जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI से जुड़े होने पर सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल, CEC कानून पर 23 सितंबर का आदेश वापस लेने की मांग

जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI से जुड़े होने पर सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल, CEC कानून पर 23 सितंबर का आदेश वापस लेने की मांग

प्रेषित समय :23:33:09 PM / Wed, Sep 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला एक बार फिर चर्चा में है. 23 सितंबर को दिए गए आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्जी दाखिल की गई है. याचिकाकर्ता नमन शेरस्ट्रा ने अपनी अर्जी में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनके बेटे के भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में वकील के रूप में पेश होने की जानकारी सुनवाई के दौरान पक्षकारों के सामने नहीं रखी गई.

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तथ्य के सामने आने के बाद 23 सितंबर के आदेश को वापस लेकर मामले की दोबारा सुनवाई किसी उपयुक्त पीठ से कराई जानी चाहिए. हालांकि, अर्जी में जस्टिस शर्मा पर व्यक्तिगत पक्षपात या दुर्भावना का आरोप लगाने से इनकार किया गया है. याचिका का आधार न्यायिक निष्पक्षता को लेकर पैदा हुई कथित आशंका और इस तथ्य का खुलासा नहीं होना बताया गया है. 

पांच बार हुई सुनवाई, अब सामने आया जज के बेटे का ECI से संबंध
अर्जी के अनुसार CEC और EC की नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने पांच मौकों पर सुनवाई की थी. इनमें 6 मई, 7 मई, 14 मई, 27 मई और 30 जुलाई की सुनवाई शामिल है. 30 जुलाई को पीठ ने इस सवाल पर अपना आदेश सुरक्षित रखा था कि मामले को पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं.

याचिकाकर्ता का दावा है कि इन सुनवाइयों के दौरान जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पेश होने की जानकारी पक्षकारों को नहीं दी गई. अर्जी में कहा गया है कि इस संबंध में जानकारी 23 सितंबर के आदेश के दो दिन बाद सामने आई मीडिया रिपोर्टों से मिली.

अर्जी में इसी आधार पर कहा गया है कि यदि यह तथ्य पहले से पता होता तो याचिकाकर्ता न्यायाधीश से अलग होने यानी recusal का अनुरोध कर सकते थे. याचिका के मुताबिक जानकारी सामने नहीं आने के कारण उन्हें ऐसा अनुरोध करने का अवसर नहीं मिला.

23 सितंबर को दो जजों की राय अलग रही
CEC और EC की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अलग-अलग राय दी थी. सवाल यह था कि क्या मामले में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों की सुनवाई पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ से कराई जानी चाहिए.

जस्टिस दत्ता का मत था कि मामले को संविधान पीठ को भेजने की जरूरत नहीं है और चुनौती पर पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर विचार किया जा सकता है. वहीं जस्टिस शर्मा ने माना कि मामले में संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं और संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत इसकी सुनवाई कम से कम पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की जानी चाहिए.

दोनों न्यायाधीशों की राय अलग होने के बावजूद मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने पर सहमति बनी, ताकि उचित संख्या वाली पीठ के गठन पर निर्णय लिया जा सके.

अर्जी में वास्तविक पक्षपात का आरोप नहीं
नमन शेरस्ट्रा की अर्जी में एक महत्वपूर्ण बात यह कही गई है कि वह जस्टिस शर्मा पर वास्तविक पक्षपात, किसी व्यक्तिगत उद्देश्य या दुर्भावना का आरोप नहीं लगा रहे हैं. उनकी दलील न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता की धारणा से जुड़ी है.

अर्जी में 1997 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा अपनाए गए ‘Restatement of Values of Judicial Life’ का भी हवाला दिया गया है. याचिकाकर्ता ने इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा है कि न्याय केवल किया जाना ही नहीं, बल्कि ऐसा दिखाई भी देना चाहिए कि निष्पक्ष न्याय किया गया है.

इसी आधार पर याचिकाकर्ता का कहना है कि संबंधित तथ्य का खुलासा सुनवाई के दौरान पक्षकारों के सामने होना चाहिए था. हालांकि, यह अभी याचिकाकर्ता की दलील है और सुप्रीम कोर्ट को इस पर विचार करना बाकी है.

जस्टिस शर्मा के बेटे की ECI में भूमिका का क्या दावा है
अर्जी में दावा किया गया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे को 10 जुलाई 2024 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ECI के लिए स्टैंडिंग काउंसल के रूप में नियुक्त किया गया था. याचिकाकर्ता ने इस तथ्य को मौजूदा CEC ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति के बाद की स्थिति से जोड़ते हुए अपनी आपत्ति दर्ज की है. 

याचिका में कहा गया है कि यदि यह जानकारी पहले से उपलब्ध होती तो पक्षकार न्यायिक पीठ के समक्ष recusal का अनुरोध कर सकते थे. याचिकाकर्ता का तर्क है कि जानकारी के अभाव में उन्हें ऐसा अवसर नहीं मिला.

इससे पहले भी दाखिल हो चुकी है दूसरी याचिका
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में यह पहली याचिका नहीं है. कांग्रेस नेता और इसी मामले की एक याचिकाकर्ता जया ठाकुर ने भी 29 सितंबर को एक curative petition दाखिल की थी. उसमें 23 सितंबर के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI से जुड़े होने के आधार पर निष्पक्षता को लेकर आशंका जताई गई है. 

हालांकि दोनों अर्जियों के आधार और राहत की मांग में अंतर है. नमन शेरस्ट्रा की अर्जी विशेष रूप से इस बात पर जोर देती है कि जस्टिस शर्मा के बेटे की ECI से जुड़ी भूमिका की जानकारी सुनवाई के दौरान पक्षकारों को नहीं दी गई थी.

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि क्या इन परिस्थितियों में 23 सितंबर के आदेश को वापस लेने या मामले पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है. याचिकाकर्ता ने कहा है कि यदि अदालत उनकी आपत्ति को उचित मानती है तो CJI द्वारा गठित किसी उपयुक्त पीठ के सामने संविधान पीठ को संदर्भित करने के सवाल पर दोबारा विचार किया जा सकता है.

फिलहाल 23 सितंबर के आदेश और उसके बाद दाखिल याचिकाओं से जुड़े मुद्दे न्यायिक विचार के अधीन हैं. जस्टिस शर्मा के बेटे का ECI के लिए वकील के रूप में पेश होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित न्यायिक कार्यवाही में वास्तविक पक्षपात हुआ. इस संबंध में अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आगे के आदेश से ही स्पष्ट होगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-