Akka Web Series Review: कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे की दमदार टक्कर, शानदार अभिनय के बावजूद कहानी में रह गई कमी

Akka Web Series Review: कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे की दमदार टक्कर, शानदार अभिनय के बावजूद कहानी में रह गई कमी

प्रेषित समय :18:30:00 PM / Fri, Oct 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई पीरियड क्राइम ड्रामा सीरीज ‘अक्का’ में कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे आमने-सामने हैं. कहानी एक ऐसे काल्पनिक साम्राज्य की है, जहां सदियों से महिलाओं का शासन चलता आ रहा है. सत्ता, विरासत, अपराध और धोखे के बीच दो प्रभावशाली महिलाओं की टक्कर इस सीरीज का मुख्य आकर्षण है.

धर्मराज शेट्टी के निर्देशन में बनी इस सीरीज को यश राज फिल्म्स ने प्रोड्यूस किया है. दमदार कलाकारों और भव्य पीरियड सेटअप के बावजूद सवाल यह है कि क्या ‘अक्का’ अपनी कहानी से दर्शकों को बांध पाती है?

क्या है ‘अक्का’ की कहानी?

सीरीज की कहानी भारत की आजादी के बाद के दौर में बसे काल्पनिक स्थान पेर्नुरू की है. यहां करीब 800 साल पुराने मालेमार साम्राज्य में महिलाओं का शासन है. इस व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान पर बैठने वाली महिला को ‘अक्का’ कहा जाता है और साम्राज्य का उत्तराधिकारी भी महिला ही होती है.

कीर्ति सुरेश ने साम्राज्य की शासक भवानी का किरदार निभाया है. उसकी सत्ता और विरासत को उस समय चुनौती मिलने लगती है, जब मुंबई से रुद्रा (राधिका आप्टे) वहां पहुंचती है. रुद्रा भी खुद को इस विरासत से जुड़ा बताती है और धीरे-धीरे साम्राज्य के लोगों को अपने पक्ष में करने लगती है.

इसके बाद शुरू होती है सत्ता और अधिकारों की लड़ाई. दोनों महिलाओं के बीच टकराव बढ़ता जाता है और विरासत पर कब्जे की कोशिश में धोखे, अपराध और हिंसा का सिलसिला सामने आता है. आखिरकार इस संघर्ष में किसका पलड़ा भारी पड़ता है, इसका जवाब सीरीज देखने पर ही मिलेगा.

अभिनय में कीर्ति और राधिका का दबदबा

‘अक्का’ की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं. भवानी के रूप में कीर्ति सुरेश ने अपने किरदार में गंभीरता और शासकीय रौब दिखाया है. वहीं रुद्रा के रूप में राधिका आप्टे का रहस्यमयी और खतरनाक अंदाज कहानी को दिलचस्प बनाता है.

दोनों अभिनेत्रियों की स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है. इनके अलावा तन्वी आजमी ने भी अपने अभिनय से छाप छोड़ी है. महेश मांजरेकर की शुरुआती झलक के बाद कहानी का बड़ा हिस्सा उनके नजरिए से आगे बढ़ता है. अंशुमन पुष्कर और अन्य सहायक कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है.

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

धर्मराज शेट्टी ने इस सीरीज के जरिए लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली है. पीरियड ड्रामा के माहौल को पर्दे पर उतारने में उन्होंने अच्छी मेहनत की है. कलाकारों के पहनावे, लुक और सेट डिजाइन में उस दौर की झलक देने की कोशिश दिखाई देती है.

सीरीज का संगीत कहानी के वातावरण के अनुरूप है और सिनेमैटोग्राफी भी प्रभाव छोड़ती है. पांच एपिसोड में कहानी को समेटा गया है, जिससे इसे देखने में बहुत अधिक समय नहीं लगता.

कहां कमजोर पड़ती है सीरीज?

‘अक्का’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले है. इसका कॉन्सेप्ट नया और दिलचस्प है, लेकिन कई घटनाएं उतनी स्वाभाविक नहीं लगतीं, जितनी होनी चाहिए थीं.

करीब 800 साल से स्थापित महिला शासन व्यवस्था को एक बाहरी किरदार के आने से इतनी आसानी से चुनौती मिलना थोड़ा असहज लगता है. साम्राज्य की मजबूत व्यवस्था और उसके लोगों की प्रतिक्रिया को कहानी में और बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था.

कुछ दृश्यों में भी सवाल उठते हैं. मसलन, भवानी को हथकड़ी लगाकर ले जाए जाने पर लोगों की प्रतिक्रिया बेहद सीमित दिखाई देती है. साम्राज्य में खुलेआम हिंसा और हत्याओं के बावजूद व्यवस्था का विरोध या सामाजिक प्रतिक्रिया पर्याप्त रूप से सामने नहीं आती.

ऐसे कई मौके हैं, जहां कहानी के किरदार और उनका व्यवहार दर्शकों को उलझन में डाल सकते हैं. मजबूत कलाकारों और भव्य सेटअप के बावजूद कमजोर लेखन सीरीज के प्रभाव को कम करता है.

देखें या नहीं?

अगर आपको पीरियड ड्रामा, सत्ता संघर्ष और महिला प्रधान कहानियां पसंद हैं, तो ‘अक्का’ को एक मौका दिया जा सकता है. कीर्ति सुरेश और राधिका आप्टे का अभिनय इस सीरीज को देखने की प्रमुख वजह है.

हालांकि, कहानी से बहुत ज्यादा तार्किक मजबूती और अप्रत्याशित मोड़ों की उम्मीद करने वाले दर्शकों को कुछ निराशा हो सकती है. पांच एपिसोड की यह सीरीज कम समय में देखी जा सकती है, लेकिन इसका कमजोर स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी कमी बना रहता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-