जन्मदिन पर विशेष / देव आनंद जितना मैंने समझा और जाना

जन्मदिन पर विशेष / देव आनंद जितना मैंने समझा और जाना

प्रेषित समय :22:27:17 PM / Sat, Sep 26th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मुंबई, राजेश कुमार सिन्हा
कुछ अभिनेता अपनी भूमिकाओं के कारण याद किए जाते हैं, कुछ अपनी फिल्मों के कारण और कुछ ऐसे होते हैं जो फिल्मों से बाहर निकलकर अपने समय की पहचान बन जाते हैं. देव आनंद इसी तीसरी श्रेणी के अभिनेता थे. उन्हें सिर्फ अभिनेता कहना उनके विराट सिनेमाई व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा. वे अभिनेता थे, निर्माता थे, निर्देशक थे, जोखिम उठाने वाले फिल्मकार थे और सबसे बढ़कर ऐसे कलाकार थे जिनकी धड़कन अपने समय की धड़कन से जुड़ी हुई थी. उन्होंने केवल फिल्मों में अभिनय नहीं किया, उन्होंने हिंदी सिनेमा के बदलते हुए मिजाज को जिया. उनके चेहरे पर एक दौर की चमक थी, उनकी चाल में शहर की गति थी, संवादों में युवा बेचैनी थी और प्रेम के दृश्यों में वह सहजता थी जिसने उन्हें कई पीढ़ियों का प्रिय बना दिया.

26 सितंबर 1923 को जन्मे (धर्मदेव पिशोरीमल आनंद) जिन्हें दुनिया देव आनंद के नाम से जानती है, उस पीढ़ी के कलाकार थे जिसने गुलाम भारत को देखा, स्वतंत्रता की आकांक्षा को महसूस किया और आजाद भारत की नई सामाजिक संरचना को बनते हुए देखा. उनका सिनेमा इसलिए केवल मनोरंजन का इतिहास नहीं है; उसमें स्वतंत्रता के बाद के भारत की बदलती मानसिकता, शहरों की बढ़ती भूमिका, युवाओं की आकांक्षाएं, प्रेम की बदलती परिभाषाएं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश के कई निशान दिखाई देते हैं.

उनकी फिल्मी यात्रा 1946 की ‘हम एक हैं’ से शुरू हुई. यह वह समय था जब हिंदी सिनेमा अपनी भाषा, शैली और दर्शक की तलाश में था और देव आनंद भी अपनी जगह तलाश रहे थे. ‘जिद्दी’ ने उन्हें लोकप्रियता की दिशा में आगे बढ़ाया और 1951 की ‘बाजी’ ने उनकी स्क्रीन पहचान को निर्णायक रूप से आकार दिया. गुरुदत्त के निर्देशन में बनी ‘बाजी’ का संसार उस समय के पारंपरिक सामाजिक नायक से अलग था. अपराध, शहर, रात, संगीत, प्रेम और नैतिक दुविधाओं से बना यह संसार देव आनंद के लिए जैसे स्वाभाविक जगह थी.

उनके शुरुआती नायक पारंपरिक अर्थों में आदर्श पुरुष नहीं थे, वे पूर्ण नहीं थे उनमें कमजोरियां थीं. वे परिस्थितियों से प्रभावित होते थे, कभी गलत रास्ते पर जाते थे, लेकिन उनमें लौटने की संभावना बनी रहती थी और यही उन्हें दर्शक के करीब लाता था. देव आनंद की बड़ी खूबी शायद यही थी कि उन्होंने हिंदी सिनेमा के नायक को देवता बनने से बचाया. उनका नायक इंसान था. वह प्रेम करता था, गलती करता था, डरता था, संघर्ष करता था, कभी अपराध की दुनिया में फंसता था और फिर अपने लिए रास्ता तलाशता था.

राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद को हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की तिकड़ी कहा जाता है तो इसका कारण केवल यह नहीं है कि तीनों बड़े सितारे थे. तीनों ने भारतीय नायक की अलग-अलग सिनेमाई कल्पना सामने रखी. राज कपूर के पास आम आदमी की करुणा और सामाजिक सरोकार की आहट थी, दिलीप कुमार के पास अंतर्द्वंद्व और त्रासदी की गहराई थी और देव आनंद के पास आधुनिकता, तेज अंदाज, रोमांस और शहर का आकर्षण. यह अंतर अभिनय शैली का अंतर भर नहीं था बल्कि यह उस दौर के बदलते भारतीय समाज की तीन अलग-अलग मनःस्थितियों को भी व्यक्त करता था.

देव आनंद का नायक सबसे अधिक गतिशील था. वह शहर में रहता था, सड़क पर चलता था, टैक्सी चलाता था, नौकरी करता था, प्रेम करता था, अपराध की दुनिया में फंसता था, जासूसी करता था और फिर अपनी राह खोजता था. उसकी दुनिया में घर के साथ क्लब था, परिवार के साथ शहर था, परंपरा के साथ आधुनिकता थी और नैतिकता के साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल भी था. यही कारण है कि देव आनंद को समझना दरअसल उस भारतीय समाज को समझने की कोशिश भी है जो स्वतंत्रता के बाद तेजी से बदल रहा था.

देव आनंद की शैली को अक्सर उनके कपड़ों, हेयरस्टाइल, टोपी, स्कार्फ, मुस्कान या गर्दन हिलाने की विशिष्ट अदा तक सीमित कर दिया जाता है. लेकिन उनकी शैली इससे कहीं बड़ी थी ,वह उनकी अभिनय भाषा थी. वे संवाद बोलते समय पूरे शरीर का इस्तेमाल करते थे. उनकी आंखें लगातार अभिनय करती थीं और हल्की मुस्कान में भाव बदल जाते थे. कैमरे के सामने उनकी उपस्थिति में एक बेचैनी थी. वे स्थिर खड़े होकर भी गतिशील दिखाई देते थे.उनकी चाल की नकल हुई, कपड़ों की नकल हुई, बालों की नकल हुई, बोलने के अंदाज की नकल हुई. किसी अभिनेता की लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि दर्शक उसकी भूमिका नहीं, उसका व्यक्तित्व अपनाने लगे? देव आनंद के साथ यही हुआ. उन्होंने एक पीढ़ी को यह एहसास दिया कि आधुनिक होना केवल पश्चिमी कपड़े पहनना नहीं है; आधुनिकता अपने जीवन को अपनी शर्तों पर देखने की कोशिश भी हो सकती है.

‘बाजी’ में देव आनंद की बेचैनी पहली बार बड़े पैमाने पर सामने आई. गुरुदत्त के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपराध और शहरी जीवन की ऐसी दुनिया में ले जाती है जहां नैतिकता हमेशा काले और सफेद रंगों में विभाजित नहीं होती. शहर में अवसर हैं तो अपराध भी है, स्वतंत्रता है तो अकेलापन भी है, प्रेम है तो स्वार्थ भी है. देव आनंद इस अंधेरे संसार में भी अपनी मानवीय चमक बनाए रखते हैं. शायद यही उनकी विशेषता थी कि अंधेरी कहानी में भी वे पूरी तरह अंधेरे नहीं होते थे. उनके भीतर उम्मीद की एक रोशनी बची रहती थी.

‘टैक्सी ड्राइवर’ में यही शहरी संवेदना दूसरे रूप में सामने आती है. 1954 की इस फिल्म में मुंबई केवल पृष्ठभूमि नहीं है, वह कहानी का सक्रिय हिस्सा है. सड़क, रोजी-रोटी, वर्ग, प्रेम और संघर्ष एक ही कथा में जुड़ते हैं. देव आनंद की फिल्मों में मुंबई का बार-बार लौटना संयोग नहीं था. मुंबई उनके लिए अवसर का शहर था, लेकिन वह संघर्ष और अकेलेपन का शहर भी था. वह स्वयं बाहर से आए थे और इस शहर में अपना स्थान बनाया था. इसलिए उनकी फिल्मों में शहर को देखने का नजरिया केवल सिनेमाई नहीं, अनुभव से भी उपजा हुआ लगता है.

‘सी.आई.डी.’ में उनका शहरी आकर्षण और तेज हो जाता है. 1956 की इस फिल्म में अपराध, रहस्य, पीछा, संगीत और रोमांस के बीच देव आनंद का नायक किसी भारी-भरकम पुलिस अधिकारी की तरह सामने नहीं आता. वह चुस्त है, जिज्ञासु है, फुर्तीला है और शहर की गति के साथ चलता है. हिंदी सिनेमा के नायक को आधुनिक महानगर के साथ सहजता से जोड़ने में देव आनंद की यह भूमिका महत्वपूर्ण थी.

‘पेइंग गेस्ट’, ‘फंटूश’, ‘नौ दो ग्यारह’ और ‘काला बाजार’ जैसी फिल्मों में उनकी यही ऊर्जा अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है. हास्य हो, अपराध हो, प्रेम हो या सामाजिक टिप्पणी, देव आनंद की उपस्थिति फिल्म को एक खास गति देती थी. वह कैमरे के सामने अभिनय करते कम और जैसे फिल्म के भीतर चलते-फिरते अधिक दिखाई देते थे. यहाँ पर यह कहना समीचीन होगा कि यहीं विजय आनंद के साथ उनका क्रिएटिव रिश्ता असाधारण महत्व हासिल करता है. दोनों भाइयों की साझेदारी ने हिंदी सिनेमा को ‘काला बाजार’, ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ जैसी यादगार फिल्में दीं. विजय आनंद देव आनंद की स्क्रीन पर्सनैलिटी को केवल समझते नहीं थे, उसकी सिनेमाई संभावनाओं को भी पहचानते थे. उन्हें मालूम था कि देव आनंद की चाल, आवाज, आंखें और ऊर्जा कैमरे के सामने किस तरह काम करती है. उनकी फिल्मों में कैमरा भी जैसे देव आनंद के साथ चलने लगता था.‘काला पानी’ में देव आनंद की लोकप्रिय रोमांटिक छवि के पीछे छिपा गंभीर अभिनेता सामने आता है. 1958 की इस फिल्म में वह अपने पिता के साथ हुए अन्याय का सच खोजने और न्याय पाने के लिए संघर्ष करते हैं. प्रेम के साथ नैतिक दृढ़ता जुड़ती है और अभिनेता के भीतर का गंभीर पक्ष सामने आता है. इस फिल्म के लिए देव आनंद को 1959 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला. यह उपलब्धि महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि उनकी लोकप्रियता केवल रोमांटिक छवि पर आधारित नहीं थी.

‘काला बाजार’ में नैतिकता और बाजार के बीच संघर्ष है. व्यक्ति गलत दुनिया में पहुंच जाता है, लेकिन उसका अंतर्मन पूरी तरह मरता नहीं. देव आनंद की फिल्मों में अपराध की दुनिया में पहुंचा व्यक्ति कई बार केवल अपराधी बनकर नहीं रह जाता; उसके भीतर लौटने की संभावना बनी रहती है. यही मानवीय जटिलता उनके नायकों को एक आयाम देती है.फिर आई  फिल्म ‘हम दोनों’, यहां देव आनंद अपने सबसे सहज रोमांटिक रूप में दिखाई देते हैं. प्रेम, पहचान, युद्ध और नैतिक दुविधाओं के बीच फिल्म जिस संवेदनशीलता से आगे बढ़ती है, वह देव आनंद की स्क्रीन छवि के दूसरे पक्ष को सामने लाती है. ‘अभी न जाओ छोड़कर’ जैसे गीत में उनके चेहरे पर प्रेम के साथ बिछड़ने की आशंका भी दिखाई देती है. देव आनंद की फिल्मों में गीत कभी केवल सजावटी हिस्सा नहीं रहा. गीत उनके चरित्र के मन की आवाज बनता था.एस. डी. बर्मन के साथ उनका रिश्ता इसी वजह से इतना महत्वपूर्ण था. बर्मन दा के संगीत ने देव आनंद की स्क्रीन पर्सनैलिटी को ऐसी ध्वनि दी जिसे आज भी पहचानना संभव है. किशोर कुमार और मोहम्मद रफी जैसे गायकों की आवाजें उनके चेहरे से इस तरह जुड़ीं कि गीत और अभिनेता का रिश्ता अपनी अलग पहचान बनाने लगा. ‘खोया खोया चांद’, ‘गाता रहे मेरा दिल’, ‘तेरे मेरे सपने’, ‘अभी न जाओ छोड़कर’ और ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ जैसे गीतों को सुनते हुए देव आनंद का चेहरा अपने आप स्मृति में उभर आता है. लेकिन देव आनंद के सिनेमा का सबसे बड़ा पड़ाव ‘गाइड’ है. 1965 में बनी यह फिल्म उनके करियर की केवल एक महत्वपूर्ण फिल्म नहीं, बल्कि उनकी पूरी सिनेमाई यात्रा का निर्णायक मोड़ है. आर. के. नारायण के उपन्यास पर आधारित और विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘गाइड’ में देव आनंद ने राजू की भूमिका निभाई. राजू एक टूरिस्ट गाइड है जिसकी मुलाकात रोजी से होती है. रोजी विवाहित है, लेकिन उसके भीतर एक नर्तकी जीवित है. वह अपने विवाह की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी कला और अपनी पहचान तलाशना चाहती है.

राजू उसके जीवन में आता है और दोनों का संबंध प्रेम में बदलता है. फिर प्रेम में स्वामित्व आता है, महत्वाकांक्षा बढ़ती है, संबंधों में दरार आती है, अपराध होता है और राजू अंततः ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जहां समाज उसे संत मानने लगता है.'गाइड’ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका कोई भी प्रमुख पात्र एकरेखीय नहीं है. रोजी केवल नायिका नहीं है; वह अपनी पहचान खोजती हुई स्त्री है. वह नृत्य करना चाहती है और अपने भीतर के कलाकार को दबाकर जीना स्वीकार नहीं करती. राजू भी पारंपरिक नायक नहीं है. वह प्रेम करता है, लेकिन स्वामित्व की गलती करता है. वह महत्वाकांक्षी है, कमजोर पड़ता है, अपराध करता है, जेल जाता है और फिर एक अप्रत्याशित आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करता है. इसलिए ‘गाइड’ का राजू देव आनंद की स्टार छवि से आगे जाकर एक जटिल मनुष्य बन जाता है. यही कारण है कि यह फिल्म आज भी केवल एक पुरानी क्लासिक के रूप में नहीं देखी जाती. इसके प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं कि क्या प्रेम स्वामी बनते ही अपना अर्थ खो देता है? क्या विवाह व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है? क्या गलती करने वाले व्यक्ति को दूसरा अवसर मिलना चाहिए? क्या समाज किसी व्यक्ति को उसके अतीत से बाहर निकलने देता है? और क्या किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा वास्तव में उसकी अपनी होती है या समाज उसे कोई भूमिका दे देता है?

‘गाइड’ के गीतों ने इन प्रश्नों को और गहरा किया. ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ रोजी की मुक्ति और आत्मविश्वास की घोषणा जैसा लगता है. ‘तेरे मेरे सपने’ साझा भविष्य की आकांक्षा को स्वर देता है और ‘वहां कौन है तेरा’ जीवन के अकेलेपन और उसकी क्षणभंगुरता का दार्शनिक प्रश्न बन जाता है. विजय आनंद ने गीतों को कहानी से अलग नहीं रखा; वे कथा के भीतर सांस लेते हैं. यही उनकी निर्देशन प्रतिभा थी और यही देव आनंद की अभिनय क्षमता को नई ऊंचाई देती है.

‘गाइड’ के लिए देव आनंद को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी मिला. इस फिल्म की सफलता ने उनके अभिनेता और स्टार दोनों रूपों को एक साथ प्रमाणित किया. उनके करियर में इससे अधिक चुनौतीपूर्ण भूमिका बहुत कम मिलती है.

‘ज्वेल थीफ’ में देव आनंद का संसार अचानक रहस्य और पहचान के खेल में बदल जाता है. 1967 की इस फिल्म में पहचान, भ्रम, अपराध, ग्लैमर और संगीत एक साथ आते हैं. यहां देव आनंद का आकर्षण ही कथा का हिस्सा बन जाता है. दर्शक उनके चेहरे पर भरोसा करता है, लेकिन फिल्म लगातार उस भरोसे को चुनौती देती है. कौन असली है, कौन नकली है, कौन किसे पहचानता है ,ये सवाल कहानी को आगे बढ़ाते हैं.

‘जॉनी मेरा नाम’ ने 1970 में देव आनंद की लोकप्रियता को एक और ऊंचाई दी. अपराध, रोमांस, एक्शन, संगीत और रहस्य से बनी इस फिल्म में उनका पुराना आकर्षण नई ऊर्जा के साथ सामने आया. यह वह समय था जब हिंदी सिनेमा का नायक बदलने लगा था, लेकिन देव आनंद ने अपने तरीके से दर्शक के साथ रिश्ता बनाए रखा. उनका नायक अब भी तेज था, आकर्षक था और परिस्थितियों से लड़ने को तैयार था. देव आनंद को समझने के लिए नवकेतन फिल्म्स का उल्लेख अनिवार्य है. 1949 में देव आनंद और चेतन आनंद द्वारा स्थापित नवकेतन केवल एक निर्माण संस्था नहीं थी; वह एक दृष्टि थी. उस दौर में अभिनेता का निर्माता बनना आज की तरह सामान्य नहीं था. नवकेतन ने ऐसे विषयों को स्थान दिया जिनमें शहरी जीवन, अपराध, युवा पीढ़ी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिकता के प्रश्न मौजूद थे.देव आनंद समझते थे कि केवल अभिनेता बने रहकर वह सिनेमा की दिशा को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सकते. उन्हें कहानियां चुननी थीं, फिल्में बनानी थीं, नए लोगों को अवसर देना था और जोखिम उठाने थे. यही कारण है कि उनकी पहचान अभिनेता से आगे जाकर फिल्मकार की बनती है.
‘हरे रामा हरे कृष्णा’ इस फिल्मकार देव आनंद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में है. 1971 की इस फिल्म में युवा पीढ़ी की बेचैनी, परिवार से दूरी, हिप्पी संस्कृति और नशीली दवाओं की समस्या को कथा के केंद्र में लाया गया. भारत में भी उस समय युवा पीढ़ी के भीतर सामाजिक और पारिवारिक संरचनाओं को लेकर नए सवाल पैदा हो रहे थे. देव आनंद ने इस बदलाव को महसूस किया और उसे अपने तरीके से पर्दे पर रखा.

फिल्म ने जीनत अमान को बड़ी पहचान दी. यह देव आनंद की उस क्षमता का भी उदाहरण है जिसमें वे स्वयं स्टार होते हुए किसी नए कलाकार को चमकने की जगह दे सकते थे. उनके लिए स्टारडम का अर्थ केवल अपने चेहरे को पर्दे पर बनाए रखना नहीं था; वह अपनी फिल्मों के संसार को बड़ा करने में भी विश्वास करते थे. देव आनंद की फिल्मों में स्त्री पात्रों को लेकर भी एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है. ‘गाइड’ की रोजी इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है. वह केवल नायक की प्रेमिका नहीं है. वह अपनी कला को लेकर गंभीर है, अपने जीवन का फैसला करना चाहती है और सामाजिक बंधनों को चुनौती देती है. देव आनंद के रोमांस में इसलिए केवल पुरुष की इच्छा नहीं, स्त्री की इच्छा भी दिखाई देती है. वैसे किसी भी पुराने दौर के सिनेमा को आज की सामाजिक और लैंगिक कसौटियों पर फिर से पढ़ना जरूरी है. ऐसे में देव आनंद के सिनेमा में आधुनिकता के अपने आकर्षण और अपनी सीमाएं दोनों थीं. किसी क्लासिक कलाकार को समझने का सही तरीका केवल उसकी प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों को देखना है.

देव आनंद की लोकप्रियता असंदिग्ध थी, लेकिन उनकी हर फिल्म महान नहीं थी. उनके करियर के उत्तरार्ध में ऐसी कई फिल्में आईं जिनकी कथा, अभिनय और निर्देशन पर गंभीर सवाल उठे. उनका एक बड़ा संकट यह भी था कि उन्होंने उम्र बढ़ने के साथ लंबे समय तक खुद को उसी रोमांटिक युवा नायक के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि दर्शक और सिनेमा दोनों बदल चुके थे.अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ सामने आ चुका था. हिंदी सिनेमा के पुरुष नायक की छवि में बड़ा बदलाव हो रहा था. एक्शन, सामाजिक आक्रोश और व्यवस्था से असंतोष ने नायक की नई भाषा तैयार कर दी थी. देव आनंद की रोमांटिक, हल्की और स्टाइलिश उपस्थिति कई बार इस बदलते दौर में पुरानी लगने लगी.लेकिन यहीं देव आनंद का व्यक्तित्व सबसे अधिक दिलचस्प हो जाता है. उन्होंने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया और आलोचना के बावजूद काम करते रहे. निर्देशन करते रहे, नए विषय तलाशते रहे, नए कलाकारों को अवसर देते रहे. दरअसल उनके लिए सिनेमा केवल एक प्रोफेशन नहीं था, वह जीवन जीने का तरीका था.

उनकी बाद की फिल्मों की व्यावसायिक सफलता पहले जैसी नहीं रही, लेकिन काम करने की उनकी इच्छा कम नहीं हुई. वे जीवन के अंतिम वर्षों तक अभिनय और निर्देशन से जुड़े रहे. 2011 में आई ‘चार्जशीट’ उनकी अंतिम फिल्म बनी. यह तथ्य उनके व्यक्तित्व की उस विशेषता को सामने लाता है जिसे मैं उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में गिनता हूं यानी जिजीविषा.
उन्होंने उम्र को स्वीकार किया, लेकिन उम्र को अपनी क्रिएटिव पहचान पर अधिकार नहीं दिया. इसीलिए ‘एवरग्रीन’ शब्द देव आनंद के लिए केवल प्रशंसा नहीं, एक मानसिक अवस्था है. सदाबहार होने का अर्थ यह नहीं कि कोई अभिनेता बूढ़ा नहीं होता. इसका अर्थ है कि उसका व्यक्तित्व समय के साथ पूरी तरह अप्रासंगिक न हो. देव आनंद की कई फिल्में आज भी इसलिए देखी जाती हैं क्योंकि उनमें मानवीय प्रश्न पुराने नहीं हुए. प्रेम की तलाश, पहचान का संकट, शहर में अपनी जगह बनाने की कोशिश, आर्थिक संघर्ष, सामाजिक नैतिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और असफलता के बाद फिर खड़े होने की इच्छा आदि प्रश्न आज भी हमारे साथ हैं.

उनकी फिल्मों में संगीत की भूमिका भी स्थायी है. उनके चेहरे पर गीत जैसे सहजता से उतरता था उसमें वे अभिनय करते हुए नहीं, उसे जीते हुए दिखाई देते थे. यही कारण है कि देव आनंद और हिंदी फिल्म संगीत का रिश्ता केवल अभिनेता और पार्श्वगायक का रिश्ता नहीं रहा. गीतों ने उनके स्टार व्यक्तित्व को पीढ़ियों तक पहुंचाया.

उनका फैशन भी उनके सिनेमा का हिस्सा था. सूट, स्कार्फ, टोपी, जैकेट, बालों की शैली और रंगों का इस्तेमाल इन सबने मिलकर हिंदी फिल्म नायक की एक नई छवि बनाई. यह छवि केवल महानगरों में नहीं, छोटे शहरों में भी लोकप्रिय हुई. देव आनंद को देखकर युवाओं को लगा कि आधुनिकता उनकी पहुंच से बाहर नहीं है.

यहां देव आनंद की सांस्कृतिक भूमिका को समझना जरूरी है. पर्दे पर दिखाई गई जीवनशैली ने वास्तविक जीवन की आकांक्षाओं को प्रभावित किया. लेकिन उनकी आधुनिकता पश्चिम की अंधी नकल नहीं थी हाँ पश्चिमी प्रभाव अवश्य था, पर उसे उन्होंने भारतीय सामाजिक और भावनात्मक संदर्भ में ढाला. उनकी फिल्मों में परिवार था, मांँ थी, दोस्ती थी, प्रेम था, त्याग था और सामाजिक जिम्मेदारी भी थी.

वे व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में दिखाई देते थे, लेकिन सामाजिक संबंधों को पूरी तरह नकारते नहीं थे. यही संतुलन उनके सिनेमा को भारतीय बनाता है. उनका नायक समाज से लड़ता जरूर है, लेकिन समाज को छोड़कर भागता नहीं. वह अपनी पहचान बनाना चाहता है, लेकिन अपने अतीत को पूरी तरह मिटा नहीं पाता. वह प्रेम करता है, लेकिन प्रेम की जटिलता से बच नहीं सकता.

देव आनंद की लोकप्रियता का एक कारण उनका कैमरे के साथ रिश्ता भी था. वह कैमरे से डरते नहीं थे, कैमरा जैसे उनकी ऊर्जा को पकड़ने के लिए उनके पीछे-पीछे चलता था. उनकी आंखों में एक लगातार चलती हुई कहानी दिखाई देती थी. उनके चेहरे की मुस्कान में भी संवाद था.

उनकी आवाज भी अलग थी. संवादों की गति, शब्दों पर हल्का जोर और शरीर की लगातार सक्रियता ने उनकी संवाद अदायगी को विशिष्ट बनाया. उन्होंने हिंदी फिल्म नायक की बोलने की एक नई शैली विकसित की. उनके संवादों की नकल उतनी ही हुई जितनी उनकी चाल और कपड़ों की.यही कारण है कि देव आनंद केवल स्टार नहीं बने, बल्कि एक सांस्कृतिक शैली बन गए. 3 दिसंबर 2011 को देव आनंद की मृत्यु हो गई,लेकिन किसी कलाकार की मृत्यु उसके जीवन की अंतिम घटना नहीं होती. उसके बाद उसकी कला की दूसरी जिंदगी शुरू होती है. देव आनंद की दूसरी जिंदगी उनकी फिल्मों में चल रही है.2023 में उनकी जन्मशती के अवसर पर फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और एन एफ डी सी- एन एफ ए आई ने उनकी महत्वपूर्ण फिल्मों के 4 के संस्करणों को देश के 30 शहरों और 58 सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया. ‘सी.आई.डी.’, ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ को बड़े पर्दे पर फिर से देखने का अवसर मिला. यह केवल श्रद्धांजलि नहीं थी,यह इस बात का प्रमाण था कि देव आनंद की फिल्में स्मृति से निकलकर सिनेमाई विरासत का हिस्सा बन चुकी हैं.

किसी कलाकार की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण उसके जीवनकाल की भीड़ नहीं, उसके बाद की स्मृति होती है. देव आनंद इस कसौटी पर भी टिकते हैं.
आज की पीढ़ी शायद उन्हें उसी संदर्भ में न देखे जिस संदर्भ में 1950 या 1960 के दशक का दर्शक देखता था. लेकिन उनकी फिल्में देखने के बाद वह उस व्यक्तित्व की चमक को समझ सकती है जिसने उन्हें दशकों तक अलग बनाए रखा. यही क्लासिक की पहचान है. वह अपने समय से पैदा होता है, लेकिन केवल अपने समय में बंद नहीं रहता.

जब मैं देव आनंद को समझने की कोशिश करता हूं तो मुझे उनके भीतर तीन अलग-अलग व्यक्तित्व दिखाई देते हैं. पहला अभिनेता देव आनंद, जिसने हिंदी सिनेमा में आधुनिक, रोमांटिक और शहरी नायक को नया चेहरा दिया. दूसरा फिल्मकार देव आनंद, जिसने नवकेतन के माध्यम से नई कहानियों, नए विषयों और नए चेहरों को जगह दी. और तीसरा व्यक्ति देव आनंद, जिसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी जिजीविषा थी. इसमें कोई दो राय नहीं कि असफलता  आलोचना और उम्र ने उन्हें रोका नहीं साथ ही बदलते सिनेमा ने भी उन्हें पूरी तरह पीछे नहीं धकेला. वह अंत तक कुछ नया करने की कोशिश करते रहे.

शायद यही बात मुझे देव आनंद के बारे में सबसे अधिक आकर्षित करती है. उन्होंने जीवन को कभी समाप्त अध्याय की तरह नहीं देखा. उनके लिए अगली फिल्म हमेशा संभव थी, अगला गीत हमेशा संभव था, अगली कहानी हमेशा संभव थी.यही उनके नायकों में भी दिखाई देता है. वे गिरते हैं, लेकिन पूरी तरह टूटते नहीं. वे हारते हैं, लेकिन कोशिश करना नहीं छोड़ते. वे प्रेम में घायल होते हैं, लेकिन प्रेम से विश्वास नहीं खोते. वे गलतियां करते हैं, लेकिन लौटने की संभावना बची रहती है.देव आनंद का सिनेमा इसलिए केवल रोमांस का सिनेमा नहीं है. वह उम्मीद का सिनेमा है. वह यात्रा का सिनेमा है. वह उस व्यक्ति का सिनेमा है जो अपनी जगह तलाश रहा है.

‘टैक्सी ड्राइवर’ का युवक हो, ‘बाजी’ का संघर्षरत व्यक्ति, ‘सी.आई.डी.’ का जांचकर्ता, ‘गाइड’ का राजू, ‘ज्वेल थीफ’ का रहस्यमय पात्र या ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की बदलती युवा दुनिया हर जगह कहीं न कहीं एक यात्रा है,बाहर की भी और भीतर की भी.

देव आनंद को केवल उनके सफल वर्षों से समझना पर्याप्त नहीं है. उनकी असफलताओं को भी समझना होगा, क्योंकि वहीं उनका एक दूसरा व्यक्तित्व दिखाई देता है. सफल कलाकारों की कहानी अक्सर उपलब्धियों से लिखी जाती है, लेकिन बड़े कलाकारों की कहानी उनके जोखिमों से भी लिखी जाती है.

देव आनंद ने जोखिम लिए. हर बार सफल नहीं हुए, लेकिन जोखिम लेना छोड़ा नहीं. यही उनकी सबसे बड़ी कलात्मक जिद थी.

उनका जीवन यह भी बताता है कि लोकप्रियता और महानता हमेशा एक ही चीज नहीं होती. कुछ फिल्में लोकप्रिय होती हैं और समय के साथ भूल जाती हैं. कुछ फिल्में आलोचकों को प्रिय होती हैं लेकिन जनता से दूर रहती हैं. देव आनंद की उपलब्धि यह रही कि उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लोकप्रियता और सिनेमाई महत्व के बीच पुल बना सका.

‘गाइड’, ‘सी.आई.डी.’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘काला पानी’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘टैक्सी ड्राइवर’ और ‘हम दोनों’ जैसी फिल्में आज भी चर्चा में हैं क्योंकि उनमें मनोरंजन के साथ शैली और विचार दोनों मौजूद हैं.

आज सिनेमा की दुनिया बदल चुकी है. अभिनेता सोशल मीडिया पर अपनी छवि बनाते हैं. फैशन कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया में फैल जाता है. स्टारडम के लिए डिजिटल प्रचार की पूरी मशीनरी मौजूद है, ऐसे समय में देव आनंद को देखना एक अलग अनुभव है.

उन्होंने सोशल मीडिया के बिना स्टारडम पैदा किया. उनके पास डिजिटल प्रचार नहीं था, लेकिन उनकी तस्वीरें पोस्टरों से लेकर पत्रिकाओं तक पहुंचती थीं. उनके पास वायरल वीडियो नहीं थे, लेकिन उनके गीत पूरे देश में गूंजते थे. उनके पास आधुनिक ब्रांड कैंपेन नहीं थे, लेकिन उनकी शैली खुद एक ब्रांड बन गई थी.

उन्होंने स्टारडम को उस समय आकार दिया जब स्टारडम केवल स्क्रीन पर उपस्थित रहने से नहीं, दर्शक की कल्पना में जगह बनाने से पैदा होता था और देव आनंद ने दर्शक की कल्पना में बहुत बड़ी जगह बनाई.

शायद इसलिए आज भी उनकी कोई पुरानी फिल्म शुरू होती है तो दर्शक कहानी से पहले उनकी चाल पहचान लेता है. गीत शुरू होता है तो चेहरा याद आता है,कोई पुराना संवाद सुनाई देता है तो आवाज सुनाई देती है, कोई स्कार्फ दिखाई देता है तो शैली याद आती है यही लोकप्रिय संस्कृति में अमर होने का अर्थ है.देव आनंद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उन्होंने कितनी फिल्में कीं, कितने पुरस्कार पाए या कितने वर्षों तक काम किया. उनकी असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक ऐसी नायक-छवि बनाई जो अपने समय की आधुनिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती थी.वह नायक परंपरा से पूरी तरह अलग नहीं था, लेकिन परंपरा से संतुष्ट भी नहीं था. वह प्रेम चाहता था, लेकिन केवल सामाजिक व्यवस्था की निर्धारित सीमाओं में नहीं. वह शहर चाहता था, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं. वह सफलता चाहता था, लेकिन केवल परिवार द्वारा तय रास्ते पर चलकर नहीं. वह अपनी जिंदगी खुद चुनना चाहता था.यही आकांक्षा देव आनंद को आज भी प्रासंगिक बनाती है.उनका चेहरा भले एक पुराने दौर का चेहरा हो, लेकिन उनके भीतर की बेचैनी आज के युवक की भी बेचैनी है. उनका शहर(मुंबई )पुराना  हो सकता है, लेकिन अपनी जगह बनाने की कोशिश आज भी वही है. उनका प्रेम पुराने गीतों में बसा हो सकता है, लेकिन प्रेम और स्वतंत्रता के बीच संघर्ष आज भी मौजूद है. उनकी फिल्मों के कपड़े पुराने हो सकते हैं, लेकिन आत्मनिर्भर होने का सपना पुराना नहीं हुआ.

इसलिए देव आनंद को याद करना केवल एक महान अभिनेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है. यह उस भारतीय सिनेमा को याद करना है जिसने आधुनिकता को गीत, प्रेम, अपराध, शहर और सपनों के माध्यम से समझने की कोशिश की थी. यह उस कलाकार को याद करना है जिसने अपने समय को केवल स्वीकार नहीं किया, उससे संवाद किया. साथ ही यह उस मनुष्य को याद करना भी है जिसने उम्र के सामने अपने भीतर के युवक को जीवित रखा.देव आनंद की कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा शायद यही है कि उनका अंतिम अध्याय भी किसी विराम की तरह नहीं लगता. उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक अभिनय और निर्देशन की कोशिश जारी रखी. ‘चार्जशीट’ तक उनका सक्रिय फिल्मी सफर दिखाई देता है, लेकिन उनकी कहानी वहां भी पूरी नहीं होती, क्योंकि देव आनंद स्वयं कभी यह मानने को तैयार नहीं हुए कि कहानी पूरी हो चुकी है.

मेरे लिए देव आनंद की सबसे बड़ी पहचान उनकी मुस्कान है.वह मुस्कान केवल रोमांस की नहीं थी, उसमें एक तरह की शरारत थी, आत्मविश्वास था, थोड़ी बेचैनी थी और सबसे बढ़कर भविष्य पर भरोसा था. वह जैसे कहती थी जो हो गया, वह हो गया; अब आगे देखते हैं.

यही उनका जीवन-दर्शन था.

और शायद इसी वजह से देव आनंद को समझते हुए मैं उनकी किसी एक फिल्म पर नहीं रुक पाता. ‘बाजी’ मुझे उनके भीतर की बेचैनी तक ले जाती है. ‘टैक्सी ड्राइवर’ शहर तक. ‘सी.आई.डी.’ उनकी गति तक. ‘काला पानी’ उनके गंभीर अभिनेता तक. ‘हम दोनों’ उनके रोमांटिक पक्ष तक. ‘गाइड’ उनके जटिल मनुष्य तक. ‘ज्वेल थीफ’ उनके फिल्मी रोमांच तक. ‘जॉनी मेरा नाम’ उनकी लोकप्रियता तक और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ उनके समय को पढ़ने वाले फिल्मकार तक.इन सबको जोड़ने पर जो चेहरा सामने आता है, वह केवल देव आनंद का चेहरा नहीं है. वह एक पूरे युग का चेहरा है. एक ऐसा युग जिसमें सिनेमा सपना था, गीत जीवन का हिस्सा थे, शहर उम्मीद था और नायक केवल ताकतवर नहीं, आकर्षक और संवेदनशील भी हो सकता था.
देव आनंद उसी युग के सबसे चमकदार प्रतिनिधियों में थे.

लेकिन वे केवल उस युग के नहीं थे.उनकी असली खूबी यह थी कि वे हर बदलते समय में अपने लिए एक नई जगह तलाशते रहे. शायद यही वजह है कि उन्हें देखकर आज भी लगता है कि वह आदमी कहीं गया नहीं है. वह अभी भी किसी पुराने गीत की धुन पर सड़क के किनारे चल रहा है. सिर थोड़ा झुका हुआ है, आंखों में चमक है, चेहरे पर मुस्कान है, और कदमों में वही गति है.

जैसे कह रहा हो
सफर अभी बाकी है और शायद देव आनंद की सबसे बड़ी कहानी भी यही है कि सफर कभी खत्म नहीं हुआ.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-