नेपाल की तबाही ने यूएन के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल, कौन उठाएगा जलवायु संकट का नुकसान

नेपाल की तबाही ने यूएन के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल, कौन उठाएगा जलवायु संकट का नुकसान

प्रेषित समय :18:45:09 PM / Sat, Sep 26th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम, ग्लेशियरों के अस्थिर होने और अचानक आने वाली बाढ़ के बढ़ते खतरे ने जलवायु संकट को एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला दिया है. नेपाल में हाल की विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जिस तरह जलवायु न्याय और नुकसान की भरपाई का सवाल उठाया, उसने विकसित और विकासशील देशों के बीच जिम्मेदारी तथा जलवायु वित्त को लेकर पुरानी बहस को नया आयाम दे दिया है. 

नेपाल की त्रासदी अब केवल एक देश की प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है. संयुक्त राष्ट्र में 25 सितंबर को आयोजित “सगरमाथा टू द सी” विशेष बैठक में भी हिमालय से समुद्र तक जलवायु जोखिमों और जलवायु-लचीले विकास पर चर्चा हुई. संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष ने नेपाल की पहल को वर्तमान जलवायु संकट से निपटने की तत्काल आवश्यकता से जोड़ा. 

हिमालय से उठी आवाज ने दुनिया को चेताया
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में कहा कि वह हिमालय से दुनिया के लिए एक चेतावनी लेकर आए हैं. उनके अनुसार, अगस्त में आई भयावह बाढ़ ने नेपाल के पर्वतीय इलाकों में परिवारों, बस्तियों, सड़कों, पुलों, स्कूलों और आजीविका को भारी नुकसान पहुंचाया. उन्होंने इसे केवल स्थानीय त्रासदी न मानते हुए जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों की चेतावनी बताया. 

नेपाल सरकार के अनुसार, इस आपदा में बड़े पैमाने पर जनहानि हुई और हजारों लोग लापता हुए. संयुक्त राष्ट्र के नेपाल कार्यालय ने सितंबर में बताया था कि 26 अगस्त की बाढ़ के बाद 1,367 लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी और 5,132 लोग अब भी लापता थे. करीब 84,270 लोग प्रभावित हुए तथा सड़क, स्कूल, बिजली और जल आपूर्ति जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचा. 

यह आंकड़े बताते हैं कि हिमालयी आपदाओं का असर केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं रहता. जब सड़कें और पुल बहते हैं, बिजली परियोजनाएं क्षतिग्रस्त होती हैं और गांवों का संपर्क टूटता है, तब आपदा का आर्थिक प्रभाव कई वर्षों तक बना रह सकता है.

नेपाल के सामने अरबों डॉलर का पुनर्निर्माण संकट
आपदा के बाद नेपाल की सरकार ने नुकसान और जरूरतों का प्रारंभिक आकलन भी तैयार किया है. नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, आपदा से लगभग 1.8 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष नुकसान और करीब 88.3 करोड़ डॉलर का आर्थिक नुकसान अनुमानित है. पुनर्निर्माण के लिए लगभग 4.78 अरब डॉलर की आवश्यकता बताई गई है. 

यही आंकड़ा जलवायु संकट के उस पहलू को सामने लाता है जिसे अक्सर आपदा राहत की चर्चा में नजरअंदाज कर दिया जाता है. राहत के लिए तत्काल पैसा जुटाना एक चुनौती है, लेकिन टूटे हुए बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना, प्रभावित परिवारों की आजीविका बहाल करना और भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए नई व्यवस्था तैयार करना उससे कहीं बड़ी चुनौती है.

संयुक्त राष्ट्र ने नेपाल के लिए 49.6 करोड़ डॉलर की मानवीय अपील की थी, लेकिन सितंबर के शुरुआती दिनों तक लगभग 22 करोड़ डॉलर की ही प्रतिबद्धता सामने आई थी. यह अपील तत्काल मानवीय सहायता के लिए थी, जबकि दीर्घकालीन पुनर्निर्माण की जरूरत इससे अलग है.

जलवायु संकट और नुकसान की भरपाई का सवाल
नेपाल का तर्क है कि जिन देशों का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है, वे भी जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम भुगत रहे हैं. इसलिए उन्हें नुकसान और क्षति से निपटने के लिए आसानी से उपलब्ध वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र के नेपाल स्थित अधिकारियों ने भी कहा है कि हाल की आपदा जलवायु-संवेदनशील देशों के सामने बढ़ते नुकसान और क्षति का उदाहरण है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि नुकसान और क्षति के लिए वित्तीय सहायता की प्रक्रिया तथा किसी विशेष देश की कानूनी जिम्मेदारी या दायित्व दो अलग-अलग विषय हैं. 

यही अंतर अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं को जटिल बनाता है. प्रभावित देश तेजी से और पर्याप्त वित्त चाहते हैं, जबकि वैश्विक जलवायु वित्त की संस्थागत प्रक्रियाओं में परियोजनाओं, पात्रता और धन वितरण में समय लगता है.

हिमालय में खतरे क्यों बढ़ रहे हैं
वैज्ञानिक और संयुक्त राष्ट्र के आकलन लगातार संकेत दे रहे हैं कि हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी आपदाओं का जोखिम गंभीर है. नेपाल के नवीनतम राष्ट्रीय जलवायु दस्तावेज में कहा गया है कि देश बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियल झील फटने जैसी घटनाओं के साथ-साथ तापमान वृद्धि और ग्लेशियरों के पीछे हटने जैसी धीमी गति वाली समस्याओं का भी सामना कर रहा है.

नेपाल ने अपने दस्तावेज में कम से कम 47 संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलों का उल्लेख किया है. इसमें यह भी कहा गया है कि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के नुकसान की गति बढ़ी है और इससे सीमा-पार ग्लेशियल बाढ़ का खतरा भी बढ़ता है. 

इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में आपदा प्रबंधन को केवल बारिश या बाढ़ की निगरानी तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा. ग्लेशियर, बर्फ, पहाड़ी ढलान, नदियां और मौसम प्रणाली आपस में जुड़े हुए हैं. किसी एक हिस्से में बदलाव दूसरे हिस्से में अचानक संकट पैदा कर सकता है.

सीमा नहीं मानता जलवायु संकट
नेपाल के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि जलवायु संकट सीमाओं को नहीं मानता. उनके अनुसार, हाल की आपदा का असर नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र से लेकर भारत की ओर बहने वाली नदी प्रणालियों तक पहुंचा. 

इस स्थिति में हिमालयी देशों के बीच साझा निगरानी और चेतावनी व्यवस्था की जरूरत बढ़ जाती है. ग्लेशियरों की स्थिति, ग्लेशियल झीलों का जलस्तर, नदी का प्रवाह, वर्षा और भूस्खलन के संकेतों की वास्तविक समय में जानकारी साझा होने पर कई जगहों पर समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है.

इसलिए नेपाल की मांग केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है. उसके सामने वैज्ञानिक निगरानी, सीमा-पार सूचना साझा करने, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की भी चुनौती है.

अब निगाहें कॉप-31 पर
नेपाल की संयुक्त राष्ट्र में उठी आवाज अब नवंबर में होने वाली कॉप-31 जलवायु वार्ता में किस रूप में आगे बढ़ती है, यह महत्वपूर्ण होगा. वहां नुकसान और क्षति, जलवायु वित्त, अनुकूलन और कमजोर देशों के लिए सहायता जैसे मुद्दे फिर प्रमुख चर्चा में रहेंगे.

नेपाल लंबे समय से जलवायु वित्त तक आसान पहुंच की मांग करता रहा है. 2023 में भी उसने संयुक्त राष्ट्र महासभा में नुकसान और क्षति को लेकर वित्तीय व्यवस्था तथा अनुकूलन वित्त बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था. 

अब 2026 की आपदा ने उस मांग को एक ठोस मानवीय और आर्थिक संदर्भ दे दिया है. सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आपदा के बाद सहायता पहुंचाने तक सीमित रहती है या जोखिम कम करने के लिए पहले से निवेश की व्यवस्था भी मजबूत करती है.

राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालीन समाधान की जरूरत
नेपाल की त्रासदी हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है. आपदा आने के बाद राहत सामग्री भेजना जरूरी है, लेकिन उससे पहले वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत पुल और सड़कें, सुरक्षित बस्तियां, बेहतर जल निकासी, आपात संचार व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित आपदा प्रतिक्रिया तंत्र तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए वित्तीय व्यवस्था भी ऐसी होनी होगी जिसमें अत्यधिक प्रभावित देशों को वर्षों तक सहायता की प्रतीक्षा न करनी पड़े. नेपाल का मामला इस बहस को तेज कर रहा है कि जलवायु जोखिम बढ़ने के साथ वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और आपदा प्रबंधन प्रणालियों को भी अपनी गति बदलनी होगी.

हिमालय से उठी यह आवाज अब केवल नेपाल की आवाज नहीं है. यह उन सभी पर्वतीय और विकासशील देशों के लिए सवाल बन चुकी है, जहां जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है, लेकिन उससे निपटने के संसाधन सीमित हैं. संयुक्त राष्ट्र में नेपाल ने जो प्रश्न रखा है, उसका जवाब केवल भाषणों से नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाली वित्तीय सहायता, साझा वैज्ञानिक व्यवस्था और जमीन पर दिखाई देने वाली तैयारी से तय होगा.