अदालत ने कानूनी पेशे की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अलग नियमों की जरूरत पर जोर दिया.

एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 पर भी हुई चर्चा
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महालक्ष्मी पावनी ने दलील दी कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 में पेशेवर कदाचार के संबंध में कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन यह व्यवस्था पीओएसएच कानून के तहत अपेक्षित शिकायत निवारण तंत्र का विकल्प नहीं हो सकती.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मेधा कोतवाल लेले बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के स्तर पर महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न शिकायतों से निपटने के लिए तंत्र विकसित करने की दिशा में निर्देशों का संदर्भ दिया गया. 

दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि एडवोकेट्स एक्ट इस विषय से निपटने के लिए पर्याप्त व्यापक है. इस तरह सुनवाई में यह सवाल भी सामने आया कि मौजूदा पेशेवर अनुशासन व्यवस्था और यौन उत्पीड़न शिकायतों के लिए विशेष तंत्र के बीच किस तरह का संबंध होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट का तंत्र अन्य अदालतों में दोहराने पर जोर
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लागू व्यवस्था का अध्ययन कर उसे हाईकोर्ट और अन्य अदालतों के लिए आवश्यक बदलावों के साथ अपनाया जा सकता है. उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य के हाईकोर्ट परिसर के लिए उपयुक्त नियम बनाए जाएं और फिर अदालत के स्तर के अनुसार व्यवस्था विकसित की जाए.

अदालत की इस पहल का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि केवल पीओएसएच अधिनियम के प्रावधानों को दोहराने के बजाय कानूनी पेशे की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर संस्थागत नियम तैयार करने पर जोर दिया गया है.

बार काउंसिलों की भूमिका भी होगी महत्वपूर्ण
प्रस्तावित व्यवस्था में बार काउंसिलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई से राज्य बार काउंसिलों की मौजूदा व्यवस्थाओं की जानकारी जुटाने को कहा है. इसके बाद यह देखा जाएगा कि अलग-अलग राज्यों में पहले से मौजूद तंत्र में कौन से प्रावधान हैं और उन्हें एक व्यापक व्यवस्था का आधार किस तरह बनाया जा सकता है.

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि महिला वकीलों की शिकायतों के लिए केवल न्यायालय प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय कानूनी पेशे के नियामक निकायों को भी व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर विचार हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 25 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है. तब तक बीसीआई को राज्य बार काउंसिलों से मौजूदा नियमों और व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी जुटानी है. संबंधित पक्ष प्रस्तावित साझा नियमों पर भी विचार करेंगे. 

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों की शिकायतों के लिए कोई अंतिम देशव्यापी नियम घोषित नहीं किया है. अदालत ने केंद्र सरकार, बीसीआई और संबंधित पक्षों को एक ऐसा ढांचा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ने को कहा है, जो हाईकोर्ट, जिला एवं तालुका अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य अर्धन्यायिक संस्थाओं में काम करने वाली महिला वकीलों की परिस्थितियों के अनुरूप हो. मामले में आगे की दिशा 25 नवंबर की सुनवाई और उसके बाद अदालत के आदेशों से स्पष्ट होगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-