मुख्य रूप से सूखे कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की पहल, पुराने अखबार, प्लास्टिक, किताबें और ई-वेस्ट देने पर मिलेंगे रिवॉर्ड पॉइंट्स, आठ महीने में 45 टन से अधिक कचरा रीसाइक्लिंग के लिए भेजा गया
भोपाल की सड़कों और बाजारों में अब कचरे को लेकर एक नई सोच आकार ले रही है. जिस पुराने अखबार, प्लास्टिक की बोतल, गत्ते, किताबों और अनुपयोगी सामान को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं, वही अब चाय, कॉफी और पोहे का जरिया बन सकता है. सुनने में यह किसी अनोखे प्रयोग जैसा लगता है, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शुरू हुआ 'कचरा कैफे' इसी विचार को जमीन पर उतार रहा है. यहां कचरा लेकर पहुंचने वाले लोगों को उसके बदले क्रेडिट या रिवॉर्ड पॉइंट्स दिए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल खाने-पीने की चीजें और रोजमर्रा की जरूरत का सामान हासिल करने में किया जा सकता है.
यह पहल इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें सफाई को केवल नगर निगम की जिम्मेदारी मानने के बजाय नागरिकों की रोजमर्रा की आदतों से जोड़ने की कोशिश की गई है. आमतौर पर घरों में निकलने वाला सूखा कचरा अखबार, प्लास्टिक, पुराने कपड़े और गत्ते के रूप में जमा होता रहता है. कई बार इसे दूसरे कचरे के साथ मिलाकर फेंक दिया जाता है. नतीजतन, रिसाइकिल हो सकने वाली वस्तुएं भी अनुपयोगी कचरे का हिस्सा बन जाती हैं. कचरा कैफे इसी आदत को बदलने का संदेश दे रहा है.
कचरा लेकर आइए और बदले में पाइए खाने-पीने की चीजें
कचरा कैफे का मॉडल बेहद दिलचस्प है. यहां लोग अपने घरों से अलग-अलग तरह का सूखा और रिसाइकिल होने योग्य कचरा लेकर पहुंचते हैं. इसमें पुराने अखबार, किताबें, कागज, कार्डबोर्ड, प्लास्टिक, पुराने कपड़े और ई-वेस्ट जैसी वस्तुएं शामिल हैं. कैफे में जमा सामग्री की जांच और वजन किया जाता है. इसके बाद कचरे की श्रेणी और मात्रा के आधार पर संबंधित व्यक्ति को क्रेडिट या 'कचरा कॉइन' दिए जाते हैं.
इन पॉइंट्स का इस्तेमाल कैफे में उपलब्ध चाय, कॉफी, पोहा और दूसरी उपयोगी चीजें हासिल करने के लिए किया जा सकता है. यानी जिस सामान को लोग बेकार समझकर घर से बाहर कर देते थे, वही अब उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता है. यह व्यवस्था लोगों को कचरे को सही तरीके से अलग करने और उसे निर्धारित स्थान पर जमा कराने के लिए प्रोत्साहित करती है.
इस मॉडल का एक सामाजिक पक्ष भी है. जरूरतमंद लोग भी कचरा एकत्रित करके उसके बदले भोजन प्राप्त कर सकते हैं. इस तरह सफाई और सामाजिक सहयोग को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.
नंबर 10 मार्केट से शुरू हुई पहल, दूसरे स्थानों तक पहुंचा मॉडल
भोपाल में कचरा कैफे की शुरुआत नंबर 10 मार्केट से हुई थी. इसके बाद बोट क्लब और बिट्टन मार्केट जैसे प्रमुख स्थानों पर भी इस तरह की पहल शुरू की गई. नगर निगम का उद्देश्य केवल कचरा एकत्रित करना नहीं, बल्कि लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाना है.
शहरों में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है घरों से निकलने वाले सूखे और गीले कचरे का अलग-अलग संग्रहण. जब प्लास्टिक, कागज और खाद्य अवशेष एक साथ मिल जाते हैं, तो उपयोगी सामग्री को अलग करना मुश्किल हो जाता है. इससे रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है.
कचरा कैफे लोगों को यह समझाने का प्रयास करता है कि कचरा हमेशा बेकार नहीं होता. सही तरीके से अलग किया गया सूखा कचरा दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है और उससे नए उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. इस सोच से शहर की सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
आठ महीने में 45 टन से अधिक कचरा रीसाइक्लिंग के लिए भेजा
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका शुरुआती परिणाम है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कचरा कैफे ने आठ महीनों में 45 टन से अधिक कचरा रीसाइक्लिंग के लिए भेजा है. यह आंकड़ा बताता है कि नागरिकों की भागीदारी से सूखे कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की दिशा में काम किया जा सकता है.
हालांकि किसी भी कचरा प्रबंधन मॉडल की वास्तविक सफलता केवल एकत्रित कचरे की मात्रा से तय नहीं होती. यह भी जरूरी है कि सामग्री का सही वर्गीकरण हो, उसे अधिकृत रिसाइक्लिंग इकाइयों तक पहुंचाया जाए और उसका सुरक्षित तरीके से निपटान सुनिश्चित किया जाए. खासकर ई-वेस्ट के मामले में उचित प्रक्रिया अपनाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक तत्व हो सकते हैं.
महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर
कचरा कैफे की खासियत केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है. इससे महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को भी जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाएं कैफे के संचालन और पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार करने जैसी गतिविधियों में भागीदारी कर रही हैं.
इन समूहों के माध्यम से कपड़े के थैले, सजावटी वस्तुएं और उपयोगी उत्पाद तैयार करने को बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं. साथ ही उनके बनाए उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का रास्ता भी तैयार होता है.
प्लास्टिक के विकल्प के रूप में कपड़े के थैलों का इस्तेमाल बढ़ाना भी इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है. यदि स्थानीय स्तर पर तैयार ऐसे उत्पाद लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का हिस्सा बनते हैं, तो इससे प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है.
कचरे को बोझ नहीं, संसाधन मानने की जरूरत
कचरा कैफे का विचार एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाता है कि क्या शहरों में कचरे की समस्या को केवल सफाई अभियान चलाकर हल किया जा सकता है? इसका जवाब काफी हद तक नागरिकों की भागीदारी में छिपा है. जब तक घरों और दुकानों से निकलने वाला कचरा अलग-अलग एकत्रित नहीं होगा, तब तक रीसाइक्लिंग की व्यवस्था को प्रभावी बनाना मुश्किल रहेगा.
इसलिए जरूरी है कि लोग गीले और सूखे कचरे को अलग रखें. पुराने अखबार, प्लास्टिक, गत्ते और ई-वेस्ट को सामान्य घरेलू कचरे में मिलाने के बजाय निर्धारित संग्रह केंद्रों तक पहुंचाएं. इससे न केवल कचरे का बेहतर प्रबंधन होगा, बल्कि रिसाइकिल होने वाली सामग्री का उपयोग भी बढ़ सकेगा.
दूसरे शहरों के लिए भी बन सकता है उदाहरण
भोपाल का कचरा कैफे मॉडल दूसरे शहरों के लिए भी एक उपयोगी उदाहरण बन सकता है. यदि स्थानीय निकाय नागरिकों, स्वयं सहायता समूहों और रीसाइक्लिंग इकाइयों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करें, तो इस तरह की पहल को अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है.
हालांकि इसकी निरंतर सफलता के लिए नियमित संग्रहण, पारदर्शी पॉइंट व्यवस्था, कचरे का सुरक्षित निपटान और लोगों की लगातार भागीदारी जरूरी होगी. नागरिकों को भी यह भरोसा होना चाहिए कि उनके द्वारा जमा किया गया कचरा वास्तव में रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जा रहा है.
कचरा कैफे का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों या नगर निगम का काम नहीं है. इसमें हर नागरिक की भूमिका है. अगर पुराने अखबार, प्लास्टिक और अनुपयोगी सामान को सही जगह पहुंचाने की आदत विकसित हो जाए, तो कचरे का बोझ कम करने के साथ रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के नए रास्ते भी खुल सकते हैं. भोपाल की यह पहल बताती है कि कभी बेकार समझी जाने वाली चीजें भी सही सोच और व्यवस्था के साथ उपयोगी बन सकती हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-




