नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने दो से अधिक बच्चे होने पर जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि देश में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच गई है. ऐसे में बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए इन कानूनों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है. अदालत ने चेताया कि बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति के बीच भारत के सामने भविष्य में बुजुर्ग आबादी बढ़ने और कामकाजी लोगों की हिस्सेदारी घटने की चुनौती खड़ी हो सकती है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने के प्रावधान से जुड़े मामले में यह टिप्पणी की. पीठ ने कहा कि वर्ष 2003 में जब सुप्रीम कोर्ट ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दो बच्चों की नीति को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था, तब देश की कुल प्रजनन दर 3 थी. अब यह घटकर 1.9 रह गई है, जबकि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है.
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर सजा या अयोग्यता का प्रावधान बनाने के पीछे बढ़ती आबादी का डर प्रमुख आधार था. लेकिन पिछले कुछ दशकों में प्रजनन दर में आई गिरावट के कारण यह आधार कमजोर हुआ है. उन्होंने कहा कि भारत की आबादी फिलहाल घट नहीं रही है, लेकिन प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे रहने के कारण आने वाले समय में बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात कम हो सकता है.
पीठ ने आगाह किया कि जनसांख्यिकीय बदलावों की अनदेखी करने पर देश को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. अदालत ने इस मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया है.
तीसरे बच्चे के जन्म पर गई थी सरपंच की कुर्सी
यह मामला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले से जुड़ा है. उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के कारण महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य ठहराया गया था. यह प्रावधान 13 सितंबर 2000 से लागू हुआ था. इसके अनुसार, इस तारीख को या इसके बाद दो से अधिक बच्चे होने पर कोई व्यक्ति ग्राम पंचायत का सदस्य या सरपंच नहीं बन सकता और न ही चुनाव लड़ सकता है.
अक्टूबर 2024 में बुलढाणा के अतिरिक्त कलेक्टर ने इंगले को अयोग्य घोषित कर दिया था. उन्होंने इस आदेश को अमरावती संभाग के अतिरिक्त आयुक्त के समक्ष चुनौती दी, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया. हाई कोर्ट ने भी अयोग्यता के फैसले को बरकरार रखा था. इसके खिलाफ इंगले ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.
2003 में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी थी वैधता
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चों वाले व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के अयोग्य थे. उस समय अदालत ने जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य को इस प्रावधान के समर्थन में महत्वपूर्ण आधार माना था. मौजूदा मामले में पीठ ने बदलती प्रजनन दर और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के मद्देनजर ऐसे कानूनों की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार की जरूरत जताई है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-


