नई दिल्ली. लगातार नई ऊंचाइयों को छूने के बाद सोने की कीमतों में शुक्रवार को तेज गिरावट दर्ज की गई. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर अगस्त डिलीवरी वाला सोना 1,221 रुपये टूटकर 1,58,326 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया. करीब एक प्रतिशत की इस गिरावट ने निवेशकों का ध्यान एक बार फिर बुलियन बाजार की ओर खींच लिया है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ऊंची महंगाई और ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच निवेशकों का रुख बदलता दिखाई दे रहा है.
एमसीएक्स पर सोने की कीमतों में आई इस गिरावट के दौरान 8,346 लॉट का कारोबार दर्ज किया गया. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने पर दबाव देखने को मिला. न्यूयॉर्क के कॉमेक्स एक्सचेंज पर अगस्त डिलीवरी वाला गोल्ड फ्यूचर्स 16.63 डॉलर या 0.37 प्रतिशत गिरकर 4,488.37 डॉलर प्रति औंस पर आ गया.
विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने महंगाई की चिंताओं को बढ़ा दिया है. निवेशकों को आशंका है कि यदि ऊर्जा कीमतों में तेजी बनी रहती है तो दुनिया के कई केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं. यही वजह है कि सोने जैसी परिसंपत्तियों पर दबाव देखने को मिल रहा है.
कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में लगातार बने तनाव के बावजूद डॉलर इंडेक्स मजबूत बना हुआ है. सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग बढ़ने से सोने की कीमतों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है. निवेशकों का बड़ा वर्ग फिलहाल अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंक की नीतियों पर नजर बनाए हुए है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को लेकर भी विरोधाभासी संकेत सामने आ रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, जबकि ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने किसी बड़ी प्रगति से इनकार किया है. इसके साथ ही इजराइल और लेबनान सीमा क्षेत्र में जारी तनाव ने भी बाजार में अनिश्चितता बनाए रखी है.
विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में निवेशकों की सबसे बड़ी नजर अमेरिका की नॉन-फार्म पेरोल रिपोर्ट और फेडरल रिजर्व की आगामी नीति बैठक पर है. यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत संकेत देती है और फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखने का संकेत देता है, तो सोने में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
घरेलू स्तर पर भारतीय रिजर्व बैंक ने भी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है, जो पहले 4.6 प्रतिशत था. बढ़ती ऊर्जा कीमतों और इनपुट कॉस्ट को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है. साथ ही आर्थिक विकास दर के अनुमान में भी कटौती की गई है. ऐसे संकेत बताते हैं कि आने वाले महीनों में आर्थिक चुनौतियां बनी रह सकती हैं.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान गिरावट को घबराकर निवेश से बाहर निकलने के संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. सोना अभी भी दीर्घकालिक निवेश और पोर्टफोलियो विविधीकरण का महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है. हालांकि अल्पकालिक निवेशकों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है क्योंकि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक घटनाक्रमों के आधार पर कीमतों में और उतार-चढ़ाव संभव है.
निवेश सलाहकारों के अनुसार जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि का है, वे चरणबद्ध तरीके से निवेश जारी रख सकते हैं. एकमुश्त निवेश के बजाय सिस्टेमैटिक तरीके से खरीदारी करने से मूल्य में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम किया जा सकता है. वहीं जिन निवेशकों ने हालिया तेजी में ऊंचे स्तर पर खरीदारी की है, उन्हें घबराकर बिकवाली से बचना चाहिए.
विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि कुल निवेश पोर्टफोलियो का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा सोने में रखना संतुलित रणनीति हो सकती है. बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई के जोखिमों को देखते हुए सोना अभी भी सुरक्षित निवेश के रूप में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है.
फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व, वैश्विक ब्याज दरों, डॉलर की मजबूती और पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगी. ऐसे में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय बाजार के संकेतों पर नजर रखते हुए संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की सलाह दी जा रही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

