प्रयागराज. फ्लैट खरीदने वालों को बिल्डिंग का स्वीकृत नक्शा और साझा सुविधाओं का विवरण दिखाने के बाद बिल्डर अपनी मर्जी से उसमें बदलाव नहीं कर सकता. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि निर्माण योजना, विनिर्देशों या साझा क्षेत्रों में बदलाव से पहले सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी जरूरी है. अदालत ने गाजियाबाद के एक ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट में अवैध निर्माण को नियमित करने वाला आदेश रद्द करते हुए कुछ टावरों के हिस्से ध्वस्त करने, प्रमोटर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और साझा क्षेत्र वापस दिलाने के निर्देश दिए हैं.
केस का नाम और स्थिति: सुरेश चंद्र एवं 10 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 2 अन्य, साथ में गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम गाजियाबाद विकास प्राधिकरण एवं अन्य. फैसला 27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने सुनाया. प्रकाशित रिपोर्ट में फैसले का संदर्भ दिया गया है. इससे संबंधित पहले दर्ज एफआईआर का केस क्राइम नंबर 0749/2018 है. दोनों रिट याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं.
सभी फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति जरूरी
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव संवर्धन) अधिनियम, 2010 की धारा 5(3)(a) की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक अपार्टमेंट मालिक का साझा क्षेत्रों और सुविधाओं में अविभाजित हिस्सेदारी का प्रतिशत स्थायी प्रकृति का होता है. इसे सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बिना बदला नहीं जा सकता.
अदालत ने स्पष्ट किया कि बिल्डर या प्रमोटर केवल यह कहकर बदलाव को सही नहीं ठहरा सकता कि संशोधित निर्माण स्वीकृत फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की सीमा के भीतर है. यदि बदलाव से स्वीकृत नक्शे, साझा क्षेत्र, खुले स्थान या सुविधाओं पर असर पड़ता है, तो फ्लैट मालिकों की सहमति आवश्यक होगी.
कानून की धारा 4(1)(c) और 4(1)(d) के तहत प्रमोटर की जिम्मेदारी है कि फ्लैट बेचने से पहले पूरी बिल्डिंग का स्वीकृत नक्शा, निर्माण संबंधी विनिर्देश और साझा क्षेत्रों व सुविधाओं का विवरण खरीदार को लिखित रूप में उपलब्ध कराए. खरीदार इसी जानकारी के आधार पर फ्लैट खरीदने का निर्णय लेते हैं. बाद में प्रमोटर एकतरफा तरीके से इन शर्तों को बदलकर खरीदारों के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकता.
गाजियाबाद के गुलमोहर ग्रीन्स प्रोजेक्ट से जुड़ा मामला
यह विवाद गाजियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र में 95, कटोरी मिल, मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन्स ग्रुप हाउसिंग परियोजना से संबंधित है. इस परियोजना का नक्शा 29 मई 2006 को 34 टावरों और 904 आवासीय इकाइयों के लिए स्वीकृत किया गया था. हालांकि, हिंडन एयर बेस के अधिकारियों ने प्रमोटर के भूमि स्वामित्व पर आपत्ति जताई. इसके बाद 3 जुलाई 2010 को स्वीकृत नक्शा निरस्त कर दिया गया. उस समय तक परियोजना में 720 इकाइयों का निर्माण हो चुका था.
इसके बाद गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) ने 15 नवंबर 2011, 13 जनवरी 2015 और 18 दिसंबर 2024 को तीन बार नक्शे की कंपाउंडिंग की. तीसरी कंपाउंडिंग के जरिए टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं तथा दसवीं मंजिलों को नियमित करने के साथ दो नए टावरों को भी मंजूरी देने का प्रयास किया गया.
ग्यारह अपार्टमेंट मालिकों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि नक्शे में बदलाव करने से पहले उनसे लिखित सहमति नहीं ली गई. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विकास प्राधिकरण प्रमोटर के साथ मिलकर काम कर रहा था और FAR की गणना में भारतीय वायुसेना के स्वामित्व वाली जमीन को भी शामिल किया गया.
बिल्डर और विकास प्राधिकरण ने क्या दी दलील
प्रमोटर और विकास प्राधिकरण की ओर से अदालत में कहा गया कि धारा 5(3)(a) के तहत फ्लैट मालिकों की सहमति तभी आवश्यक है, जब मूल लेआउट में स्वीकृत आवासीय इकाइयों की संख्या बढ़ाई जाए. उनका तर्क था कि उपलब्ध FAR के आधार पर 1,603 आवासीय इकाइयों का निर्माण संभव था, जबकि परियोजना में 1,096 इकाइयों को मंजूरी दी गई थी. इसलिए उनके अनुसार साझा क्षेत्रों या सुविधाओं में कोई कमी नहीं हुई.
यह दलील भी दी गई कि याचिकाकर्ता उन टावरों में नहीं रहते, जिनमें अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं. ऐसे में उन्हें इन बदलावों पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है.
हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि स्वीकृत FAR की सीमा के भीतर निर्माण होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है. यदि नक्शे में बदलाव से फ्लैट मालिकों के साझा क्षेत्रों में अविभाजित हिस्सेदारी या सुविधाएं प्रभावित होती हैं, तो उनकी लिखित सहमति अनिवार्य है.
सुप्रीम कोर्ट के सुपरटेक फैसले का भी लिया आधार
हाईकोर्ट ने अपनी खंडपीठ के पूर्व फैसले एम/एस डिजाइनआर्च इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम वाइस चेयरमैन, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण एवं अन्य का उल्लेख किया. इस फैसले में कहा गया था कि अपार्टमेंट की डीड में दर्ज साझा क्षेत्रों में अविभाजित हिस्सेदारी का प्रतिशत स्थायी होता है. इसे सभी अपार्टमेंट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बिना बदला नहीं जा सकता. साझा क्षेत्रों को बेचा या विभाजित भी नहीं किया जा सकता.
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सुपरटेक लिमिटेड बनाम एमराल्ड कोर्ट ओनर्स रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन फैसले पर भी भरोसा किया. शीर्ष अदालत ने उस मामले में कहा था कि संशोधित नक्शे के कारण फ्लैट मालिकों के साझा क्षेत्रों में अविभाजित हिस्से का मूल्य कम होता है तो यह कानून के प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है. छोटे बदलावों के अलावा प्रमोटर इच्छित खरीदार की पूर्व सहमति के बिना नक्शे और निर्माण विनिर्देशों में बदलाव नहीं कर सकता.
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में पहली याचिका दाखिल करने वाले फ्लैट मालिक की सेल डीड 7 सितंबर 2012 को निष्पादित हुई थी. यह तारीख पहली कंपाउंडिंग के बाद की थी, लेकिन सेल डीड में केवल 29 मई 2006 को स्वीकृत नक्शे का उल्लेख था. 15 नवंबर 2011 की कंपाउंडिंग की जानकारी उसमें दर्ज नहीं थी. डीड में खरीदार को परिसर के नीचे की जमीन और साझा क्षेत्रों में आनुपातिक अविभाजित स्वामित्व अधिकार दिए गए थे.
साझा क्षेत्रों की बिक्री और बालकनियों के विस्तार पर सवाल
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि अतिरिक्त FAR का उपयोग बेसमेंट, मुमटी, ग्राउंड फ्लोर और बालकनियों में किया गया. कई टावरों में अनेक फ्लैटों की बालकनियों का विस्तार कर FAR का इस्तेमाल किया गया था. अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि प्रमोटर ने अधिक कीमत पर फ्लैट बेचकर आर्थिक लाभ कमाने के उद्देश्य से निर्माण में बदलाव किए.
अदालत ने रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की वर्ष 2015 की याचिका में लगाए गए उस आरोप को भी महत्वपूर्ण माना, जिसमें कहा गया था कि ग्राउंड फ्लोर के फ्लैटों के साथ साझा क्षेत्र भी बेच दिए गए. विकास प्राधिकरण के अपने रिकॉर्ड में ऐसे 85 लोगों की पहचान की गई थी, जिनके पक्ष में ग्राउंड फ्लोर के साझा क्षेत्र हस्तांतरित किए गए और जिन्होंने वहां चारदीवारी तथा कमरे बना लिए थे.
कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2010 के अपार्टमेंट कानून की धारा 5(4) साझा क्षेत्रों और सुविधाओं की बिक्री पर रोक लगाती है. ऐसा करना धारा 25 के तहत अपराध है. अदालत ने यह भी पाया कि प्रमोटर ने भारतीय वायुसेना के स्वामित्व वाली जमीन को परियोजना में शामिल किया और विकास प्राधिकरण ने FAR की गणना में उस जमीन को शामिल किया. हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया अवैध माना.
पुरानी FIR की जांच पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
मामले में 11 अप्रैल 2018 को आईपीसी की धाराओं 420, 467, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. इसका केस क्राइम नंबर 0749/2018 था. हालांकि, जांच के बाद पुलिस ने यह कहते हुए फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी कि विवाद दीवानी प्रकृति का है और कंपाउंड किया जा सकता है.
हाईकोर्ट ने जांच के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों की समुचित जांच किए बिना फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी गई. रिकॉर्ड से पता चला कि जांच अधिकारी ने न तो घटनास्थल का निरीक्षण किया और न ही प्रमोटर का बयान दर्ज किया. उसने केवल सोसायटी के जनरल मैनेजर का बयान दर्ज किया था.
अदालत ने इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह को निलंबित करने और कर्तव्य में लापरवाही के लिए उनके खिलाफ जांच करने का निर्देश दिया. साथ ही गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को उस अधिकारी की पहचान करने को कहा, जिसने फाइनल रिपोर्ट को मंजूरी दी थी, ताकि राज्य सरकार उसके आचरण की जांच कर सके.
बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट फ्लैट सौंपना भी उल्लंघन
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रमोटर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त किए बिना फ्लैटों का हस्तांतरण किया और खरीदारों को कब्जा सौंप दिया. अदालत ने इसे उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15A और उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट कानून, 2010 की धारा 4(5) का उल्लंघन माना.
प्रमोटर की ओर से यह दलील दी गई कि कंप्लीशन सर्टिफिकेट को स्वतः जारी हुआ माना जाना चाहिए. अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. साथ ही स्पष्ट किया कि प्रमाणपत्र के अभाव में फ्लैटों में रहने वाले खरीदारों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. कंप्लीशन सर्टिफिकेट प्राप्त करने की जिम्मेदारी प्रमोटर की है.
दो महीने में छह टावरों के हिस्से ध्वस्त करने का आदेश
हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 की तीसरी कंपाउंडिंग को रद्द कर दिया. अदालत ने टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं तथा दसवीं मंजिलों को ध्वस्त करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही टावर 27 और 28 को पूरी तरह दो महीने के भीतर गिराने का आदेश दिया गया. इस कार्रवाई में गाजियाबाद प्रशासन और पुलिस को विकास प्राधिकरण को सुरक्षा और आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए.
अदालत ने प्रमोटर के खिलाफ धोखाधड़ी, गलत तथ्यों को प्रस्तुत करने और वर्ष 2010 के अपार्टमेंट कानून के उल्लंघन के आरोपों में दो सप्ताह के भीतर नई एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया. इस मामले की जांच ऐसे अधिकारी से कराने को कहा गया है, जो अतिरिक्त पुलिस आयुक्त से नीचे के रैंक का न हो.
85 लोगों को नोटिस देकर साझा जमीन वापस दिलाने की व्यवस्था
हाईकोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया. समिति उन 85 लोगों को नोटिस देकर सुनवाई करेगी, जिनके पक्ष में साझा क्षेत्र हस्तांतरित किए गए थे. इसके बाद साझा क्षेत्रों की पहचान कर वहां किए गए निर्माण को ध्वस्त कराया जाएगा और छह महीने के भीतर जमीन सोसायटी को वापस दिलाई जाएगी.
प्रमोटर को साझा क्षेत्रों की बिक्री से प्राप्त रकम लौटाने का निर्देश दिया गया है. इसके साथ समिति द्वारा निर्धारित निर्माण लागत और भुगतान की तारीख से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा.
अदालत ने प्रमोटर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया. तीसरी कंपाउंडिंग को रद्द करने के साथ दोनों रिट याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं.
इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि फ्लैट खरीदने वालों को दिखाए गए नक्शे और साझा सुविधाएं केवल बिक्री के समय का वादा नहीं हैं, बल्कि उनके कानूनी अधिकारों का हिस्सा हैं. प्रमोटर और विकास प्राधिकरण इन अधिकारों को मनमाने बदलावों के जरिए समाप्त नहीं कर सकते.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

