केन-बेतवा परियोजना पर हाईकोर्ट सख्त, पन्ना टाइगर रिजर्व और 60 लाख पेड़ों की कटाई के दावों पर CEC रिपोर्ट तलब

केन-बेतवा परियोजना पर हाईकोर्ट सख्त, पन्ना टाइगर रिजर्व और 60 लाख पेड़ों की कटाई के दावों पर CEC रिपोर्ट तलब

प्रेषित समय :18:47:20 PM / Fri, Oct 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं एक बार फिर न्यायिक सुनवाई के केंद्र में आ गई हैं. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं. याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का आधे से अधिक हिस्सा डूब क्षेत्र में आ सकता है और लगभग 60 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका है. इसके अलावा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, केन घड़ियाल अभयारण्य, स्थानीय आदिवासी समुदायों और किसानों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का मुद्दा भी उठाया गया है.

मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार से CEC की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करने को कहा है. अदालत ने रिपोर्ट में सामने आई कथित अनियमितताओं तथा परियोजना से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही की वर्तमान स्थिति की जानकारी भी मांगी है. मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है.

पन्ना टाइगर रिजर्व के बड़े हिस्से पर डूब का खतरा 

जबलपुर निवासी अधिवक्ता अरिहंत तिवारी की ओर से दायर जनहित याचिका में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. याचिका के अनुसार, परियोजना के अंतर्गत बांध और जलाशय के निर्माण से पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है. याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि जलभराव के कारण संरक्षित वन क्षेत्र के आधे से अधिक हिस्से पर असर पड़ने की आशंका है.

याचिका में कहा गया है कि पन्ना टाइगर रिजर्व बाघों के संरक्षण के साथ-साथ अनेक दूसरे वन्यजीवों के लिए भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यहां बाघ, तेंदुए, गिद्ध और अन्य प्रजातियां पाई जाती हैं. बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होने से इन जीवों के प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता और आवागमन के रास्तों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है.

याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी भी बड़ी विकास परियोजना का मूल्यांकन केवल सिंचाई और पेयजल से होने वाले लाभों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए. वन्यजीवों के संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का भी समुचित आकलन जरूरी है. हालांकि, रिजर्व के कितने हिस्से पर वास्तविक प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित आधिकारिक रिपोर्टों और न्यायिक कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा.

60 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान

जनहित याचिका में लगभग 60 लाख पेड़ों की कटाई का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है. याचिकाकर्ता ने वन संबंधी आधिकारिक दस्तावेजों और रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया है कि परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होगा.

बुंदेलखंड क्षेत्र पहले से ही अनियमित वर्षा, सूखे और जल संकट जैसी चुनौतियों का सामना करता रहा है. ऐसे में याचिका में आशंका जताई गई है कि व्यापक वन कटाई से स्थानीय पर्यावरण, मिट्टी की नमी, जल संरक्षण और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

हालांकि, पेड़ों की कटाई से संबंधित संख्या को याचिका में किए गए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए. इसकी अंतिम पुष्टि के लिए स्वीकृत वन क्षेत्र, वास्तविक कटाई की स्थिति और संबंधित सरकारी अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक होगा. अदालत द्वारा CEC की रिपोर्ट तलब किए जाने से इन पहलुओं पर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है.

केन घड़ियाल अभयारण्य के प्रभाव का आकलन भी महत्वपूर्ण

याचिका में केन घड़ियाल अभयारण्य पर परियोजना के संभावित प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में घड़ियाल अभयारण्य पर पड़ने वाले प्रभाव के पर्याप्त आकलन को लेकर चिंता जताई है.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के स्तर पर इस प्रभाव का स्वतंत्र और समुचित वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया गया. याचिकाकर्ता ने मांग की है कि परियोजना से नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जलीय जीवों के आवास और घड़ियालों के संरक्षण पर पड़ने वाले असर की वैज्ञानिक जांच कराई जाए.

नदी जोड़ो परियोजनाओं में जल प्रवाह में बदलाव, जलीय पारिस्थितिकी और नदी के निचले हिस्सों पर संभावित प्रभाव महत्वपूर्ण विषय होते हैं. ऐसे में संबंधित विशेषज्ञ रिपोर्टों और पर्यावरणीय आकलन की भूमिका इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

वर्ष 2017 की पर्यावरणीय रिपोर्ट पर उठाए सवाल

याचिका में वर्ष 2017 में तैयार पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी EIA रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता का आरोप है कि रिपोर्ट में कुछ तथ्यात्मक त्रुटियां थीं और विभिन्न आधिकारिक एजेंसियों ने भी कुछ पहलुओं पर आपत्तियां जताई थीं.

याचिका के अनुसार, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की विशेषज्ञ समिति की ओर से स्वतंत्र हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन कराए जाने की जरूरत का मुद्दा भी उठाया गया था. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि परियोजना के प्रभावों का आकलन करते समय इन चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया.

इस संबंध में अदालत ने केंद्र सरकार से CEC की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही की जानकारी देने को कहा है. अब संबंधित दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि किन बिंदुओं पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं और उनके समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए.

आदिवासी और किसानों के विरोध का मुद्दा भी अदालत में

जनहित याचिका में परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों की समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है. याचिकाकर्ता ने छतरपुर जिले में परियोजना के विरोध में चल रहे कथित आंदोलन और ग्रामीणों पर प्रशासनिक दबाव बनाए जाने के आरोप लगाए हैं.

याचिका में दावा किया गया है कि आदिवासी महिलाओं और ग्रामीणों ने छोटे बच्चों को गोद में लेकर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया. इसे स्थानीय समुदायों की चिंताओं और परियोजना के सामाजिक प्रभावों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है.

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि आंदोलनकारियों को परेशान किया गया और कुछ स्थानों पर राशन, पानी तथा अन्य जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता और गांवों में आवाजाही को लेकर प्रतिबंध जैसी स्थितियां उत्पन्न हुईं. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विवरण से नहीं होती और अदालत ने अभी इन पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है.

परियोजना के संदर्भ में विस्थापन, पुनर्वास, आजीविका और स्थानीय समुदायों के अधिकार भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं. इसलिए प्रभावित आबादी के हितों की रक्षा और पुनर्वास संबंधी प्रावधानों का उचित क्रियान्वयन भी व्यापक बहस का हिस्सा है.

बुंदेलखंड को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने का उद्देश्य

केन-बेतवा लिंक परियोजना की परिकल्पना 1980 के दशक में की गई थी. बाद के वर्षों में परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया चली और 8 दिसंबर 2021 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसके वित्तपोषण और क्रियान्वयन को मंजूरी दी. इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

परियोजना का प्रमुख उद्देश्य केन नदी के जल को बेतवा नदी बेसिन की ओर स्थानांतरित कर बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ाना है. परियोजना के समर्थकों के अनुसार, इससे कृषि उत्पादन, ग्रामीण आजीविका और क्षेत्रीय जल उपलब्धता में सुधार की संभावना है.

परियोजना से मध्यप्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन सहित कई जिलों तथा उत्तरप्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी और ललितपुर क्षेत्रों को लाभ मिलने का दावा किया गया है. हालांकि, इन संभावित लाभों के साथ पर्यावरणीय नुकसान और सामाजिक प्रभावों का संतुलित मूल्यांकन भी जरूरी है.

केंद्र और राज्य सरकार के जवाब पर टिकी निगाहें

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अरिहंत तिवारी ने स्वयं अपना पक्ष रखा. केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील जैन और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा उपस्थित हुए.

अदालत ने केंद्र सरकार से CEC की रिपोर्ट प्रस्तुत करने और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. साथ ही, रिपोर्ट में बताई गई कथित अनियमितताओं के संबंध में भी जानकारी मांगी गई है.

अब अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की ओर से कौन-से दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं और पर्यावरणीय चिंताओं पर क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है. फिलहाल अदालत ने याचिका में लगाए गए सभी आरोपों को सही घोषित नहीं किया है. मामले का अंतिम निष्कर्ष संबंधित रिपोर्टों, सरकारी पक्ष और न्यायिक परीक्षण के बाद ही सामने आएगा.

केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड की जल जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन इसके साथ पन्ना टाइगर रिजर्व, वन संपदा, जलीय जीवों और स्थानीय समुदायों के हितों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है. आने वाली सुनवाई में इसी संतुलन से जुड़े सवालों पर स्थिति और स्पष्ट होने की संभावना है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-