चुनाव आयोग में अंदरूनी मतभेद उजागर, दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव से की वरिष्ठ अधिकारी की शिकायत

चुनाव आयोग में अंदरूनी मतभेद उजागर, दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव से की वरिष्ठ अधिकारी की शिकायत

प्रेषित समय :15:38:32 PM / Fri, Oct 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर प्रशासनिक फैसलों को लेकर मतभेद सामने आए हैं. सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज पर आपत्ति जताई थी. दोनों ने मामले में उचित कार्रवाई की मांग की थी.

यह विवाद अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे में किए गए बदलाव से जुड़ा है. पत्रों में आरोप लगाया गया कि वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने आयोग के साथ पूर्व चर्चा किए बिना कार्य-वितरण में संशोधन का आदेश जारी किया. हालांकि, उपलब्ध RTI दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं होता कि शिकायतों के बाद कोई जांच हुई या संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई.

काम के बंटवारे में बदलाव पर उठे सवाल

दस्तावेजों के अनुसार, उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु की छुट्टी के दौरान 28 जुलाई को मनीष गर्ग को प्रशासन विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था. इसके बाद गर्ग ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों और महानिदेशकों सहित वरिष्ठ अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी किया.

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि यह बदलाव आयोग से चर्चा किए बिना और उन्हें इसकी जानकारी दिए बिना किया गया. उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि गर्ग ने अपने साथ-साथ अपने समकक्ष या वरिष्ठ अधिकारियों को भी जिम्मेदारियां आवंटित कर दीं.

संधू के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों को पहले ही निर्देश दिए गए थे कि आयोग की पूर्व चर्चा या मंजूरी के बिना इस तरह के प्रशासनिक बदलाव न किए जाएं. उन्होंने अपने पत्र में इस कार्रवाई को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18(1) और 18(2) से जुड़ा मुद्दा बताया और उचित कार्रवाई की मांग की.

विवेक जोशी ने भी दर्ज कराई आपत्ति

चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी कैबिनेट सचिव को लिखे अपने अलग पत्र में कार्य-वितरण के आदेश पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि संशोधित आदेश जारी करने से पहले न तो आयोग से चर्चा की गई और न ही उन्हें इसकी सूचना दी गई.

जोशी ने यह भी उल्लेख किया कि जब उन्होंने प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगी, तो उन्हें फाइल उपलब्ध नहीं कराई गई. उन्होंने भी आयोग की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे फैसले लेने पर आपत्ति जताई और संबंधित कानून के प्रावधानों का हवाला दिया.

दोनों आयुक्तों की ओर से सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र भेजे जाने से यह मामला चर्चा में आया. यह घटनाक्रम आयोग के प्रशासनिक कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच सामने आया है.

कैबिनेट सचिवालय ने क्या रुख अपनाया?

RTI के तहत सामने आई फाइल नोटिंग के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने पत्रों को गंभीरता से लिया, लेकिन साथ ही संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप को लेकर सावधानी बरतने की बात कही.

नोट में उल्लेख किया गया कि दोनों पत्र चुनाव आयुक्तों ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत में भेजे थे. इन्हें पूरे निर्वाचन आयोग की ओर से भेजा गया औपचारिक संदेश नहीं माना जा सकता. ऐसे में आयोग की ओर से सामूहिक रूप से कोई आधिकारिक संवाद आने से पहले हस्तक्षेप करना अनुचित हो सकता है.

फाइल में सुझाव दिया गया कि दोनों पत्रों को स्वीकार कर उनकी प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के संबंधित अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रधान निजी सचिव को भेजी जाएं. साथ ही, मामले को रिकॉर्ड पर रखने का सुझाव भी दिया गया.

5 अगस्त को पत्र मिलने की पुष्टि हुई

दस्तावेजों के मुताबिक, कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन ने 5 अगस्त 2026 को दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों की प्राप्ति स्वीकार की. संधू को भेजे गए जवाब में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज से संबंधित पत्र मिलने की पुष्टि की गई. जोशी को भी इसी तरह का जवाब भेजा गया.

हालांकि, कैबिनेट सचिवालय की ओर से पत्रों की प्राप्ति स्वीकार किए जाने से यह साबित नहीं होता कि आरोपों की जांच शुरू हुई या कोई अनुशासनात्मक कदम उठाया गया. RTI के जवाब में आगे की कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं की गई.

RTI आवेदन से सामने आए दस्तावेज

यह जानकारी सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा की ओर से 24 सितंबर को दायर RTI आवेदन के जवाब में सामने आई. आवेदन में चुनाव आयुक्तों के बीच हुए पत्राचार, कैबिनेट सचिवालय की कार्रवाई और संबंधित फाइल नोटिंग की प्रतियां मांगी गई थीं.

निर्धारित शुल्क जमा होने के बाद कैबिनेट सचिवालय ने 14 पन्नों के दस्तावेज उपलब्ध कराए. इनमें दोनों आयुक्तों के पत्र, पत्रों की प्राप्ति से जुड़े जवाब और मामले पर की गई आंतरिक टिप्पणियां शामिल थीं.

मतदाता सूची को लेकर पहले भी उठे थे सवाल

इस घटनाक्रम से पहले भी निर्वाचन आयोग के भीतर मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर असहमति की खबरें सामने आई थीं. द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीनों में 14 बार आधिकारिक रूप से कुछ कदमों पर आपत्ति जताई थी. इन मुद्दों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा मतदाता डेटाबेस की विश्वसनीयता से जुड़ी चिंताएं शामिल थीं.

हालांकि, वर्तमान RTI खुलासा मुख्य रूप से प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बंटवारे और उससे जुड़े पत्राचार पर केंद्रित है. दोनों घटनाक्रमों को एक ही विवाद मानने के बजाय उनके अलग-अलग संदर्भों में समझना जरूरी है.

फिलहाल स्थिति यह है कि दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतें और कैबिनेट सचिवालय की आंतरिक टिप्पणियां सार्वजनिक दस्तावेजों के जरिए सामने आई हैं. लेकिन वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ आरोपों पर जांच या अंतिम कार्रवाई का विवरण उपलब्ध नहीं है. आगे की स्थिति संबंधित अधिकारियों या निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी सामने आने पर स्पष्ट हो सकेगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-