दादा की जगह पोते को भी मिल सकती है अनुकंपा नौकरी सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की याचिका खारिज कर हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा

दादा की जगह पोते को भी मिल सकती है अनुकंपा नौकरी सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की याचिका खारिज कर हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा

प्रेषित समय :19:21:16 PM / Fri, Oct 2nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें रेलवे को मृत कर्मचारी के पोते जितेंद्र वर्मा के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने का निर्देश दिया गया था. जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने केंद्र सरकार और रेलवे की चुनौती खारिज कर दी. मामला UNION OF INDIA & ORS. VERSUS JITENDRA VERMA का है. 

मामला पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-II/खलासी के पद पर कार्यरत रहीं छमा बाई से जुड़ा है. उनके पति मुन्ना की 18 अगस्त 2002 को मृत्यु हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे यानी जितेंद्र के पिता की भी 12 अगस्त 2006 को मृत्यु हो गई.

पिता की मौत के बाद जितेंद्र वर्मा का पालन-पोषण उनकी दादी छमा बाई ने किया. छमा बाई की 19 जून 2016 को नौकरी के दौरान मृत्यु हो गई. इसके बाद जितेंद्र ने दादी की मृत्यु के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का दावा किया. 2007 में सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज था नाम

रिकॉर्ड के अनुसार जितेंद्र वर्मा का नाम वर्ष 2007 में छमा बाई के सर्विस रिकॉर्ड में कानूनी उत्तराधिकारी और नामिनी के तौर पर दर्ज किया गया था. बाद में उन्होंने सिविल कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी प्राप्त किया.

हालांकि रेलवे अधिकारियों ने इस प्रमाण पत्र को अनुकंपा नियुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं माना. रेलवे की ओर से यह भी आपत्ति उठाई गई कि जितेंद्र को छमा बाई का कानूनी रूप से गोद लिया हुआ बेटा साबित नहीं किया गया है. रेलवे ने कहा पोते के लिए नियुक्ति का प्रावधान नहीं

जितेंद्र की ओर से दावा किया गया था कि वह छमा बाई के गोद लिए हुए बेटे थे. रेलवे ने गोद लेने की वैधता पर सवाल उठाया और दावा खारिज कर दिया. रेलवे का एक तर्क यह भी था कि मृत कर्मचारी के पोते को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान नहीं है.

इसके बाद मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण तक पहुंचा. अधिकरण ने रेलवे को जितेंद्र के दावे पर संबंधित नीति के तहत पुनर्विचार करने का निर्देश दिया. रेलवे ने इस आदेश को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी. हाईकोर्ट ने ‘Near Relative’ प्रावधान पर दिया जोर

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 25 फरवरी 2026 को रेलवे की याचिका खारिज करते हुए मामले पर विस्तार से विचार किया. कोर्ट ने रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के क्लॉज III का उल्लेख किया.

इस प्रावधान में मृत कर्मचारी के बेटे, बेटी, विधवा या विधुर को अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र बताया गया है. साथ ही निर्धारित शर्तों के अधीन “near relative/adopted son/daughter” को भी अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिए जाने की व्यवस्था है. 

हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही जितेंद्र को कानूनी रूप से छमा बाई का गोद लिया हुआ बेटा नहीं माना जाए, लेकिन वह मृत कर्मचारी के एकमात्र करीबी रिश्तेदार होने के दावे के आधार पर विचार किए जाने से बाहर नहीं किए जा सकते.

कोर्ट ने यह भी माना कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र उनके पास मौजूद है और उनके अलावा छमा बाई की अनुकंपा नियुक्ति तथा सेवानिवृत्ति संबंधी देयकों पर दावा करने वाला कोई अन्य सदस्य सामने नहीं आया है.

हाईकोर्ट ने 30 दिन में नियुक्ति का निर्देश दिया था
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केवल मामले पर विचार करने तक सीमित रहने के बजाय रेलवे को जितेंद्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने इसके लिए 30 दिन की समयसीमा तय की थी.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य ही उस परिवार को तत्काल राहत देना है, जो कर्मचारी की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट में आता है. अदालत ने मामले में देरी पर रेलवे पर 10 हजार रुपये की लागत भी लगाई थी.सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की चुनौती में हस्तक्षेप नहीं किया

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार और रेलवे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने रेलवे की चुनौती को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.

इससे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का वह आदेश बरकरार रहा, जिसके तहत जितेंद्र वर्मा के अनुकंपा नियुक्ति के दावे को रेलवे की संबंधित नीति में मौजूद करीबी रिश्तेदार के प्रावधान के आधार पर देखा गया था. aw)

फैसले का मुख्य बिंदु क्या है
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का प्रभाव यह है कि रेलवे की नीति में यदि near relative को निर्धारित शर्तों के साथ अनुकंपा नियुक्ति के दायरे में रखा गया है, तो केवल इस आधार पर दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि आवेदक मृत कर्मचारी का सीधा बेटा या बेटी नहीं है.

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पोते को स्वतः अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिल गया है. इस मामले में जितेंद्र वर्मा की पारिवारिक परिस्थितियां, दादी द्वारा पालन-पोषण, सर्विस रिकॉर्ड में उनका नाम, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र और रेलवे की अपनी नीति में करीबी रिश्तेदार के लिए मौजूद प्रावधान महत्वपूर्ण रहे. Case Title: UNION OF INDIA & ORS. VERSUS JITENDRA VERMA

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-