रात 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन उठाना कानूनन वसूली नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंसर को ठहराया जिम्मेदार

रात 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन उठाना कानूनन वसूली नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंसर को ठहराया जिम्मेदार

प्रेषित समय :21:57:04 PM / Fri, Sep 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. कर्ज की वसूली के लिए वित्तीय संस्थान अपने अधिकारों का इस्तेमाल मनमाने तरीके, बलपूर्वक या अनुबंध में तय प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए नहीं कर सकते. सुप्रीम कोर्ट ने हाइपोथिकेटेड वाहन की जब्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि फाइनेंसर को वाहन कब्जे में लेने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का प्रयोग कानून और लोन एग्रीमेंट में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है. देर रात वाहन उठाना, स्टीयरिंग लॉक तोड़ना और बिना पूर्व नोटिस के वाहन अपने कब्जे में लेना शांतिपूर्ण या वैध रिकवरी प्रक्रिया नहीं मानी जा सकती.

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए वाहन मालिक को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया. अदालत ने वित्तीय कंपनी को दोनों लोन खाते बंद करने तथा वाहन की बिक्री से प्राप्त 4.50 लाख रुपये की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वापस करने का आदेश भी दिया. इसके अलावा मुकदमे की लागत के रूप में 50 हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया.

मामला Cholamandalam Investment and Finance Company Ltd. से लिए गए कमर्शियल व्हीकल लोन और उसके बाद वाहन की कथित जब्ती से संबंधित था.

2019 में लिया था कमर्शियल वाहन लोन
मामले के अनुसार ट्रक मालिक ने वर्ष 2019 में Cholamandalam Investment and Finance Company Ltd. से कमर्शियल व्हीकल लोन लिया था. लोन के लिए संबंधित ट्रक को हाइपोथिकेट किया गया था. बाद में जून 2021 में उसे अतिरिक्त लोन भी दिया गया.

किश्तों के भुगतान में डिफॉल्ट होने के बाद कंपनी ने वर्ष 2022 में वाहन को अपने कब्जे में लिया था. हालांकि, बाद में कर्जदार द्वारा आंशिक भुगतान किए जाने पर वाहन वापस कर दिया गया.

विवाद की अगली कड़ी अप्रैल 2023 में सामने आई, जब ट्रक एक ऐसे स्थान पर खड़ा था जहां सीसीटीवी निगरानी की व्यवस्था थी.

आधी रात में चार लोगों के आने का आरोप
वाहन मालिक के अनुसार अप्रैल 2023 में रात करीब एक बजे चार अज्ञात लोग वहां पहुंचे. आरोप लगाया गया कि उन्होंने ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़ा और वाहन को वहां से लेकर चले गए.

वाहन मालिक ने उसी दिन ई-एफआईआर दर्ज कराई. उसके अनुसार शिकायत के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई. बाद में उसे कानूनी नोटिस के माध्यम से जानकारी मिली कि वित्तीय कंपनी ने वाहन को अपने कब्जे में ले लिया था और बाद में उसे बेच भी दिया.

स्थिति तब और जटिल हो गई जब वाहन बेचने के बाद भी कंपनी की ओर से कर्जदार पर राशि बकाया बताई जा रही थी. इसके बाद विवाद न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया.

फाइनेंसर का अधिकार है लेकिन तरीका कानून के मुताबिक होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वाहन पर फाइनेंसर के अधिकार और उस अधिकार के इस्तेमाल के तरीके के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना. अदालत ने कहा कि हाइपोथिकेटेड वाहन होने का अर्थ यह नहीं है कि वित्तीय संस्था उसे किसी भी तरीके से अपने कब्जे में ले सकती है.

वाहन जब्त करने का अधिकार यदि लोन अनुबंध में दिया गया है तो उसका इस्तेमाल अनुबंध की शर्तों और लागू कानूनों के अनुरूप होना चाहिए. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून का शासन बनाए रखना आवश्यक है और वित्तीय संस्थाएं अपनी वसूली के लिए बल, धोखे या मनमाने तरीके का सहारा नहीं ले सकतीं.

रात में वाहन उठाना शांतिपूर्ण कब्जा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से रात करीब एक बजे वाहन उठाए जाने की परिस्थितियों पर गौर किया. पीठ ने कहा कि स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाना शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा लेना नहीं माना जा सकता.

अदालत ने अपने पुराने फैसले ICICI Bank Ltd. v. Prakash Kaur (2007) का भी उल्लेख किया. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वाहनों की जब्ती के लिए बलपूर्वक या आपराधिक तरीके अपनाए जाने की आलोचना की थी और कानून के शासन को सर्वोपरि बताया था.

मौजूदा मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोन की रिकवरी के लिए फाइनेंसर या उसके एजेंट कानून अपने हाथ में नहीं ले सकते.

आरबीआई के नियमों का भी दिया हवाला
पीठ ने भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी Fair Practices Code और Debt Collection Guidelines का उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि कर्ज की वसूली के दौरान उधारकर्ताओं को परेशान करना, देर रात उनसे संपर्क करना या बल प्रयोग करना स्वीकार्य नहीं है.

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वित्तीय संस्थानों की रिकवरी प्रक्रिया कानून और निर्धारित मानकों के दायरे में रहे. कर्जदार द्वारा भुगतान में चूक होने के बावजूद उसके खिलाफ कार्रवाई करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है.

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि वाहन की जब्ती से संबंधित अनुबंधीय प्रावधान भी कानून के अनुरूप होने चाहिए.

लोन एग्रीमेंट की शर्त पर भी उठाया सवाल
मामले में लोन एग्रीमेंट के अनुच्छेद 11 का भी विवाद उठा. इसमें कहा गया था कि डिफॉल्ट होते ही बिना किसी नोटिस के वाहन पर उधारकर्ता का अधिकार समाप्त हो जाएगा. हालांकि, इसी अनुबंध में वाहन पर कब्जा लेने से पहले सात दिन का नोटिस देने का प्रावधान भी था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी को अनुबंध में निर्धारित नोटिस की प्रक्रिया को अपनी इच्छा से समाप्त करने का अधिकार नहीं माना जा सकता. यदि समझौते में वाहन कब्जे में लेने से पहले सात दिन का नोटिस निर्धारित है तो उस प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए.

पीठ के अनुसार बिना सात दिन का नोटिस दिए वाहन अपने कब्जे में लेने का अधिकार कंपनी को प्राप्त नहीं था.

कब्जे के मेमो पर भी नहीं थे वाहन मालिक के हस्ताक्षर
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों पर भी गौर किया. अदालत ने पाया कि कथित कब्जे के मेमो पर वाहन मालिक के हस्ताक्षर तक नहीं थे.

यह तथ्य भी इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि वाहन को किस प्रक्रिया से कब्जे में लिया गया, इसकी वैधता पर सवाल उठे थे. अदालत ने पूरी कार्रवाई को अनुबंध में तय प्रक्रिया और कानून के मानकों के संदर्भ में परखा.

इस तरह मामला केवल लोन डिफॉल्ट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण बना कि डिफॉल्ट के बाद वित्तीय संस्था वाहन पर अपना अधिकार किस तरीके से लागू कर सकती है.

वाहन मालिक की आजीविका का भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता सीमित साधनों वाला व्यक्ति था और उसकी आजीविका इसी ट्रक पर निर्भर थी. ऐसे व्यक्ति से बिना निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए उसका वाहन छीन लिए जाने का सीधा प्रभाव उसकी कमाई पर पड़ सकता है.

अदालत ने कहा कि जब फाइनेंसर कानून और अनुबंध में निर्धारित प्रक्रिया से बाहर जाकर वाहन को अपने कब्जे में लेता है तो वह अनधिकृत और मनमानी जब्ती के परिणामों के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

इस मामले में वाहन केवल एक संपत्ति नहीं था, बल्कि अपीलकर्ता की आजीविका का साधन भी था. इसलिए वाहन कब्जे में लेने की प्रक्रिया का कानूनी होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

वाहन की बिक्री रद्द नहीं की लेकिन आर्थिक राहत दी
सुप्रीम कोर्ट ने वाहन की बिक्री को रद्द करने का आदेश नहीं दिया. इसके बजाय अदालत ने वित्तीय कंपनी को दोनों लोन खाते बंद करने और वाहन की बिक्री से मिली 4.50 लाख रुपये की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ वापस करने का निर्देश दिया.

इसके अतिरिक्त वाहन मालिक को मानसिक पीड़ा और लंबे समय तक आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया. अदालत ने मुकदमे की लागत के रूप में 50 हजार रुपये भी देने का निर्देश दिया.

इस तरह कंपनी पर वाहन की बिक्री राशि, ब्याज, मुआवजा और मुकदमे की लागत के रूप में अलग-अलग आर्थिक दायित्व डाला गया.

बैंकों और एनबीएफसी के लिए भी सुप्रीम कोर्ट का संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रखा. अदालत ने आरबीआई को निर्देश दिया कि वह गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अपने दिशा-निर्देशों और मास्टर सर्कुलर का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए.

अदालत की चिंता यह थी कि भविष्य में किसी व्यक्ति को बिना नोटिस, उचित प्रक्रिया और प्रभावी कानूनी उपाय के आधी रात में उसकी आजीविका के साधन से वंचित न किया जाए.

फैसले से यह सिद्धांत स्पष्ट होता है कि लोन की किश्तों में डिफॉल्ट होने से फाइनेंसर के अधिकार समाप्त नहीं होते, लेकिन उन अधिकारों का इस्तेमाल कानून से बाहर जाकर भी नहीं किया जा सकता. वाहन हाइपोथिकेटेड होने के बावजूद कब्जा लेने की प्रक्रिया अनुबंध, कानून और नियामकीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए वाहन मालिक को राहत प्रदान की और वित्तीय संस्थाओं की रिकवरी प्रक्रिया में कानून के पालन की आवश्यकता को रेखांकित किया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-