इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एनडीपीएस अधिनियम से जुड़े आपराधिक मामले में जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी केवल इस आधार पर फाइनेंस कंपनी को नहीं दी जा सकती कि वाहन मालिक ने ऋण की किस्तें चुकाना बंद कर दिया है. न्यायालय ने कहा कि ऋण समझौते के आधार पर वाहन वापस लेने का फाइनेंसर का अधिकार संविदात्मक है और इसका इस्तेमाल लंबित आपराधिक मामले में जब्त वाहन की सुपुर्दगी हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता. जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने एसके फाइनेंस लिमिटेड की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी.
सात किलो अफीम के साथ वाहन मालिक पकड़ा गया
मामला नीमच सिटी थाना क्षेत्र से जुड़ा है. पुलिस को सूचना मिली थी कि वाहन का मालिक राजस्थान में किसी व्यक्ति को अफीम पहुंचाने जा रहा है. सूचना के आधार पर पुलिस ने वाहन को रोका और तलाशी ली. तलाशी के दौरान वाहन मालिक के कब्जे से सात किलो अफीम बरामद होने का उल्लेख मामले के रिकॉर्ड में किया गया है.
बरामदगी के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और जिस वाहन का इस्तेमाल किया जा रहा था, उसे भी जब्त कर लिया. इसके बाद वाहन एनडीपीएस मामले में आपराधिक कार्यवाही का हिस्सा बन गया.
वाहन खरीदने के लिए लिया था पांच लाख से अधिक का ऋण
रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी ने फाइनेंस कंपनी से 5,04,741 रुपये का ऋण लेकर वाहन खरीदा था. ऋण समझौते के तहत उसे 36 मासिक किस्तों में 17,499 रुपये का भुगतान करना था.
फाइनेंस कंपनी का दावा था कि आरोपी ने ऋण की किस्तों का भुगतान नहीं किया और उसके ऊपर 4,70,274.20 रुपये की राशि बकाया हो गई. इसी ऋण बकाया के आधार पर कंपनी ने जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी अपने पक्ष में कराने के लिए एनडीपीएस अधिनियम के विशेष न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया.
विशेष अदालत ने भी फाइनेंसर को वाहन देने से किया था इनकार
फाइनेंस कंपनी की अंतरिम सुपुर्दगी की मांग को विशेष न्यायालय ने 2 अप्रैल 2026 को खारिज कर दिया था. इसके बाद कंपनी ने इस आदेश को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी.
कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि ऋण समझौते में किस्तों के भुगतान में चूक होने पर फाइनेंसर को वाहन वापस लेने का अधिकार दिया गया है. इसलिए वाहन मालिक द्वारा ऋण की शर्तों का पालन नहीं किए जाने की स्थिति में वाहन की सुपुर्दगी फाइनेंस कंपनी को दी जानी चाहिए.
आरसी में हाइपोथिकेशन का भी दिया गया हवाला
फाइनेंस कंपनी की ओर से अदालत में वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र में अपने नाम के हाइपोथिकेशन दर्ज होने का भी हवाला दिया गया. कंपनी का तर्क था कि ऋण पूरी तरह चुकाए जाने तक वाहन पर उसका वित्तीय हित बना हुआ है और वाहन मालिक को उसका पूर्ण स्वामी नहीं माना जा सकता.
कंपनी ने यह भी तर्क रखा कि वाहन का इस्तेमाल ऋण समझौते की शर्तों के उल्लंघन के साथ-साथ आपराधिक गतिविधि में किया गया है. ऐसे में वाहन को फाइनेंसर की सुपुर्दगी में देना उचित होगा.
राज्य ने फाइनेंस कंपनी की मांग का विरोध किया
राज्य सरकार की ओर से फाइनेंस कंपनी की मांग का विरोध किया गया. राज्य की ओर से कहा गया कि लंबित आपराधिक कार्यवाही में जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी के लिए फाइनेंसर को पंजीकृत मालिक के स्थान पर नहीं रखा जा सकता.
मामले में हाई कोर्ट के समक्ष मूल प्रश्न यह था कि ऋण समझौते और वाहन पर फाइनेंस कंपनी के हाइपोथिकेशन के आधार पर क्या आपराधिक अदालत एनडीपीएस मामले में जब्त वाहन को फाइनेंसर की अंतरिम सुपुर्दगी में दे सकती है.
आपराधिक अदालत लोन समझौता लागू करने का मंच नहीं
हाई कोर्ट ने वाहन की जब्ती और सुपुर्दगी से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के बिश्वजीत डे बनाम असम राज्य मामले का उल्लेख किया. पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 497 और 503 के तहत आपराधिक अदालत को प्राप्त अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किसी दीवानी अनुबंध या ऋण समझौते की शर्तों को लागू करने के लिए नहीं किया जा सकता.
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऋण की किस्तें नहीं चुकाने की स्थिति में फाइनेंस कंपनी के पास अपने संविदात्मक अधिकारों के आधार पर कार्रवाई करने के रास्ते उपलब्ध हो सकते हैं. लेकिन ऐसे संविदात्मक अधिकार के आधार पर एनडीपीएस मामले में जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी मांगना अलग विषय है.
हाइपोथिकेशन से वैधानिक स्वामित्व नहीं बदलता
फाइनेंस कंपनी की ओर से वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र में हाइपोथिकेशन दर्ज होने की दलील पर भी हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की. न्यायालय ने कहा कि हाइपोथिकेशन का उल्लेख फाइनेंस कंपनी के वित्तीय हितों की सुरक्षा से जुड़ा है. इससे आपराधिक कार्यवाही के संदर्भ में वाहन का वैधानिक स्वामित्व फाइनेंसर को हस्तांतरित नहीं हो जाता.
पीठ ने यह भी कहा कि फाइनेंस कंपनी वाहन की पंजीकृत मालिक नहीं है और न ही पंजीकृत मालिक की एजेंट है. उसकी भूमिका फाइनेंसर की है. इसलिए केवल ऋण समझौते या हाइपोथिकेशन के आधार पर उसे एनडीपीएस मामले में जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी का अधिकार नहीं मिल जाता.
ऋण वसूली के लिए अलग कानूनी रास्ता उपलब्ध
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वाहन मालिक ने ऋण समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है तो फाइनेंस कंपनी अपने संविदात्मक अधिकारों के आधार पर दीवानी कार्रवाई या मध्यस्थता की प्रक्रिया अपना सकती है.
अर्थात ऋण की वसूली और एनडीपीएस मामले में जब्त वाहन की सुपुर्दगी—दोनों को एक ही प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता. वाहन जब्त होने के बाद उसके संबंध में आपराधिक अदालत का अधिकार क्षेत्र उस आपराधिक मामले की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों से निर्धारित होगा.
वाहन की सुपुर्दगी के अधिकार पर हाई कोर्ट की स्पष्टता
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि जब्त वाहन की सुपुर्दगी के संबंध में पंजीकृत मालिक या उसके एजेंट की स्थिति महत्वपूर्ण होती है. केवल फाइनेंस कंपनी होने के कारण उसे आपराधिक कार्यवाही में वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता.
इस आधार पर हाई कोर्ट ने एनडीपीएस विशेष न्यायालय के उस आदेश को उचित माना, जिसमें फाइनेंस कंपनी को वाहन सौंपने से इनकार किया गया था.
एसके फाइनेंस की पुनरीक्षण याचिका खारिज
सभी पक्षों की दलीलों और संबंधित कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने एसके फाइनेंस लिमिटेड की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी.
हाई कोर्ट ने माना कि विशेष न्यायाधीश का जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी फाइनेंस कंपनी को देने से इनकार करने वाला आदेश कानूनी रूप से उचित है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.
इस फैसले में हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है—ऋण समझौते से मिलने वाला वाहन वापस लेने का संविदात्मक अधिकार और एनडीपीएस जैसे लंबित आपराधिक मामले में जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी का अधिकार अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं. फाइनेंस कंपनी अपने ऋण की वसूली के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है, लेकिन केवल ऋण डिफॉल्ट के आधार पर आपराधिक अदालत से जब्त वाहन की सुपुर्दगी मांगना पर्याप्त आधार नहीं माना गया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

