जबलपुर. भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देश में अगली पीढ़ी के हल्के बख्तरबंद सैन्य वाहन विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. आर्मर्ड व्हीकल निगम लिमिटेड (एवीएनएल) की इकाई व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (व्हीएफजे) ने स्वदेशी लाइट आर्म्ड मल्टीपरपज व्हीकल (एलएएमवी) विकसित किया है. यह वाहन आधुनिक युद्धक्षेत्र की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. इसकी खासियत है कि यह न केवल तेज गति से दुर्गम रास्तों पर चल सकता है, बल्कि जवानों को गोलियों और बारूदी विस्फोटों से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा सुविधाओं से भी लैस है.
इस परियोजना का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहले भारत को इस तरह के हल्के बख्तरबंद वाहनों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था. अब जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री में इसके विकास और निर्माण से जुड़ी गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं. वाहन के अधिकांश हिस्सों को स्वदेशी तकनीक से तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है. इससे रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय उद्योगों के लिए भी अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
भविष्य के युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन
एलएएमवी को हाई-मोबिलिटी 4x4 आर्मर्ड प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया गया है. इसका उपयोग सैनिकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और शहरी युद्ध जैसी परिस्थितियों में किया जा सकेगा. आधुनिक सैन्य अभियानों में ऐसे वाहनों की जरूरत बढ़ रही है, जो कम समय में कठिन इलाकों तक पहुंच सकें और जवानों को सुरक्षित रखते हुए अभियान में मदद करें.
इस वाहन को सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया गया है. इसमें चालक सहित चार जवानों के बैठने की व्यवस्था है. वाहन में पांच दरवाजे दिए गए हैं, ताकि अभियान के दौरान जवान तेजी से अंदर और बाहर निकल सकें. यह सुविधा विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है, जहां सैनिकों को कम समय में मोर्चा संभालना पड़ता है.
450 बीएचपी इंजन से मिलेगी तेज रफ्तार
एलएएमवी में 450 बीएचपी क्षमता का दमदार इंजन दिया गया है, जिसे ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के साथ जोड़ा गया है. इसकी अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है. वाहन की पेलोड क्षमता 1500 किलोग्राम है, जिससे इसमें सैनिकों के साथ आवश्यक सैन्य उपकरण और अन्य सामग्री ले जाने की सुविधा मिलेगी.
वाहन में आगे और पीछे दोनों तरफ डबल विशबोन इंडिपेंडेंट सस्पेंशन दिया गया है. इसका उद्देश्य ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर वाहन को स्थिरता और बेहतर नियंत्रण प्रदान करना है. इसके अलावा डुअल फेल-सेफ ब्रेकिंग सिस्टम और एंटी लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (एबीएस) भी उपलब्ध कराया गया है. इससे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में वाहन को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.
लेह-लद्दाख में कठिन परिस्थितियों में परीक्षण
वाहन की वास्तविक क्षमता परखने के लिए लेह-लद्दाख के दुर्गम और अत्यंत ठंडे क्षेत्रों में फील्ड ट्रायल किए जा रहे हैं. फैक्ट्री सूत्रों के अनुसार, इन परीक्षणों में वाहन को माइनस तापमान, कम ऑक्सीजन वाली पतली हवा, बर्फीली चढ़ाई और पथरीले रास्तों जैसी चुनौतियों के बीच परखा जा रहा है.
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सैन्य वाहनों के सामने कई तरह की कठिनाइयां होती हैं. अत्यधिक ठंड में इंजन और अन्य तकनीकी प्रणालियों का प्रदर्शन, ऊंचाई पर वाहन की क्षमता और खराब रास्तों पर उसकी गतिशीलता महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में लेह-लद्दाख में परीक्षण का उद्देश्य यह समझना है कि एलएएमवी कठिन परिस्थितियों में सेना की जरूरतों पर कितना खरा उतरता है.
गोलियों और बारूदी विस्फोटों से सुरक्षा
एलएएमवी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसका सुरक्षा कवच शामिल है. वाहन को मॉड्यूलर बैलिस्टिक प्रोटेक्शन और अंडर-हल ब्लास्ट रेजिस्टेंस के साथ विकसित किया गया है. इसका उद्देश्य जवानों को गोलीबारी के साथ-साथ जमीन के नीचे लगाए गए विस्फोटक और आइईडी जैसे खतरों से सुरक्षा प्रदान करना है.
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वाहन लेवल-1 प्रोटेक्शन से लैस होगा और 7.62 एमएम तक की गोलियों को रोकने में सक्षम बताया गया है. युद्धक्षेत्र में सैनिकों की सुरक्षा के लिहाज से यह सुविधा महत्वपूर्ण मानी जा रही है. हालांकि, सुरक्षा क्षमता का वास्तविक आकलन निर्धारित परीक्षणों और प्रमाणन के आधार पर ही किया जाएगा.
हथियार और जरूरी उपकरण रखने की सुविधा
वाहन में सैन्य अभियानों के दौरान जरूरी उपकरण रखने के लिए ऑनबोर्ड स्टोरेज की व्यवस्था की गई है. इसमें रेडियो सेट, गोला-बारूद, रॉकेट लॉन्चर और इंसास राइफल रखने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है.
इस तरह की व्यवस्था का उद्देश्य अभियान के दौरान सैनिकों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना है, ताकि उन्हें बार-बार अतिरिक्त सामग्री लेने के लिए पीछे न लौटना पड़े. ट्रूप ट्रांसपोर्ट और रिकॉनिसेंस मिशन में यह सुविधा उपयोगी साबित हो सकती है.
1969 से रक्षा उत्पादन की विरासत को आगे बढ़ा रही फैक्ट्री
व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी. फैक्ट्री ने शक्तिमान ट्रक और जोंगा जैसे वाहनों से अपनी उत्पादन यात्रा शुरू की थी. इसके बाद वाहन एक टन श्रेणी से लेकर स्टालियन, माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल और बुलेटप्रूफ वाहनों के निर्माण तक इसका दायरा बढ़ा.
एलएएमवी को इसी रक्षा उत्पादन परंपरा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है. स्वदेशी डिजाइन और निर्माण क्षमता के विकास से देश में सैन्य वाहनों के क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूती मिल सकती है.
स्थानीय एमएसएमई को मिलेगा अवसर
एलएएमवी के विकास और निर्माण से स्थानीय उद्योगों को भी लाभ मिलने की संभावना है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके निर्माण में आर्मर वेल्डिंग, प्लाज्मा कटिंग, लेजर कटिंग और गियर बॉक्स जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों पर काम किया जा रहा है. इससे जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए आपूर्ति और तकनीकी सहयोग के अवसर बन सकते हैं.
रक्षा उत्पादन में स्थानीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ने से रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है. साथ ही, आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत की संभावना भी रहेगी.
सेना की निगरानी और त्वरित कार्रवाई क्षमता को मिलेगी मजबूती
एलएएमवी को सेना के ट्रूप ट्रांसपोर्ट, रिकॉनिसेंस और शहरी युद्ध अभियानों के लिए उपयोगी प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया गया है. सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेज आवाजाही, सैनिकों को सुरक्षित तरीके से पहुंचाने और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने जैसे कार्यों में इसकी भूमिका हो सकती है.हालांकि, वाहन की वास्तविक उपयोगिता और सेना में इसकी तैनाती का दायरा परीक्षणों तथा संबंधित मंजूरियों के बाद ही स्पष्ट होगा. फिलहाल लेह-लद्दाख में चल रहे कठिन परीक्षण इसकी क्षमता परखने की दिशा में महत्वपूर्ण चरण हैं. यदि वाहन निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है तो यह भारतीय रक्षा उत्पादन में स्वदेशी तकनीक और जबलपुर की औद्योगिक क्षमता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

