समग्र

भारत रत्न का अटल दर्शन

भारत के गौरवाशाली इतिहास में वर्षो बाद भी अटल दर्शन  की शाश्वतता को कोई नकार नहीं पाएगा यह सही मायनों में भारत रत्न की अटल और अटूट दधिचि भी है. जिस दर्शन  में सामंजस्य रूपी अमृतरस, संस्कृति रक्षा रूपी तत्वबोध और राष्ट्रधर्म से लेकर राजधर्म तक का गूढार्थ ज्ञान एवं हर आय व आयु वर्ग का कालजयी प्रतिनिधित्व करने की कला समाहित हो, वही सही मायने में अटल दर्शन  हैं. इस दर्शन  को अवसरवादिता के झटके से तोडा नहीं जा सकता. पदलिप्सा से उठे तूफान से मोडा नहीं जा सकता. यह क्षण-भंगुर नहीं, जिसके अस्तित्व को समाप्त किया जा सके. उस अटल दर्शन  को यदि सार्वजनिक जीवन में कदम रखने वाले युवाओं एवं भावी पीढी को एकसूत्र में पिरोकर विषयवस्तु के रूप प्रस्तुत नहीं किया गया तो   निश्चित  रूप से पं. अटलबिहारी वाजपेयी जैसे युगपुरूष के योगदान को स्वार्थी तत्वों द्वारा नकारने का प्रयास ही माना जाएगा.
 जननेता, पत्रकार, लेखक और कवि मन भारत रत्न अटलजी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में हुआ. उनके पिता स्व. कृष्णबिहारी वाजपेयी रियासतकालीन व्यवस्था में अध्यापक के पद पर कार्यरत थे. इन्होंने ग्वालियर में एमए. एलएलबी. तक शिक्षा अर्जित की. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में राष्ट्रधर्म का पाठ पढा. संभवतः ग्वालियर की समरसता भरी तत्कालीन परिस्थितियों ने उन्हें उदात्त व्यक्तित्व प्रदान किया था. जिसके कारण वे राष्ट्रवाद की कथित साम्प्रदायिक धारा में बंधे नहीं रह पाए. आज अटलजी शारीरिक अस्वस्थता की वजह से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं हैं. तथापि इनका कुषल सुशासन, नेतृत्व, राजनीतिक दृष्टिता और अमिट देशप्रेम सदा-सर्वदा आसिन रहेंगा. 
यदि हम अटलबिहारी वाजपेयी को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, संस्थापक सदस्य, पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में ही जानते है तो उनके ‘व्यक्तित्व व कृतित्व‘ से अपनी अनभिज्ञता का ही परिचय देते हैं, क्योंकि अटल के व्यक्तित्व में उनके नाम का गूढार्थ निहित हैं. अपने नाम के अनुरूप उन्होंने आजीवन विवाह नहीं करने का अटल निर्णय लिया. उन्होंने संस्कृति के अनुरूप देष सेवा का अटल निर्णय भी लिया. अटल जी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी भी पदलोलुपता की संकीर्ण विचारधारा को हावी नहीं होने दिया. जिसके कारण देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उनके बुद्भि कौशल व राजनैतिक चातुर्य एवं निस्वार्थ देशप्रेम के भाव की सदैव प्रंशसा के साथ ही अपने ही पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की सलाह की अनदेखी कर उन्होंने अटल जी के निष्छल भाव से प्रेरित सुझावों पर अमल भी किया. प्रबल विरोधी होने के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पी व्ही नरसिंहाराव अटल की विदेश नीति से प्रभावित रहे व विपक्ष दल के होते हुए भी उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ की बैठक में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने भेजा. जहां बेबाकी से हिंदी में रखा गया भारतीय पक्ष आज में स्वर्ण अक्षरों में उल्लेखित हैं. 
अटलबिहारी वाजपेयी को भारतीय राजनीति में प्रमुख स्तम्भ के रूप में लगातार सात दशकों से स्थान मिलता रहा हैं. सन् 1953 में कश्मीर आंदोलन में डॉं. मुखर्जी के साथ अटलजी पठानकोट तक गए थे. उसी समय से श्री वाजपेयी जनसंघ और देष के नेता के रूप उभरते चले गए. अगर वैचारिक पक्ष प्रेणता स्व. दीनदयाल उपघ्याय थे तो उजागरकर्ता  अटलजी रहे. डॉं. मुखर्जी की मुत्यु के बाद पं. दीनदयाल उपध्याय एवं अटलजी ने जनसंघ की बागडोर संभाली. 
राजनीति के विद्वान इतिहासकारों व विष्लेषकों के अनुसार सन् 1977 में जनता पार्टी का गठन अटलजी की दूरदृष्टि का ही परिणाम रहा. उसी समय से राजनीति में समन्वय के जो भाव पैदा हुए तो उसका असली रूप सन् 1998 में विभिन्न विचारधारा की पार्टियों के समन्वय से बने राजग के रूप में सामने आया. वही अब स्थायी रूप ले चुकी हैं. चाहे राजग हो या संप्रग, है तो समन्वय की राजनीति का रूप ही. सही मायने में समन्वय की राजनीति के सूत्रधार अटलजी ही हैं. अपनी समन्वयकारी नीति के कारण ही वे गंगा समान पवित्र हृदय, शांत, शालीन व कई बार गहरे जल सदृष्य खामोश नजर आते हैं. अटल की नीति, सुशासन और सेवाभाव को चुनौती देना दषकों तक मुनासिब नहीं हैं. अंततः पोखरण के जनक भारत रत्न, विश्वदूत अटल बिहारी वाजपेयी को जन्म दिन की ढेरों बधाईयां.   

हेमेन्द्र क्षीरसागर के अन्य अभिमत

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