इंदौर. न्यायिक प्रक्रिया में तारीख दर्ज करने जैसी छोटी-सी मानवीय भूल किसी पक्षकार के लिए न्याय का दरवाजा बंद करने का आधार नहीं बन सकती. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 14 साल पुराने एक मामले में इसी सिद्धांत को महत्वपूर्ण आधार मानते हुए जिला कोर्ट के एकपक्षीय फैसले को निरस्त कर दिया. न्यायमूर्ति विनय सराफ की पीठ ने मामले को उस स्तर से दोबारा सुनने के निर्देश दिए हैं, जहां से पक्षकार को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिल पाया था.
एक तारीख ने बदल दिया पूरे मुकदमे का रुख
मामला पारसी मोहल्ले में स्थित एक मकान से जुड़े विवाद का है. रंजीत नारायण हक्सर ने योगेंद्र कुमार चड्ढा के खिलाफ मकान निर्माण को स्वीकृत नक्शे के विपरीत बताते हुए प्रकरण दायर किया था. 28 जून 2010 को मामले की सुनवाई निर्धारित थी. इसी दिन अधिवक्ता की ओर से न्यायालय में उपस्थिति नहीं हो सकी और परिणामस्वरूप आगे की न्यायिक प्रक्रिया में चड्ढा के खिलाफ एकपक्षीय निर्णय की स्थिति बन गई.
बाद में 29 सितंबर 2010 को जिला कोर्ट ने फैसला सुना दिया. संबंधित अधिवक्ता को इसकी जानकारी पांच अक्टूबर को मिली और अगले ही दिन छह अक्टूबर को फैसले को निरस्त कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया गया.
गलती कहां हुई, अदालत के सामने ऐसे खुला मामला
पक्षकार की ओर से अदालत को बताया गया कि 28 जून को उसी जिला कोर्ट में हक्सर से संबंधित एक अन्य प्रकरण भी सूचीबद्ध था. अधिवक्ता के जूनियर ने तारीख दर्ज करते समय गलती से दूसरे मामले की जानकारी अपनी डायरी में दर्ज कर ली थी. यही कारण रहा कि वास्तविक प्रकरण की सुनवाई की तारीख पर अधिवक्ता और पक्षकार अदालत में उपस्थित नहीं हो सके.
मामले में इस दलील को केवल मौखिक स्पष्टीकरण के रूप में नहीं रखा गया. जूनियर अधिवक्ता स्वयं अदालत के सामने उपस्थित हुए और उन्होंने अपनी गलती के संबंध में बयान दिया. इससे संबंधित दस्तावेजी साक्ष्य भी न्यायालय के समक्ष रखे गए.
जिला कोर्ट के फैसले के बाद हाई कोर्ट पहुंचा मामला
जिला कोर्ट ने उपलब्ध स्पष्टीकरण और साक्ष्यों के बावजूद एकपक्षीय फैसले को निरस्त करने का आवेदन स्वीकार नहीं किया. इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा. अपील में मुख्य सवाल यह बना कि क्या अधिवक्ता या उसके जूनियर की ऐसी भूल, जिसे अदालत के समक्ष साक्ष्य से स्पष्ट किया गया हो, पक्षकार को अपना पक्ष रखने के अधिकार से वंचित करने का आधार बन सकती है.
हाई कोर्ट ने प्रक्रिया से आगे न्याय के उद्देश्य को देखा
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड और परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद माना कि सामने आई स्थिति जानबूझकर की गई लापरवाही के बजाय सद्भावना से हुई मानवीय भूल से जुड़ी है. अदालत ने इस बात को महत्व दिया कि जूनियर अधिवक्ता ने स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर गलती स्वीकार की और उसके समर्थन में साक्ष्य भी मौजूद थे.
पीठ ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल तकनीकी नियमों का कठोर अनुपालन कराना नहीं है. यदि किसी पक्षकार को वास्तविक रूप से अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं मिला हो, तो केवल ऐसी प्रक्रिया संबंधी भूल के आधार पर उसे न्याय से वंचित करना उचित नहीं होगा.
14 साल बाद फिर खुलेगा मुकदमे का रास्ता
हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब जिला कोर्ट में मामले की सुनवाई दोबारा होगी. खास बात यह है कि अदालत ने पूरे विवाद को नए सिरे से शुरू करने के बजाय उसे उसी चरण से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है, जहां एकपक्षीय निर्णय के कारण पक्षकार अपना पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रख सका था.
इस फैसले का व्यापक महत्व इस बात में है कि न्यायिक प्रक्रिया में अधिवक्ता की वास्तविक मानवीय भूल और जानबूझकर की गई लापरवाही के बीच अंतर किया जाना आवश्यक है. हाई कोर्ट के आदेश ने यह स्पष्ट किया कि प्रक्रिया पक्षकार को न्याय दिलाने का माध्यम है, स्वयं न्याय का अंतिम उद्देश्य नहीं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

