पराली पर जुर्माने से किसानों में उबाल, मुख्यमंत्री को खुला पत्र भेजकर दी दो टूक मांग, पहले मशीनें दो, फिर कार्रवाई करो

पराली पर जुर्माने से किसानों में उबाल, मुख्यमंत्री को खुला पत्र भेजकर दी दो टूक मांग, पहले मशीनें दो, फिर कार्रवाई करो

प्रेषित समय :19:12:16 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. जिले में पराली प्रबंधन को लेकर लागू सख्त नियमों और बरगी क्षेत्र के किसानों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 223 के तहत की गई अर्थदंड की कार्रवाई के विरोध में किसानों का असंतोष बढ़ने लगा है. भारत कृषक समाज ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को खुला पत्र भेजकर दंडात्मक कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने और पराली प्रबंधन की नीति पर व्यावहारिक दृष्टिकोण से पुनर्विचार करने की मांग की है. संगठन का कहना है कि किसान पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझते हैं और वे भी पराली जलाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन खेतों में फसल अवशेष के निस्तारण के लिए पर्याप्त मशीनें और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में किसानों पर एफआईआर और भारी जुर्माने की कार्रवाई करना उनकी मुश्किलें बढ़ा रहा है.

भारत कृषक समाज ने पत्र में कहा है कि पराली प्रबंधन की जिम्मेदारी किसानों पर डालने से पहले सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटे और सीमांत किसानों को जरूरी उपकरण उचित दरों पर और समय पर उपलब्ध हों. जब तक संसाधनों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, तब तक दंडात्मक कार्रवाई स्थगित रखी जाए. संगठन ने चेतावनी दी है कि मौजूदा व्यवस्था में किसानों को पर्यावरण संरक्षण और अगली फसल की बोवनी के बीच कठिन विकल्प चुनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में

संगठन के अनुसार, जिले में 85 प्रतिशत से अधिक किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं. इनके पास पांच एकड़ से कम कृषि भूमि है. सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, रीपर, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) और बेलर जैसी आधुनिक मशीनें काफी महंगी हैं. सामान्य किसान इन्हें खरीदने की आर्थिक स्थिति में नहीं हैं. इन उपकरणों की उपलब्धता भी सीमित है और इनका लाभ मुख्य रूप से साधन संपन्न किसानों या चुनिंदा एजेंसियों तक ही पहुंच पाता है.

पत्र में बताया गया है कि जिले में करीब एक लाख 76 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है. इतनी बड़ी मात्रा में फसल अवशेष का निस्तारण करने के लिए पर्याप्त बेलर मशीनें उपलब्ध नहीं हैं. धान की कटाई पूरी होने के बाद किसानों के सामने रबी फसल की बोवनी के लिए खेत तैयार करने की चुनौती रहती है. इसके लिए उनके पास महज एक सप्ताह का समय होता है. सीमित अवधि और मशीनों की कमी के कारण अवशेषों का उचित प्रबंधन करना मुश्किल हो जाता है.

निजी एजेंसियों की शर्तें भी किसानों की परेशानी बढ़ा रहीं

भारत कृषक समाज ने निजी मशीन संचालक एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं. संगठन के मुताबिक, कई एजेंसियां मशीन उपलब्ध कराने के लिए एक साथ कम से कम 40 एकड़ क्षेत्र होने की शर्त रखती हैं. छोटे किसानों के पास इतनी जमीन नहीं होती, इसलिए वे इन सेवाओं का लाभ नहीं ले पाते. इसके अलावा मशीन मिलने में 10 से 15 दिन या उससे अधिक समय लग जाता है. इतने लंबे इंतजार के कारण बोवनी का समय निकलने का खतरा रहता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की समस्याएं भी इस प्रक्रिया में बाधा बनती हैं. नहरों के किनारे संपर्क मार्ग जर्जर होने और आसपास के खेतों में कटाई पूरी नहीं होने से बड़े कृषि यंत्रों की आवाजाही प्रभावित होती है. वहीं हार्वेस्टर में एसएमएस सिस्टम लगाने से अतिरिक्त समय और डीजल की खपत बढ़ती है. इसका आर्थिक बोझ भी अंततः किसानों को ही उठाना पड़ता है.

संसाधन दिए बिना दंडात्मक कार्रवाई रोकने की मांग

संगठन ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि पराली प्रबंधन को केवल जुर्माने और कानूनी कार्रवाई के नजरिये से नहीं देखा जाए. छोटे किसानों के लिए ग्राम पंचायत या क्लस्टर स्तर पर मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए. कृषि यंत्रों के लिए किराये की व्यवस्था सरल बनाई जाए और निजी एजेंसियों को छोटे किसानों के खेतों तक सेवा पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

भारत कृषक समाज का तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण और कृषि व्यवस्था दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी है. किसान भी खेतों में फसल अवशेष जलाने से होने वाले नुकसान को समझते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में उनके सामने व्यावहारिक कठिनाइयां हैं. ऐसे में पहले मशीनें, तकनीकी सहायता और पर्याप्त समय उपलब्ध कराया जाना चाहिए. संगठन ने मांग की है कि किसानों पर एफआईआर और भारी अर्थदंड जैसी कार्रवाई तत्काल रोकी जाए तथा पराली प्रबंधन के लिए ऐसी नीति बनाई जाए, जिसका पालन छोटे और सीमांत किसान भी आसानी से कर सकें.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-