ग्वालियर . पैतृक संपत्ति में बेटों के अधिकार को लेकर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है. अदालत ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत बेटे को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही हिस्सा मिलने का अधिकार नहीं होता. पिता के जीवित रहते बेटा केवल जन्म के आधार पर संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकता. पिता की मृत्यु के बाद ही उत्तराधिकार के कानूनी प्रावधानों के अनुसार संपत्ति में उसका अधिकार निर्धारित होता है. न्यायमूर्ति आशीष श्रोती की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए संपत्ति विवाद से जुड़ी अपील खारिज कर दी. अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद धारा 8 के तहत उत्तराधिकार की व्यवस्था में जन्मसिद्ध अधिकार की पारंपरिक अवधारणा लागू नहीं होती. इस फैसले को उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें पिता के जीवित रहते बेटे पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगते हैं.
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद धारा 8 के तहत संपत्ति के उत्तराधिकार में जन्मसिद्ध अधिकार का सिद्धांत लागू नहीं होता. बेटे को पिता की संपत्ति में हिस्सा पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार प्राप्त होता है.
न्यायमूर्ति आशीष श्रोती ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल बेटे के रूप में जन्म लेने से किसी व्यक्ति को पिता की संपत्ति में तत्काल हिस्सेदारी का अधिकार नहीं मिल जाता. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिनियम लागू होने से पहले जन्मे सह-उत्तराधिकारियों से संबंधित कुछ परिस्थितियों में धारा 6 के प्रावधान लागू हो सकते हैं. ऐसे मामलों में संपत्ति के अधिकार का निर्धारण संबंधित कानूनी परिस्थितियों और उत्तराधिकार के नियमों के आधार पर किया जाएगा.
पिता के जीवित रहते संपत्ति में हिस्सा मांगकर दायर किया था मुकदमा
यह मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था. अपीलकर्ताओं ने संपत्ति पर मालिकाना हक, कब्जा और स्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था. इस मामले में वादी संख्या एक प्रतिवादी संख्या एक की पत्नी थीं, जबकि वादी संख्या दो और तीन उनके बेटे थे.
विवादित जमीन प्रतिवादी संख्या एक यानी पिता की थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन उनके पिता और उनके भाइयों के नाम पर दर्ज थी तथा यह पैतृक संपत्ति थी. उन्होंने आरोप लगाया कि 21 जुलाई 2010 को पिता ने जमीन बेचने की धमकी दी थी और कहा था कि वह उन्हें संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं देंगे.
इसी आधार पर पत्नी और बेटों ने अदालत में दावा प्रस्तुत करते हुए जमीन पर अपना मालिकाना हक और कब्जा घोषित करने की मांग की थी. साथ ही, उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग की, ताकि पिता विवादित जमीन को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकें.
मुकदमे के दौरान पिता ने बेच दिया जमीन का हिस्सा
मामले की सुनवाई और मुकदमे की प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान पिता ने विवादित जमीन का एक हिस्सा तीसरे पक्ष यानी प्रतिवादी संख्या तीन को बेच दिया. यह बिक्री 20 अप्रैल 2011 को पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से की गई थी.
इसके बाद वादियों ने अपने मूल दावे में संशोधन कराया और जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को भी मुकदमे में पक्षकार बना लिया. उन्होंने अदालत से यह घोषित करने की मांग की कि 20 अप्रैल 2011 को निष्पादित विक्रय विलेख अमान्य और शून्य है.
दूसरी ओर, पिता ने लिखित जवाब दाखिल कर पत्नी और बेटों के दावे का विरोध किया. उनका कहना था कि विवादित जमीन का उनके और भाइयों के बीच पहले ही बंटवारा हो चुका था. पिता ने यह भी तर्क दिया कि उनके जीवित रहते हुए बेटों का इस संपत्ति पर कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं बनता.
बंटवारे में मिली जमीन को माना गया पिता की स्व-अर्जित संपत्ति
हाई कोर्ट के फैसले में संपत्ति के मूल स्वरूप को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया. अदालत ने पाया कि वादियों ने अपने ही दावे के दूसरे पैराग्राफ में स्वीकार किया था कि विवादित जमीन प्रतिवादी संख्या एक को उनके पिता से बंटवारे में प्राप्त हुई थी.
इस स्वीकारोक्ति को महत्वपूर्ण मानते हुए अदालत ने कहा कि बंटवारे के बाद संबंधित संपत्ति पिता के हाथों में उनकी स्व-अर्जित संपत्ति बन गई थी. ऐसे में बेटों को पिता के जीवित रहते उस जमीन में जन्मसिद्ध हिस्सेदारी का दावा करने का अधिकार नहीं था.
पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि जमीन पिता को उनके पिता से मिली थी, उसे वर्तमान कानूनी स्थिति में बेटों की सह-उत्तराधिकार वाली संपत्ति नहीं माना जा सकता. संपत्ति किस प्रकार प्राप्त हुई, उसका बंटवारा कब हुआ और उस पर लागू उत्तराधिकार के प्रावधान क्या हैं, इन सभी तथ्यों का कानूनी महत्व है.
ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपीलीय अदालत ने रखा था बरकरार
इस विवाद में सबसे पहले ट्रायल कोर्ट ने वादियों के दावे को खारिज किया था. अदालत ने चंद्रकांता बनाम अशोक कुमार, 2002 (3) MPLJ 576 के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 ने पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार की पारंपरिक अवधारणा को समाप्त कर दिया है.
ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि वादी संख्या एक यानी पत्नी सह-उत्तराधिकारी (Coparcener) की श्रेणी में नहीं आती हैं. इस मामले में बेटों के दावे पर भी अधिनियम के लागू प्रावधानों के अनुसार विचार किया गया था.
इसके बाद वादियों ने अपीलीय अदालत में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली. अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद अपीलकर्ताओं ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में अपील दायर की.
हाई कोर्ट ने अपील खारिज कर फैसले को सही माना
हाई कोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों, पक्षकारों की दलीलों और निचली अदालतों के फैसलों का परीक्षण किया. पीठ ने पाया कि अपीलकर्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया था कि जमीन पिता को उनके पिता से बंटवारे में मिली थी. इस कारण संपत्ति पिता की स्व-अर्जित संपत्ति के रूप में मानी गई.
अदालत ने कहा कि पिता के जीवित रहते हुए वादी इस जमीन में किसी हिस्से का दावा नहीं कर सकते थे. अपीलीय अदालत का यह निष्कर्ष सही था कि विवादित संपत्ति वादियों की सह-उत्तराधिकार वाली संपत्ति नहीं है. हालांकि, हाई कोर्ट ने इसके पीछे संपत्ति के बंटवारे और उससे उत्पन्न कानूनी स्थिति को भी स्पष्ट किया.
पीठ को अपीलीय अदालत के निर्णय में कोई कानूनी त्रुटि नहीं मिली. इसके बाद हाई कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा.
संपत्ति विवादों में फैसले का कानूनी महत्व
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला उन पारिवारिक संपत्ति विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें बेटे पिता के जीवित रहते केवल जन्म के आधार पर पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगते हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति का उत्तराधिकार निर्धारित करने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों और संपत्ति की वास्तविक कानूनी स्थिति को देखना आवश्यक है.
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार की पैतृक या सह-उत्तराधिकार वाली संपत्ति पर सभी परिस्थितियों में एक जैसा नियम लागू होगा. संपत्ति के अर्जन, बंटवारे, उत्तराधिकार और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर प्रत्येक मामले का निर्णय अलग हो सकता है.
मामले का नाम पीबी विरुद्ध आरएस (PB v RS) है. यह निर्णय स्पष्ट करता है कि पिता से बंटवारे में प्राप्त संपत्ति और सह-उत्तराधिकार वाली संपत्ति के बीच कानूनी अंतर को समझना जरूरी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

