-राजेश कुमार सिन्हा
भारतीय सिनेमा में त्योहारों की उपस्थिति केवल धार्मिक आस्था या उत्सव के उल्लास की अभिव्यक्ति नहीं है. वे समाज के रीति रिवाजों,पारिवारिक संबंधों, सांस्कृतिक पहचान और बदलते जीवन-मूल्यों को समझने का माध्यम भी हैं. हिंदी फिल्मों में दीपावली, होली, ईद और गणेशोत्सव की तरह दुर्गा पूजा भी अनेक अर्थों के साथ उपस्थित होती रही है, लेकिन इसकी सिनेमाई यात्रा कुछ अलग है. बंगाल की मिट्टी, इतिहास, साहित्य और सामाजिक जीवन में गहराई से रची-बसी दुर्गा पूजा जब हिंदी फिल्मों के पर्दे पर आती है, तो वह एक क्षेत्रीय उत्सव से आगे बढ़कर प्रेम, स्त्री-शक्ति, वर्गीय विभाजन और न्याय की आकांक्षा का प्रतीक बन जाती है. कभी वह नायिका के मन में उठती भावनाओं को दृश्यात्मक विस्तार देती है, कभी परिवार के भीतर छिपे तनावों को उजागर करती है और कभी किसी रहस्य कथा के निर्णायक मोड़ को सांस्कृतिक अर्थ प्रदान करती है. इसलिए हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा की पड़ताल वस्तुतः भारतीय लोकप्रिय सिनेमा और क्षेत्रीय संस्कृति के संबंधों की पड़ताल भी है.
दुर्गा पूजा का सांस्कृतिक संसार अपने भीतर अनेक परतों समेटे हुए है. यह देवी की शक्ति का उत्सव है, लेकिन साथ ही मां और बेटी के भावनात्मक संबंध की स्मृति भी है. यह सामूहिकता का पर्व है, लेकिन इसके आयोजन में सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक असमानता की छाया भी दिखाई देती है. यह धार्मिक अनुष्ठान है, मगर कला, संगीत, शिल्प, बाजार और सार्वजनिक जीवन का व्यापक आयोजन भी है. देवी का आगमन उल्लास लेकर आता है और उनकी विदाई मन में विषाद भर देती है. इस उत्सव की यही बहुस्तरीयता इसे सिनेमा के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बनाती है. फिल्मकार को यहां केवल रंगीन दृश्य नहीं मिलता, बल्कि ऐसा सांस्कृतिक परिवेश मिलता है, जिसमें पात्रों के निजी जीवन और समाज की सामूहिक चेतना को एक साथ अभिव्यक्त किया जा सकता है. मुझे लगता है कि इस विषय पर चर्चा करते समय हिंदी और बांग्ला सिनेमा के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है. दुर्गा पूजा बंगाल के सामाजिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, इसलिए उसका सबसे गहरा और विस्तृत चित्रण बांग्ला सिनेमा में मिलता है. सत्यजित राय की "पाथेर पांचाली" "देवी" और "जय बाबा फेलुनाथ" तथा ऋतुपर्ण घोष की "उत्सव" जैसी फिल्में इस सांस्कृतिक संसार को अलग-अलग दृष्टियों से समझने में सहायता करती हैं. दूसरी ओर, "देवदास" "परिणीता" , "कहानी" और "रॉकी और रानी की प्रेम कहानी" जैसी हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा की उपस्थिति लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी हैं. शायद इन दोनों परंपराओं को एक मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन इनके बीच संवाद स्थापित किए बिना हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा के बदलते अर्थों को पूरी तरह समझना भी संभव नहीं है.हिंदी सिनेमा का विकास मुंबई में हुआ, लेकिन उसकी रचनात्मक परंपरा पर बंगाल का प्रभाव लगातार बना रहा. साहित्य, संगीत, अभिनय और निर्देशन के क्षेत्र में बंगाल से आए कलाकारों ने हिंदी फिल्मों को समृद्ध किया. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की साहित्यिक कृतियों के फिल्मांकन से लेकर कोलकाता की शहरी संवेदना के चित्रण तक बंगाली संस्कृति ने हिंदी सिनेमा को अनेक कथाएं और दृश्य दिए. दुर्गा पूजा इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक विशिष्ट उदाहरण है. हिंदी फिल्मों ने इसके माध्यम से दर्शकों को ऐसे उत्सव से परिचित कराया, जिसमें धर्म और सौंदर्य के साथ पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कला और सार्वजनिक जीवन की अनेक परतें जुड़ी हुई हैं.हालांकि दुर्गा पूजा का चित्रण करने और उसे कथानक का अभिन्न हिस्सा बनाने में अंतर है. किसी फिल्म में पूजा मंडप, देवी की प्रतिमा, लाल साड़ी और ढाक की आवाज दिखाई-सुनाई दे सकती है, लेकिन इससे त्योहार की सांस्कृतिक आत्मा अपने आप सामने नहीं आ जाती. इसके लिए जरूरी है कि उत्सव का संबंध पात्रों के जीवन, उनकी आकांक्षाओं और संघर्षों से स्थापित हो. हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा के सबसे दिलचस्प उदाहरण वे हैं, जहां वह केवल दृश्य-सज्जा नहीं रहती, बल्कि कथा को आगे बढ़ाती है, चरित्रों के भीतर छिपे भावों को प्रकट करती है अथवा घटनाओं को नया अर्थ देती है.संजय लीला भंसाली की "देवदास" इस संदर्भ में सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में देवदास, पारो और चंद्रमुखी की त्रासद प्रेमकथा को असाधारण विजुअल भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया है. शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय बच्चन और माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म का सांस्कृतिक संसार रंगों, परिधानों, संगीत, स्थापत्य और नृत्य से निर्मित होता है. दुर्गा पूजा के दृश्य इस संसार को बंगाली पहचान प्रदान करते हैं, लेकिन उनका महत्त्व केवल सांस्कृतिक प्रामाणिकता तक सीमित नहीं है. वे फिल्म के स्त्री-पात्रों, उनके संबंधों और उनके भावनात्मक व्यक्तित्व को सामने लाने का अवसर भी देते हैं. ‘डोला रे डोला’ इस फिल्म का ऐसा गीत है, जिसने दुर्गा पूजा की सिनेमाई छवि को व्यापक लोकप्रियता प्रदान की. ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित का एक साथ नृत्य करना हिंदी फिल्मों की उस प्रचलित परंपरा से अलग अनुभव देता है, जिसमें दो प्रमुख स्त्री पात्र प्रायः एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी होती हैं. पारो और चंद्रमुखी के जीवन की परिस्थितियां अलग हैं. एक संपन्न परिवार की बेटी है, दूसरी तवायफ की सामाजिक स्थिति में जीवन बिताती है. उनके संसार के बीच सामाजिक दूरी है, लेकिन दोनों के भीतर प्रेम, पीड़ा और आत्मसम्मान की गहरी अनुभूति मौजूद है. पूजा के उत्सव के वातावरण में उनका साझा नृत्य इन भिन्नताओं के बावजूद स्त्री-अनुभव की एक ऐसी समानता को सामने लाता है, जो पुरुष-केंद्रित प्रेमकथा की सीमाओं से आगे जाती है.
इस दृश्य का महत्त्व इसलिए भी है कि देवदास का पुरुष नायक अपनी भावनाओं को निर्णय में बदलने में असमर्थ रहता है. वह प्रेम करता है, लेकिन सामाजिक दबाव, आत्ममुग्धता और अनिर्णय से मुक्त नहीं हो पाता. इसके विपरीत पारो और चंद्रमुखी अपने-अपने दुखों के बावजूद जीवन का सामना करती हैं. ‘डोला रे डोला’ के दौरान उनकी उपस्थिति एक ऐसे विजुअल विरोधाभास को जन्म देती है, जिसमें पुरुष की भावनात्मक दुर्बलता के बीच स्त्रियों की जीवंतता और परस्पर निकटता दिखाई देती है. देवी दुर्गा की आराधना के अवसर पर दो स्त्रियों का यह साझा उल्लास फिल्म की त्रासदी के भीतर एक अलग भावभूमि तैयार करता है.
भंसाली की विजुअल लेंग्वेज में भव्यता स्वयं एक कथा कहन का साधन है. विशाल पूजा मंडप, चमकदार रंग, पारंपरिक आभूषण, साड़ियों की गति और समूह नृत्य उत्सव को एक ऐसे दृश्य में बदल देते हैं, जिसे दर्शक लंबे समय तक याद रखता है. लेकिन इस भव्यता की आलोचनात्मक समीक्षा भी जरूरी है. वास्तविक दुर्गा पूजा केवल सौंदर्य और प्रदर्शन का आयोजन नहीं है. उसमें प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों का श्रम, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारिवारिक स्मृतियां और सामाजिक जीवन की जटिलताएं भी शामिल हैं. देवदास इन सबका विस्तृत चित्रण करने का प्रयास नहीं करती; उसका लक्ष्य एक त्रासद प्रेमकथा को दृश्यात्मक वैभव देना है. इसलिए उसके पूजा-दृश्यों को बंगाली समाज के संपूर्ण प्रतिनिधित्व के बजाय सांस्कृतिक परंपरा की कलात्मक पुनर्रचना के रूप में देखना अधिक उचित है,
फिर भी फिल्म की उपलब्धि कम नहीं है. उसने दुर्गा पूजा को हिंदी फिल्म संगीत की सामूहिक स्मृति में स्थापित किया और एक क्षेत्रीय उत्सव की छवि को राष्ट्रीय दर्शक-वर्ग तक पहुंचाया. इसके साथ उसने एक दिलचस्प प्रश्न भी अनजाने में उपस्थित किया: जिस समाज में देवी को शक्ति का प्रतीक मानकर पूजा जाता है, वहां वास्तविक स्त्री की स्वतंत्रता और उसके निर्णयों को किस सीमा तक स्वीकार किया जाता है? देवदास इस प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती, लेकिन पारो और चंद्रमुखी की उपस्थिति के माध्यम से उसकी संभावना अवश्य खोलती है.प्रदीप सरकार की "परिणीता" दुर्गा पूजा को प्रेम, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक संबंधों के तनाव से जोड़ती है. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में विद्या बालन, सैफ अली खान और संजय दत्त प्रमुख भूमिकाओं में हैं. यहां बंगाली सांस्कृतिक परिवेश केवल विजुअल सौंदर्य का आधार नहीं, बल्कि पात्रों की सामाजिक स्थिति और भावनात्मक संबंधों को समझने का माध्यम है. ललिता और शेखर का प्रेम आत्मीयता से शुरू होता है, लेकिन संपत्ति, पारिवारिक प्रतिष्ठा और सामाजिक असमानता उसके रास्ते में लगातार बाधाएं पैदा करते हैं.
दुर्गा पूजा का सामूहिक वातावरण इस प्रेम को सार्वजनिक जीवन के बीच ले आता है. घरों के भीतर पनपने वाली भावनाएं उत्सव के दौरान सामाजिक निगाहों के सामने आ जाती हैं. शेखर का अधिकार बोध, उसकी असुरक्षा और ललिता के जीवन में गिरिन की उपस्थिति से पैदा होने वाला तनाव पूजा के सामाजिक परिवेश में अधिक स्पष्ट होता है. इस तरह उत्सव कथा में एक ऐसे सार्वजनिक रंगमंच की भूमिका निभाता है, जहां पात्रों के व्यवहार से उनके संबंधों की वास्तविक स्थिति सामने आती है."परिणीता' में वर्गीय अंतर विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है. शेखर का परिवार आर्थिक रूप से संपन्न है, जबकि ललिता की स्थिति अपेक्षाकृत असुरक्षित है. उनके बीच का प्रेम इस असमानता से मुक्त नहीं हो पाता. दुर्गा पूजा की सामूहिकता के बावजूद वास्तविक समाज में संपत्ति और प्रतिष्ठा के अंतर बने रहते हैं. देवी की प्रतिमा के सामने लोग श्रद्धा में एकत्र होते हैं, लेकिन जीवन के निर्णयों में सामाजिक हैसियत निर्णायक बनी रहती है. फिल्म इसी विरोधाभास को अपनी प्रेमकथा के भीतर स्थान देती है.शरतचंद्र के साहित्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह व्यक्तिगत इच्छा और सामाजिक मर्यादा के संघर्ष को भावनात्मक संबंधों के माध्यम से सामने लाता है. यह कहा जा सकता है कि "परिणीता" का सिनेमाई रूपांतरण इस संघर्ष को विजुअल विस्तार देता है. यहां दुर्गा पूजा प्रेम के लिए कोई सरल या निष्कंटक अवसर नहीं बनती. उत्सव के भीतर भी पात्रों के बीच अधिकार, संदेह और प्रतिष्ठा के प्रश्न मौजूद रहते हैं. इसीलिए फिल्म में पूजा का अर्थ केवल उल्लास नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब भी है, जिसके भीतर प्रेम को अपनी जगह बनानी पड़ती है.जहां "परिणीता' दुर्गा पूजा को सामाजिक संबंधों की जटिलता से जोड़ती है, वहीं शक्ति सामंत की "अमर प्रेम" में इसका भावनात्मक अर्थ घर-वापसी, वात्सल्य और मानवीय स्वीकार्यता से जुड़ता है. राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और विनोद मेहरा अभिनीत यह फिल्म पुष्पा और नंदू के बीच विकसित होने वाले आत्मीय संबंध की कहानी है. पुष्पा का जीवन सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित है और उसे उसकी मानवीय संवेदना के बजाय उसकी सामाजिक स्थिति के आधार पर आंका जाता है. नंदू के साथ उसका रिश्ता उसे ऐसी आत्मीयता देता है, जिसमें प्रेम और ममता पारंपरिक संबंधों की सीमाओं से आगे बढ़ जाते हैं.फिल्म के अंतिम हिस्से में दुर्गा पूजा से संबंधित दृश्य इस संबंध को सांस्कृतिक अर्थ प्रदान करते हैं. देवी के आगमन की बंगाली कल्पना में मायके लौटती बेटी की स्मृति शामिल है. यह धार्मिक परंपरा को पारिवारिक भावनाओं से जोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण रूपक है. पुष्पा के संदर्भ में घर-वापसी का अर्थ केवल किसी स्थान पर पहुंचना नहीं, बल्कि उस सम्मान और अपनत्व की संभावना है, जिससे उसका जीवन वंचित रहा है. देवी के आगमन का सांस्कृतिक प्रतीक उसके अनुभव को एक व्यापक मानवीय अर्थ देता है.
"अमर प्रेम" का महत्त्व इस बात में है कि वह प्रेम को सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक पहचान की सीमाओं से आगे ले जाती है. पुष्पा और नंदू का संबंध किसी औपचारिक परिभाषा में पूरी तरह नहीं समाता, लेकिन उसमें ममता और करुणा की गहरी अनुभूति है. देवी दुर्गा के मातृरूप की सांस्कृतिक स्मृति इस संबंध को और अर्थपूर्ण बनाती है. यहां पूजा की भव्यता से अधिक महत्त्व उस भावनात्मक संसार का है, जिसमें मनुष्य को उसकी सामाजिक स्थिति से परे जाकर स्वीकार करने की संभावना मौजूद है.
इन तीन फिल्मों को साथ रखकर देखने पर दुर्गा पूजा के अलग-अलग सिनेमाई अर्थ सामने आते हैं. "देवदास" में वह विजुअल भव्यता और स्त्री-पात्रों की उपस्थिति से जुड़ती है, "परिणीता' में प्रेम तथा सामाजिक असमानता के संघर्ष को सामने लाती है और "अमर प्रेम" में आत्मीयता तथा घर-वापसी का प्रतीक बनती है. तीनों फिल्मों में उत्सव पात्रों के निजी जीवन को व्यापक सांस्कृतिक अर्थ देता है, लेकिन उसका उपयोग हर बार कथा की जरूरत के अनुसार बदल जाता है. यही किसी जीवंत सांस्कृतिक प्रतीक की विशेषता है कि वह एक ही अर्थ में स्थिर नहीं रहता.
सुजॉय घोष की "कहानी 'दुर्गा पूजा के सिनेमाई उपयोग को एक अलग और अधिक जटिल स्तर पर ले जाती है. विद्या बालन अभिनीत यह रहस्य प्रधान फिल्म कोलकाता को केवल घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं बनाती, बल्कि शहर की संस्कृति, भूगोल और सार्वजनिक जीवन को कथा की सक्रिय शक्ति में बदल देती है. दुर्गा पूजा के समय का कोलकाता फिल्म के रहस्य, तनाव और निर्णायक घटनाक्रम के लिए विशिष्ट वातावरण तैयार करता है. यहां उत्सव की भीड़ और नायिका की निजी बेचैनी के बीच एक ऐसा विरोधाभास बनता है, जो फिल्म के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को गहरा करता है.
फिल्म की नायिका विद्या बागची अपने लापता पति की तलाश में कोलकाता आती है. गर्भवती दिखाई देने वाली विद्या सरकारी कार्यालयों, पुलिस और विभिन्न व्यक्तियों के बीच अपने पति के बारे में जानकारी जुटाती है. उसकी खोज धीरे-धीरे एक रहस्यमय जांच में बदल जाती है. दूसरी ओर, शहर दुर्गा पूजा की तैयारियों में व्यस्त है. सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है, प्रतिमाएं तैयार हो रही हैं, पंडाल सज रहे हैं और सार्वजनिक जीवन उत्सव की लय में चल रहा है. इस सामूहिक उल्लास के बीच विद्या का अकेलापन और बेचैनी फिल्म को एक अलग भावभूमि प्रदान करते हैं.
"कहानी" की सफलता का एक कारण यह है कि कोलकाता को किसी पर्यटन स्थल की तरह नहीं दिखाया गया. पुराने मकान, संकरी गलियां, सरकारी कार्यालय, सार्वजनिक परिवहन और बाजार शहर की वास्तविक बनावट का हिस्सा बनकर सामने आते हैं. दुर्गा पूजा इस शहरी जीवन की स्वाभाविक लय है. उत्सव की भीड़ किसी व्यक्ति को छिपने का अवसर देती है, लेकिन उसी भीड़ में किसी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखना भी कठिन बना सकती है. इस तरह सार्वजनिक स्थान की भीड़ और अव्यवस्था रहस्य कथा की संरचना में उपयोगी हो जाती है.फिल्म के अंतिम हिस्से में दुर्गा पूजा का महत्त्व निर्णायक रूप ग्रहण करता है. विद्या अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ऐसी स्ट्रेटजी अपनाती है, जिसमें वह घटनाओं के केंद्र में आकर अपने प्रतिद्वंद्वी को सामने आने के लिए बाध्य करती है. दर्शक ने अब तक जिस स्त्री को भयभीत, असहाय और परिस्थितियों से घिरा हुआ देखा है, उसके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष धीरे-धीरे उजागर होता है. उसकी दिखाई देने वाली विवशता के पीछे एक सुनियोजित उद्देश्य छिपा है. इस खुलासे के साथ फिल्म की नायिका केवल रहस्य की खोज करने वाली स्त्री नहीं रहती, बल्कि स्वयं घटनाओं की दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति बन जाती है.
दुर्गा पूजा का सांस्कृतिक प्रतीक इस परिवर्तन को अतिरिक्त अर्थ देता है. देवी दुर्गा की कथा शक्ति, साहस और अन्याय के प्रतिरोध से जुड़ी है. विद्या का चरित्र पौराणिक कथा का प्रत्यक्ष रूपांतरण नहीं है, लेकिन उसके भीतर उसी सांस्कृतिक कल्पना की प्रतिध्वनि सुनाई देती है, जिसमें संकट के समय शक्ति प्रकट होती है. फिल्म का अंतिम घटनाक्रम जब अपने निष्कर्ष की ओर बढ़ता है, तब उत्सव की भीड़, प्रतिमाओं का संसार और देवी की सांस्कृतिक स्मृति कथानक के साथ जुड़कर एक प्रभावशाली दृश्यात्मक अर्थ निर्मित करते हैं. यहांं दुर्गा पूजा का उपयोग केवल प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक भी है. उत्सव फिल्म के समय और स्थान को निर्धारित करता है, सार्वजनिक गतिविधियों की प्रकृति बदलता है और नायिका की रणनीति के लिए परिस्थितियां तैयार करता है. यही कारण है कि कहानी में पूजा के दृश्य किसी सामान्य शहरी पृष्ठभूमि की तरह हटाए नहीं जा सकते. वे कथा की विश्वसनीयता और उसके निर्णायक मोड़, दोनों से जुड़े हैं. फिल्म यह भी दिखाती है कि क्षेत्रीय संस्कृति का प्रभावी चित्रण केवल स्थानीय वेशभूषा या भाषा के प्रयोग से नहीं होता; उसके लिए उस समाज की लय को समझना आवश्यक है, जिसमें कहानी घटित होती है. फिर भी विद्या की शक्ति को देवी के प्रतीक से जोड़ते समय एक आलोचनात्मक प्रश्न उठता है. लोकप्रिय सिनेमा अक्सर स्त्री की असाधारण क्षमता को तभी स्वीकार करता है, जब वह किसी असाधारण संकट का सामना कर रही हो. सामान्य जीवन में स्त्री की स्वतंत्रता, आर्थिक अधिकार और निर्णय लेने की क्षमता को स्वीकार करना कहीं अधिक कठिन बना रहता है. कहानी इस विरोधाभास का विस्तृत सामाजिक विश्लेषण नहीं करती, लेकिन उसका केंद्रीय चरित्र दर्शक को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि स्त्री की शक्ति को पहचानने के लिए उसे असाधारण परिस्थितियों से गुजरना क्यों पड़ता है. दुर्गा पूजा के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है. देवी को शक्ति का प्रतीक मानने वाली संस्कृति में वास्तविक स्त्री की सामाजिक स्थिति पर विचार करना आवश्यक है. धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच की दूरी भारतीय समाज की उन जटिलताओं में शामिल है, जिन्हें केवल उत्सव की भव्य छवियों से नहीं समझा जा सकता. कहानी की उपलब्धि यह है कि वह एक रहस्य प्रधान मनोरंजक फिल्म के भीतर स्त्री के साहस और प्रतिरोध को दुर्गा पूजा के सांस्कृतिक वातावरण से जोड़ देती है. उसकी सीमा यह है कि यह संबंध व्यापक सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न तक पूरी तरह नहीं पहुंचता.
बंगाल की पृष्ठभूमि में बनी विक्रमादित्य मोटवने की "लुटेरा" भी इस सांस्कृतिक चर्चा के लिए उपयोगी संदर्भ है, हालांकि दुर्गा पूजा उसका केंद्रीय विषय नहीं है. रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा अभिनीत यह फिल्म औपनिवेशिक काल के अंतिम वर्षों का संसार रचती है, जिसमें जमींदारी व्यवस्था, कला, प्रेम, धोखा और नैतिक द्वंद्व एक-दूसरे से जुड़े हैं. इसका महत्त्व दुर्गा पूजा के प्रत्यक्ष चित्रण से अधिक उस ऐतिहासिक और सामाजिक परिवेश में है, जिसके भीतर बंगाली सांस्कृतिक जीवन विकसित हुआ. ऐसी फिल्मों को साथ रखकर देखने से स्पष्ट होता है कि क्षेत्रीय संस्कृति का सिनेमाई प्रतिनिधित्व केवल किसी एक त्योहार या परंपरा तक सीमित नहीं होता; वह इतिहास, वर्ग और सामाजिक परिवर्तन से भी निर्मित होता है.
बंगाल में दुर्गा पूजा का इतिहास संपन्न परिवारों की प्रतिष्ठा और सार्वजनिक सामुदायिकता, दोनों से जुड़ा रहा है. बड़ी प्रतिमाएं, विशाल पूजा मंडप और अतिथियों का स्वागत किसी समय सामाजिक हैसियत के प्रदर्शन का माध्यम बन सकते थे. सार्वजनिक पूजा समितियों के विस्तार ने इस परंपरा को अधिक व्यापक सामाजिक भागीदारी प्रदान की. धीरे-धीरे पूजा निजी धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर सार्वजनिक संस्कृति का उत्सव बन गया जिसमें विभिन्न वर्गों के लोग भाग लेने लगे. यह परिवर्तन केवल धार्मिक परंपरा का विस्तार नहीं था; यह शहरी समाज में सार्वजनिक स्थान, सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक भागीदारी के बदलते स्वरूप का भी संकेत था.इसलिए दुर्गा पूजा को केवल बंगाली अभिजात वर्ग की परंपरा मानना उसके व्यापक सामाजिक आधार को नजरअंदाज करना होगा. आज पूजा के आयोजन में मूर्तिकार, कारीगर, सज्जाकार, संगीतकार, लाइट और साउंड कॉन्ट्रैक्टर, छोटे व्यापारी, स्वयंसेवक और सामान्य नागरिकों की भूमिका होती है. प्रतिमा निर्माण से लेकर मंडप की सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विसर्जन तक असंख्य लोगों का श्रम इस उत्सव को संभव बनाता है. इसकी भव्यता के पीछे एक व्यापक आर्थिक और सामाजिक संसार सक्रिय रहता है, जो अक्सर फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाई देने वाली चमक के पीछे छिप जाता है.यहीं हिंदी सिनेमा की एक सीमा सामने आती है. कैमरा अक्सर सजी हुई प्रतिमा, आकर्षक मंडप और उत्सव की भीड़ पर ठहरता है, लेकिन उस सौंदर्य को आकार देने वाले हाथों तक कम पहुंचता है. कोलकाता के कुम्हार टोली जैसे क्षेत्रों में प्रतिमा निर्माण केवल धार्मिक आवश्यकता पूरी करने वाला व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही शिल्प परंपरा है. मिट्टी जुटाने, प्रतिमा गढ़ने, रंग भरने और उसे अंतिम रूप देने में कलाकारों की क्रिएटिविटी के साथ उनका आर्थिक जीवन भी जुड़ा है. यदि हिंदी सिनेमा इन कारीगरों और उनके परिवारों की कहानियों को केंद्र में रखे, तो दुर्गा पूजा का एक ऐसा संसार सामने आ सकता है, जो भव्यता के पीछे छिपे श्रम और संघर्ष को दृश्यता प्रदान करे.पूजा की अर्थव्यवस्था भी इसी व्यापक सामाजिक संरचना का हिस्सा है. वस्त्र, आभूषण, भोजन, सजावट, प्रकाश व्यवस्था, परिवहन और मनोरंजन से जुड़े अनेक व्यवसाय इस अवधि में विशेष रूप से सक्रिय होते हैं. छोटे दुकानदारों और अस्थायी कामगारों के लिए यह समय अतिरिक्त आय का अवसर बन सकता है. लेकिन इस आर्थिक गतिविधि के लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचते. आयोजन का खर्च कौन उठाता है, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा किसे मिलती है और पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों को कितना लाभ मिलता है जैसे प्रश्न उत्सव के सामाजिक स्वरूप को समझने के लिए आवश्यक हैं. हिंदी फिल्मों में इन पहलुओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है. दुर्गा पूजा का संगीत भी उसकी सिनेमाई पहचान का महत्त्वपूर्ण आधार है. ढाक की लय, शंखध्वनि, चंडी पाठ, धुनुची डांस और सामूहिक गायन बंगाली सांस्कृतिक स्मृति के अभिन्न अंग हैं. फिल्मों में इन ध्वनियों का प्रयोग केवल वातावरण बनाने के लिए नहीं होता; वे दृश्य को विशिष्ट भावनात्मक पहचान भी प्रदान करती हैं. "देवदास" में संगीत और नृत्य उत्सव को भव्य विजुअल अनुभव में बदल देते हैं, जबकि कहानी में पूजा का वातावरण रहस्य और तनाव को गहरा करता है. एक ही सांस्कृतिक प्रतीक का यह अलग-अलग उपयोग बताता है कि फिल्म की विधा और कथानक के अनुसार त्योहार का अर्थ बदल सकता है.
दुर्गा पूजा के आधुनिक स्वरूप में कला और सार्वजनिक प्रदर्शन की भूमिका भी लगातार बढ़ी है. आज अनेक पूजा मंडप अपनी स्थापत्य कल्पना, कलात्मक प्रयोगों और सामाजिक संदेशों के लिए पहचाने जाते हैं. कहीं लोककला का पुनर्निर्माण होता है, कहीं ऐतिहासिक स्मृतियों को जगह मिलती है और कहीं पर्यावरण, विस्थापन या सामाजिक असमानता जैसे प्रश्नों को कलात्मक रूप दिया जाता है. इस बदलाव से स्पष्ट है कि दुर्गा पूजा कोई स्थिर परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ नए अर्थ ग्रहण करने वाली जीवंत सांस्कृतिक प्रक्रिया है.
यही परिवर्तन सिनेमा के लिए नई संभावनाएं खोलता है. पूजा मंडप को केवल भव्य दृश्य के रूप में दिखाने के बजाय फिल्मकार उसके निर्माण, आयोजन और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कहानियां तलाश सकते हैं. उत्सव के भीतर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय राजनीति, आर्थिक असमानता, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक स्थानों पर अधिकार के प्रश्न भी मौजूद रहते हैं. किसी एक पूजा मंडप के निर्माण से लेकर विसर्जन तक की यात्रा में कलाकारों, आयोजकों और स्थानीय समुदायों की अनेक आकांक्षाएं जुड़ी होती हैं. इन अनुभवों को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म दुर्गा पूजा को केवल सांस्कृतिक सजावट के बजाय समाज के जीवंत दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत कर सकती है.
करण जौहर की "रॉकी और रानी की प्रेम कहानी" में दुर्गा पूजा का चित्रण इस परंपरा को समकालीन पारिवारिक संदर्भ प्रदान करता है. रणवीर सिंह और आलिया भट्ट अभिनीत यह फिल्म प्रेम, पारिवारिक रूढ़ियों, पीढ़ियों के संघर्ष और सांस्कृतिक विविधता के प्रश्नों को केंद्र में रखती है. पंजाबी और बंगाली परिवारों के बीच जीवनशैली, भाषा, खानपान और सामाजिक व्यवहार का अंतर कथानक को आगे बढ़ाता है. इस परिवेश में दुर्गा पूजा बंगाली परिवार की सांस्कृतिक पहचान का दृश्यात्मक परिचय भर नहीं है, बल्कि पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक स्वीकार्यता को समझने का अवसर भी बनती है. इस फिल्म में उत्सव के माध्यम से परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश दिखाई देती है. सांस्कृतिक भिन्नताएं केवल खानपान या पहनावे तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि परिवार के भीतर मौजूद मूल्यों और अपेक्षाओं को भी प्रभावित करती हैं. दुर्गा पूजा का सामूहिक वातावरण इन भिन्नताओं को सार्वजनिक रूप देता है. हालांकि फिल्म का उद्देश्य बंगाली समाज का समाजशास्त्रीय अध्ययन करना नहीं है, फिर भी यह दिखाती है कि किसी समुदाय का उत्सव उसकी पहचान, स्मृति और पारिवारिक जीवन से कितना गहराई से जुड़ा हो सकता है."रॉकी और रानी की प्रेम कहानी" की तुलना "देवदास" से करने पर दुर्गा पूजा के बदलते सिनेमाई अर्थ स्पष्ट होते हैं. "देवदास" में उत्सव की भव्यता के भीतर त्रासद प्रेम और भावनात्मक विघटन की छाया है, जबकि करण जौहर की फिल्म में सांस्कृतिक भिन्नताओं के बीच संवाद और स्वीकार्यता की संभावना अधिक महत्त्वपूर्ण है. दोनों फिल्मों में संगीत, नृत्य और रंग उत्सव को आकर्षक बनाते हैं, लेकिन कथा के हिसाब से उनकी भूमिकाएं अलग हैं. इससे स्पष्ट होता है कि दुर्गा पूजा का सिनेमाई अर्थ किसी स्थिर सांस्कृतिक प्रतीक से निर्धारित नहीं होता; वह फिल्म के सामाजिक दृष्टिकोण और पात्रों के अनुभवों के अनुसार बदलता रहता है.दुर्गा पूजा की चर्चा में बांग्ला सिनेमा को केवल संदर्भ सामग्री की तरह देखना भी उचित नहीं होगा. सत्यजित राय की "पाथेर पांचाली" में ग्रामीण जीवन और सांस्कृतिक परिवेश की अनुभूति, ऋतुपर्ण घोष की "उत्सव" में परिवार के भीतर छिपे तनाव और जय बाबा फेलुनाथ में धार्मिक वातावरण के साथ रहस्य का संबंध इस बात की याद दिलाते हैं कि क्षेत्रीय संस्कृति को उसकी आंतरिक जटिलताओं के साथ समझना आवश्यक है. ये बांग्ला फिल्में हैं, हिंदी फिल्में नहीं; फिर भी इनके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि किसी उत्सव को जीवन की स्वाभाविक लय में शामिल करने से सिनेमा की संवेदनात्मक गहराई कैसे बढ़ती है. ऋतुपर्ण घोष की "उत्सव" विशेष रूप से इसलिए उल्लेखनीय है कि वह दुर्गा पूजा को पारिवारिक जीवन के एक ऐसे अवसर के रूप में देखती है, जब वर्षों से दबे हुए तनाव और शिकायतें सामने आने लगती हैं. परिवार के सदस्य एक ही घर में एकत्र होते हैं, लेकिन उनके अनुभव, इच्छाएं और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं. बाहर पूजा का उल्लास है, जबकि भीतर आर्थिक संकट, संबंधों की उलझन और पीढ़ियों के बीच मतभेद मौजूद हैं. इस विरोधाभास में एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सच्चाई छिपी है: सामूहिक उत्सव लोगों को एक स्थान पर ला सकता है, लेकिन उनके बीच की असमानताओं और मतभेदों को अपने आप समाप्त नहीं कर सकता.यही बात हिंदी फिल्मों के संदर्भ में भी लागू होती है. "परिणीता"में पूजा के सामाजिक वातावरण के भीतर प्रेम और प्रतिष्ठा का संघर्ष दिखाई देता है. "अमर प्रेम" में घर-वापसी और मानवीय स्वीकार्यता का भाव अधिक महत्त्वपूर्ण है." कहानी" और "उत्सव" में भीड़ और सांस्कृतिक वातावरण रहस्य कथा के निर्णायक घटनाक्रम से जुड़ते हैं. इन उदाहरणों में दुर्गा पूजा की भूमिका अलग-अलग है, लेकिन प्रत्येक फिल्म में वह पात्रों के निजी जीवन को किसी व्यापक सामाजिक अनुभव से जोड़ती है.
दुर्गा पूजा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी प्रवासी पहचान है. बंगाल से बाहर रहने वाले परिवारों के लिए यह त्योहार अपनी भाषा, भोजन, संगीत और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर बनता है. दिल्ली के चितरंजन पार्क और मुंबई के शिवाजी पार्क,लोखंड वाला, पवई, सांताक्रुज, कांदीवली और नवी मुंबई सहित देश के अनेक महानगरों में आयोजित सार्वजनिक पूजाएं इस सांस्कृतिक निरंतरता की मिसाल हैं. यहां उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि समुदाय के पुनर्मिलन और अगली पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का माध्यम भी बन जाता है.
प्रवासी परिवारों के लिए दुर्गा पूजा कभी-कभी बचपन की स्मृतियों को फिर से जीने का अवसर होती है. परिचित गीत सुनना, पारंपरिक भोजन करना और अपनी भाषा में बातचीत करना उन्हें अपने मूल स्थान से जोड़ सकता है. दूसरी ओर, महानगरों में पली-बढ़ी नई पीढ़ी के लिए यही उत्सव अपनी सांस्कृतिक पहचान को नए ढंग से समझने का अवसर बनता है. इस अनुभव में स्मृति और आधुनिकता के बीच एक निरंतर संवाद चलता रहता है. हिंदी सिनेमा यदि इस पक्ष को गंभीरता से तलाशे, तो दुर्गा पूजा के माध्यम से प्रवास, पहचान और पीढ़ियों के बदलते संबंधों की अनेक कहानियां सामने आ सकती हैं.दुर्गा पूजा के आधुनिक स्वरूप में बाजार और सार्वजनिक प्रदर्शन की भूमिका भी बढ़ी है. वस्त्र, आभूषण, भोजन, सजावट और मनोरंजन से जुड़े व्यवसाय इस अवधि में विशेष रूप से सक्रिय होते हैं. सामाजिक माध्यमों और डिजिटल तस्वीरों ने उत्सव के अनुभव को साझा करने का नया रूप दिया है. अब पूजा में भाग लेना केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होना, कलात्मक मंडप देखना और अनुभवों को सार्वजनिक रूप से साझा करना भी है. इस परिवर्तन को केवल परंपरा के क्षरण के रूप में देखना उचित नहीं होगा, क्योंकि सांस्कृतिक उत्सव हमेशा अपने समय के साथ बदलते रहे हैं. फिर भी यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि बाजार और प्रदर्शन की बढ़ती भूमिका के बीच सामुदायिक सहभागिता और धार्मिक अनुभव का स्थान किस तरह बदल रहा है.
हिंदी सिनेमा में त्योहारों के चित्रण की सामान्य प्रवृत्ति रही है कि उनकी विजुअल भव्यता को अधिक महत्त्व दिया जाए. दुर्गा पूजा भी इससे अछूती नहीं है. विशाल प्रतिमाएं, आकर्षक परिधान, नृत्य और संगीत दर्शकों को सहज रूप से प्रभावित करते हैं, लेकिन उत्सव की सामाजिक वास्तविकता इन दृश्यों से कहीं अधिक व्यापक है. प्रतिमा निर्माण में लगे कलाकारों का श्रम, आयोजन की आर्थिक संरचना, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सामाजिक असमानताओं के प्रश्न भी इस सांस्कृतिक संसार के अंग हैं. यदि फिल्मकार इन पहलुओं को कथानक का हिस्सा बनाते हैं, तो दुर्गा पूजा का चित्रण अधिक विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक हो सकता है.दुर्गा पूजा का सबसे गहरा सांस्कृतिक अर्थ शायद उसके आगमन और विदाई के बीच छिपा है. देवी का आगमन आनंद और आशा का प्रतीक है, लेकिन विसर्जन यह भी याद दिलाता है कि उत्सव का उल्लास अस्थायी है. कुछ दिनों तक शहर का जीवन बदल जाता है. घरों में मेहमान आते हैं, सार्वजनिक स्थान सामूहिक उत्सव के केंद्र बनते हैं और लोग अपने रोजमर्रा के जीवन से कुछ समय के लिए बाहर निकलते हैं. फिर प्रतिमा का विसर्जन होता है और जीवन अपनी सामान्य गति में लौटने लगता है. लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद भी उसकी स्मृति बनी रहती है और अगले वर्ष देवी के आगमन की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है. किसी भी सिनेमा के लिए यह क्रम अपने आप में एक प्रभावशाली रूपक है. किसी पात्र के जीवन में भी संबंध बनते हैं, संघर्ष आते हैं और अंततः किसी निर्णायक परिवर्तन के साथ एक नया अध्याय शुरू होता है. दुर्गा पूजा का विसर्जन विदाई के साथ वापसी की आशा भी लेकर आता है. यही कारण है कि इस उत्सव के दृश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहते, बल्कि स्मृति, विरह और पुनर्मिलन की व्यापक मानवीय अनुभूति से जुड़ जाते हैं. हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा का चित्रण अभी भी कुछ उल्लेखनीय फिल्मों और यादगार दृश्यों के इर्द-गिर्द केंद्रित है. '" ने इसे भव्यता और स्त्री-पात्रों की विजुअल उपस्थिति से जोड़ा. "परिणीता" ने प्रेम, वर्ग और पारिवारिक प्रतिष्ठा के तनावों को उसके माध्यम से उजागर किया. 'अमर प्रेम" ने इसे मानवीय आत्मीयता और घर-वापसी का प्रतीक बनाया. "कहानी" ने दुर्गा पूजा के सांस्कृतिक वातावरण को रहस्य और न्याय की कथा में निर्णायक भूमिका दी, जबकि "रॉकी और रानी की प्रेम कहानी" ने इसे आधुनिक परिवार और सांस्कृतिक संवाद के संदर्भ में प्रस्तुत किया. इन फिल्मों की उपलब्धियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा सूत्र मौजूद है: उत्सव निजी जीवन को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ प्रदान करता है.इसके बावजूद हिंदी सिनेमा ने दुर्गा पूजा के पूरे सामाजिक संसार को अभी पर्याप्त विस्तार से नहीं खोजा है. मूर्तिकारों और कारीगरों का जीवन, पूजा समितियों की आंतरिक राजनीति, प्रवासी समुदायों की स्मृतियां, आर्थिक विषमता, धार्मिक आस्था और आधुनिक उपभोग संस्कृति के बीच का तनाव तथा स्त्री-शक्ति के वास्तविक सामाजिक अर्थ ऐसे विषय हैं, जिन पर अधिक गंभीर फिल्में बन सकती हैं. दुर्गा पूजा के भीतर धार्मिक विश्वास के साथ कला, श्रम, बाजार, परिवार और सार्वजनिक जीवन की अनेक कहानियां मौजूद हैं. इन्हें पहचानना केवल एक त्योहार का चित्रण करना नहीं, बल्कि भारतीय समाज के बदलते स्वरूप को समझना भी होगा.
हिंदी फिल्मों में दुर्गा पूजा का महत्त्व देवी की प्रतिमा, उत्सव के परिधानों या लोकप्रिय गीतों तक सीमित नहीं है. वह भारतीय सिनेमा में संस्कृति, स्मृति, प्रेम, स्त्री-शक्ति और सामाजिक संबंधों के बदलते अर्थों को समझने का एक माध्यम है. किसी फिल्म में वह प्रेम की अभिव्यक्ति है, किसी में घर-वापसी की स्मृति, किसी में स्त्री के साहस का प्रतीक और किसी में छिपे हुए सच को उजागर करने वाला सार्वजनिक मंच. उसकी यही बहुलता उसे एक जीवंत सिनेमाई प्रतीक बनाती है.देवी दुर्गा की आराधना शक्ति और न्याय की कल्पना से जुड़ी है. लेकिन इस कल्पना का वास्तविक सामाजिक अर्थ तभी पूरा होता है, जब मनुष्य अपने जीवन में भी अन्याय का प्रतिरोध करे, स्त्री की स्वतंत्रता का सम्मान करे और सामाजिक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करे. सिनेमा की सार्थकता भी इसी में है कि वह त्योहार की चमक के पीछे छिपे जीवन को पहचान सके. जब कैमरा केवल सजी हुई प्रतिमा पर नहीं, बल्कि उसके आसपास खड़े मनुष्यों की आकांक्षाओं, संघर्षों और संबंधों पर भी ठहरता है, तभी उत्सव का सांस्कृतिक अर्थ गहरा होता है.ढाक की गूंज अंततः थम जाती है, पंडाल खाली हो जाते हैं और प्रतिमा का विसर्जन हो जाता है. फिर भी उत्सव की स्मृति बनी रहती है. सिनेमा इस स्मृति को दृश्य, ध्वनि और कथा में सुरक्षित रखता है. "देवदास" की भव्यता, "परिणीता" की भावनात्मक जटिलता, 'अमर प्रेम" की करुणा और "कहानी" का निर्णायक प्रतिरोध इसी स्मृति के अलग-अलग रूप हैं. इनके माध्यम से दुर्गा पूजा एक क्षेत्रीय उत्सव से आगे बढ़कर भारतीय जीवन की व्यापक अनुभूति का हिस्सा बनती है.
यही दुर्गा पूजा और हिंदी सिनेमा का सबसे अर्थपूर्ण संबंध है यानी एक ऐसा संबंध, जिसमें देवी का उत्सव अंततः मनुष्य के भीतर मौजूद शक्ति, करुणा, प्रेम और न्याय की आकांक्षा का उत्सव बन जाता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-


