कोर्ट में जमा पैसे और ब्याज के नियमों में होगा बदलाव, सुको ने लॉ कमीशन को सौंपी जिम्मेदारी

कोर्ट में जमा पैसे और ब्याज के नियमों में होगा बदलाव, सुको ने लॉ कमीशन को सौंपी जिम्मेदारी

प्रेषित समय :19:08:05 PM / Sat, Sep 19th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कानून आयोग से अपीलों के दौरान अदालतों और ट्रिब्यूनल में जमा किए जाने वाले पैसे के लिए एक समान व्यवस्था की आवश्यकता की जांच करने को कहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी राशि को जमा करना भुगतान करने के बराबर नहीं है.

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि अदालत में राशि जमा करने और देनदारी से अंतिम रूप से मुक्त होने के बीच कई तरह की संभावनाएं होती हैं, जिनके साथ उतनी ही अनिश्चितता भी जुड़ी रहती है. पीठ ने 18 सितंबर को दिए अपने फैसले में कहा, इस तरह के विवाद चिंताजनक रूप से लगातार सामने आते रहते हैं, फिर भी मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 अपने मौजूदा स्वरूप में सशर्त जमा और उस पर ब्याज मिलने के बीच के संबंध पर कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं देता है. इस कमी या खामी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

यह देखते हुए कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं देता है, पीठ ने कानून आयोग को इस मुद्दे की जांच करने, अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय व कानून और न्याय मंत्रालय से परामर्श करने का निर्देश दिया. पीठ ने कहा कि किसी भी जमा राशि की पारदर्शिता को बनाए रखने और उस पर ब्याज देने के लिए, उस जमा राशि को संभालने के तौर-तरीकों और व्यवस्था में स्पष्टता व एकरूपता होनी चाहिए. कोर्ट में जमा की गई राशियों को संभालने की प्रक्रिया में मानकीकरण की कमी, समय के साथ पैसे के मूल्य के इस आवश्यक अंतर्निहित सिद्धांत के साथ-साथ एक निश्चित और स्पष्ट तरीके से ब्याज के संचय को भी कमजोर करती है.

पीठ ने आगे कहा कि इस मामले में सामने आने वाले विवाद इतनी बार होते हैं कि अपीलों के लंबित रहने के दौरान ऐसी जमा राशियों, उनके निवेश और उन पर मिलने वाले ब्याज के समायोजन के लिए एक स्पष्ट और अधिक समान दृष्टिकोण अपनाना बेहद आवश्यक हो जाता है. पीठ ने कहा कि एक सुसंगत और मानक नियम विकसित करना आवश्यक है. जिसके द्वारा: अपील के निपटारे तक डिक्री राशि (अदालत द्वारा तय रकम) को अदालतों/ट्रिब्यूनल में जमा किया जाए और मामलों के अंतिम फैसले के समय उस पर जमा हुए ब्याज का हिसाब-किताब करने का तरीका तय हो.

पीठ ने आगे कहा, जमा की गई राशि डिक्री-धारक (जिसके पक्ष में फैसला आया है) के हितों को सुरक्षित करे और डिक्री राशि पर बढ़ती ब्याज देनदारी के मामले में जजमेंट-डेटर (जिसके खिलाफ फैसला आया है) के हितों की भी रक्षा करे, और एक ऐसा मानक सिद्धांत हो जिसके द्वारा अंतिम निपटारे के समय ऐसी जमा राशियों और उन पर अर्जित ब्याज को समायोजित किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन लिमिटेड अदालत में पैसा जमा करने के बावजूद मध्यस्थता निर्णय की राशि पर 12त्न ब्याज देने के लिए उत्तरदायी बनी रहेगी. यह पैसा केवल फैसले पर रोक लगाने की शर्त के रूप में जमा किया गया था और नेशनल एग्रो सीड कॉरपोरेशन (इंडिया) के लिए इसे निकालना स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं था.

यह विवाद 13 जून 2019 के एक मध्यस्थता निर्णय से शुरू हुआ था, जिसमें नेशनल सीड्स को नेशनल एग्रो को 26 अगस्त 2017 से निर्णय की तारीख तक 12त्न वार्षिक ब्याज के साथ लगभग 1.46 करोड़ का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था. इस निर्णय को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत चुनौती दी गई थी, जो किसी भी पक्ष को निर्दिष्ट आधारों पर मध्यस्थता निर्णय को रद्द करने की मांग करने की अनुमति देती है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस शर्त पर मध्यस्थता निर्णय को लागू करने पर रोक लगा दी थी कि नेशनल सीड्स मूल राशि का 50त्न जमा करे. इसके बाद कंपनी ने नवंबर 2019 में 73.20 लाख जमा किए थे. नेशनल सीड्स द्वारा दायर इस अपील में हाई कोर्ट द्वारा 5 अगस्त 2024 को पारित फैसले और आदेश की सत्यता पर सवाल उठाया गया था.

हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता को मध्यस्थता निर्णय की तारीख यानी 13.06.2019 से लेकर 08.09.2022 (जिस तारीख को जमा राशि को आठ सप्ताह के भीतर निर्णय-धारक प्रतिवादी के पक्ष में जारी करने का आदेश दिया गया था) तक की अवधि के लिए निर्णय राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देने के लिए उत्तरदायी ठहराया था और निष्पादन याचिका का निपटारा कर दिया था.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-