आरटीआई छूट पर घिरी विजय सरकार कुछ घंटों में पलटी, कानून व्यवस्था विभाग को फिर सूचना के अधिकार के दायरे में लाया

आरटीआई छूट पर घिरी विजय सरकार कुछ घंटों में पलटी, कानून व्यवस्था विभाग को फिर सूचना के अधिकार के दायरे में लाया

प्रेषित समय :21:35:12 PM / Sun, Sep 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

चेन्नई. तमिलनाडु की सी. जोसेफ विजय सरकार ने सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग को सूचना का अधिकार अधिनियम से बाहर रखने वाला अपना आदेश रविवार को वापस ले लिया. सरकार ने 21 सितंबर 2026 को जारी शासनादेश को रद्द करने की घोषणा उस समय की, जब आदेश सार्वजनिक होने के बाद सहयोगी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य राजनीतिक हलकों से सवाल उठने लगे. यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित विभाग पुलिस कार्रवाई, हिरासत में मौत, मानवाधिकार शिकायतों, राजनीतिक प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील मामलों के रिकॉर्ड से संबंधित काम देखता है.

सरकार ने स्पष्ट किया कि मानव संसाधन प्रबंधन विभाग का 21 सितंबर का शासनादेश, जिसमें सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के तहत सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग को छूट देने का प्रावधान किया गया था, अब रद्द कर दिया गया है. इस फैसले के साथ संबंधित विभाग फिर आरटीआई व्यवस्था के सामान्य दायरे में आ गया है.

कुछ घंटों में बदला फैसला
रविवार सुबह जब सरकार का पुराना आदेश सार्वजनिक हुआ, तब इसे लेकर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं. आलोचना केवल विपक्षी खेमे तक सीमित नहीं रही, बल्कि सरकार को समर्थन देने वाले दलों की ओर से भी सवाल उठाए गए. इसके बाद सरकार ने उसी दिन आदेश वापस लेने की घोषणा कर दी.

मूल आदेश में सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग को तमिलनाडु सरकार द्वारा स्थापित खुफिया और सुरक्षा संगठन के रूप में अधिसूचित किया गया था. इसी आधार पर उसे आरटीआई अधिनियम की धारा 24 के तहत छूट देने का निर्णय लिया गया था. अब यह अधिसूचना प्रभावी नहीं रहेगी.

क्यों महत्वपूर्ण था कानून व्यवस्था विभाग
इस पूरे विवाद का मुख्य कारण संबंधित विभाग की जिम्मेदारियां हैं. विभाग केवल खुफिया या सुरक्षा संबंधी गोपनीय गतिविधियों से जुड़ा नहीं है. इसके कामकाज में पुलिस हिरासत में मौत से संबंधित जांच रिपोर्ट, पुलिस प्रताड़ना के आरोप, रिमांड पर रखे गए लोगों की मौत और पुलिस फायरिंग से संबंधित जांच जैसे विषय भी शामिल हैं.

इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से आने वाले संदर्भों को देखना भी विभाग के काम का हिस्सा है. सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष, राजनीतिक आंदोलन तथा उनसे जुड़े मामलों को वापस लेने के अनुरोधों पर भी विभाग काम करता है. छात्रों और कृषि श्रमिकों से संबंधित आंदोलनों से जुड़े विषय भी इसके दायरे में आते हैं.

यही वजह थी कि विभाग को आरटीआई से पूरी तरह बाहर करने के प्रस्ताव ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया.

आरटीआई कानून की धारा 24 का क्या है प्रावधान
मूल आदेश सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के आधार पर जारी किया गया था. यह प्रावधान राज्य सरकारों को उनके द्वारा स्थापित खुफिया और सुरक्षा संगठनों को आरटीआई कानून से छूट देने की अनुमति देता है. तमिलनाडु सरकार ने इसी प्रावधान के तहत सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग को खुफिया और सुरक्षा संगठन के रूप में अधिसूचित किया था.

हालांकि धारा 24 के तहत मिलने वाली छूट पूर्ण नहीं है. कानून में भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित सूचनाओं को इस आधार पर पूरी तरह बाहर नहीं रखा गया है. मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित सूचना मांगने के लिए अधिनियम में अतिरिक्त शर्तें भी निर्धारित हैं.

पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर उठे सवाल
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि विभाग के रिकॉर्ड में पुलिस और नागरिक अधिकारों से संबंधित संवेदनशील जानकारियां भी शामिल होती हैं. हिरासत में मौत, पुलिस प्रताड़ना, पुलिस फायरिंग और मानवाधिकार आयोग से जुड़े मामले ऐसे विषय हैं जिनमें सरकारी रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.

यदि विभाग को आरटीआई से छूट मिलती, तो नागरिकों, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के लिए इन विषयों से जुड़ी सामान्य प्रशासनिक जानकारी हासिल करने का रास्ता प्रभावित हो सकता था. हालांकि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित सूचना के संबंध में आरटीआई कानून की अपनी अलग सुरक्षा व्यवस्था बनी रहती.

सामाजिक संगठनों ने किया विरोध
तमिलनाडु के भ्रष्टाचार विरोधी संगठन अरप्पोर इयक्कम ने मूल आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई थी. संगठन का तर्क था कि सार्वजनिक विभाग के कानून एवं व्यवस्था प्रभाग के पास मौजूद सभी सूचनाओं को खुफिया प्रकृति का मानना उचित नहीं होगा. संगठन ने आदेश वापस लेने की मांग की थी.

संगठन की प्रतिक्रिया के अनुसार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था के लिए सरकारी रिकॉर्ड तक नागरिकों की पहुंच महत्वपूर्ण है. इसी संदर्भ में कानून एवं व्यवस्था विभाग को आरटीआई से छूट देने के फैसले पर सवाल उठाए गए थे.

सहयोगी दलों से भी सामने आई आपत्ति
मामले में राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सरकार के समर्थन में रहने वाले दलों की ओर से भी आदेश पर सवाल उठे. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के सांसद सु. वेंकटेशन ने निर्णय की आलोचना की. विदुथलाई चिरुथैगल काची के अध्यक्ष और सांसद थोल. थिरुमावलवन ने भी आदेश को लेकर चिंता जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की थी.

इन प्रतिक्रियाओं के बाद सरकार का आदेश वापस लेना इस पूरे घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण चरण बना.

विभाग के पास कई संवेदनशील जिम्मेदारियां
सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग की जिम्मेदारियां काफी व्यापक हैं. विभाग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण कानून के तहत निवारक हिरासत से जुड़े मामलों को भी देखता है. हिरासत में लिए गए लोगों की ओर से आने वाले अभ्यावेदन तथा उनके संबंध में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं से जुड़े विषय भी इसके कार्यक्षेत्र में आते हैं.

इसके अलावा विभाग कानून एवं व्यवस्था की मासिक समीक्षा बैठकों, विशेष बैठकों, सांप्रदायिक घटनाओं से संबंधित रिपोर्ट और संसद में पूछे गए सवालों के जवाब तैयार करने जैसी जिम्मेदारियां भी संभालता है.

राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक अभिव्यक्ति से जुड़ा एक अन्य पहलू भी इसके काम में शामिल है. कथित मानहानिकारक लेखों, समाचार रिपोर्टों और भाषणों के संबंध में अभियोजन की अनुमति से जुड़े प्रस्तावों पर भी विभाग विचार करता है.

सरकार के लिए पारदर्शिता का मुद्दा फिर सामने
आरटीआई छूट का यह प्रकरण ऐसे समय सामने आया है जब विजय सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और पारदर्शिता को अपने सार्वजनिक राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनाया है. मूल आदेश और उसके बाद उसे वापस लेने की प्रक्रिया ने सरकार की प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर भी चर्चा शुरू कर दी है. हालांकि सरकार ने आदेश वापस लेने के पीछे अपनी विस्तृत राजनीतिक या प्रशासनिक वजह सार्वजनिक रूप से नहीं बताई है.

सरकार के इस फैसले के बाद अब सार्वजनिक कानून एवं व्यवस्था विभाग को आरटीआई से छूट देने वाली 21 सितंबर की अधिसूचना प्रभावी नहीं रहेगी. आगे इस विभाग से संबंधित सूचना के अधिकार के आवेदन सामान्य कानूनी ढांचे के तहत देखे जाएंगे, जबकि आरटीआई अधिनियम में मौजूद अन्य वैधानिक अपवाद और गोपनीयता संबंधी प्रावधान अपने स्थान पर लागू रहेंगे.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-