सुको दिल्ली एसआईआर पर सख्त, पूछा-पहले से वोटर लिस्ट में शामिल लोगों से फार्म-6 क्यों, मांगा जवाब

सुको दिल्ली एसआईआर पर सख्त, पूछा-पहले से वोटर लिस्ट में शामिल लोगों से फार्म-6 क्यों, मांगा जवाब

प्रेषित समय :16:54:26 PM / Wed, Oct 28th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि जिन लोगों ने दिल्ली एसआईआर में गणना फॉर्म नहीं भरे थे, उनसे नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 भरने को क्यों कहा जा रहा है, जबकि वो पहले से ही 2026 की मतदाता सूची में शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस पर दो हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा है. यह सवाल तब उठा है जब लगभग 43 लाख लोगों को स्थान बदलने या अनुपस्थित होने के कारण ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-6 पहली बार वोट देने वालों के लिए है. जो लोग पहले से ही 2026 की मतदाता सूची में शामिल हैं और केवल एक जगह से दूसरी जगह गए हैं, उन्हें फॉर्म-8 का उपयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए. उनसे यह घोषणा करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए कि वो पहले कभी मतदाता सूची में शामिल नहीं थे. कोर्ट ने कहा कि कुछ समय के लिए बाहर रहना, स्थायी रूप से जगह बदलना नहीं है. काम के सिलसिले में एक-दो महीने के लिए बाहर रहने से कोई मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं हो जाता.

सुको ने चुनाव आयोग से पूछा सवाल

जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या कोई मतदाता, जो अपना फॉर्म नहीं भर पाया, वह हमेशा के लिए अपना वोट देने का अधिकार खो देता है? उन्होंने इसे एक ऐसी संरचनात्मक विसंगति बताया, जिसे ठीक करने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती, तब तक केवल इसलिए किसी फॉर्म को खारिज करने का कोई मतलब नहीं है कि उसकी समय-सीमा निकल गई है. चुनाव आयोग ने इस पर कहा कि वह देर से जमा किए गए पंजीकरण फॉर्मों को स्वीकार करने पर विचार करेगा और जरूरत पडऩे पर 30 अक्टूबर की समय-सीमा को भी बढ़ा देगा.

बिहार एसआईआर मामले में नहीं लिया कोई फैसला

दिल्ली एसआईआर मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, बिहार एसआईआर मामले में हमने तार्किक विसंगति के मुद्दे पर कोई फैसला नहीं लिया था और पश्चिम बंगाल में इसे एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति दी गई थी. हमने इस पर कोई फैसला नहीं दिया है, लेकिन लोग बिहार वाले फैसले को दिखाते हैं और कहते हैं कि सब कुछ तय हो चुका है. जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल डिसक्रिपेंसी यानी तार्किक विसंगति श्रेणी को मान्यता नहीं दी है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-