जबलपुर में दम्पत्ति ने बैंक को लगाया 51 लाख रुपए का चूना, किसी और की जमीन को फर्जी विक्रेता के जरिए खाते में ट्रांसफर कराया रुपया

जबलपुर में दम्पत्ति ने बैंक को लगाया 51 लाख रुपए का चूना, किसी और की जमीन को फर्जी विक्रेता के जरिए खाते में ट्रांसफर कराया रुपया

प्रेषित समय :16:04:28 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. एमपी के जबलपुर में नेपियर टाउन स्थित आईसीआईसीआई बैंक में एक ऐसा सनसनीखेज और शातिर फर्जीवाड़ा सामने आया है, बैंक से आलीशान घर खरीदने के नाम पर 51 लाख रुपये का भारी-भरकम होम लोन तो ले लिया गया, लेकिन जिस जमीन पर लोन पास कराया गया, वह असल में किसी और की ही थी! शातिर बदमाशों ने फर्जी दस्तावेजों और एक नकली विक्रेता को खड़ा कर बैंक को चूना लगाने का ऐसा जाल बुना कि हर कोई हैरान है. मामले की गंभीरता को देखते हुए मदनमहल थाने में आरोपियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है.

पुलिस को लिखित शिकायत में आईसीआईसीआई बैंक ब्लूम चैक (नेपियर टाउन) के मैनेजर विनीत भसीन ने पुलिस को बताया कि आरोपी आशुतोष शुक्ला और उनकी पत्नी आकृति शुक्ला ने मौजा बैटाला (जबलपुर) स्थित प्लाट नंबर 29, 30 और खसरा नंबर 91/2 पर घर खरीदने के लिए बैंक में आवेदन किया था. दस्तावेजों और कागजी कार्रवाई को दुरुस्त मानकर बैंक ने 51 लाख रुपये का होम लोन मंजूर कर दिया. नियमों के तहत लोन की यह पूरी राशि सीधे कथित विक्रेता धर्मपाल सिंह के खाते में ट्रांसफर कर दी गई. सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन बैंक की आंतरिक जांच ने इस शातिर खेल की परतें उधेड़ कर रख दीं. शिकायत की गहन जांच और तमाम ठोस दस्तावेजों के मु मु मुआयने के बाद यह साफ हो गया कि आरोपी आशुतोष शुक्ला, आकृति शुक्ला और फर्जी विक्रेता बने धर्मपाल सिंह ने एक गहरी आपराधिक साजिश के तहत कूटरचित दस्तावेजों के जरिए बैंक के साथ बहुत बड़ा फ्रॉड किया है. मामले में पुलिस ने आशुतोष शुक्ला, उसकी पत्नी आकृति शुक्ला और कथित विक्रेता धर्मपाल सिंह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2), और 61(2) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर लिया है.

जमीन पर किसी और का कब्जा, विक्रेता भी निकला गेमप्लांट-

बैंक की आंतरिक जांच और पुलिस बयानों में जो सच सामने आया, उसने सभी को सन्न कर दिया. जिस संपत्ति को गिरवी रखकर करोड़ों का लोन लिया गया था, वह असल में पिछले कई सालों से किसी तीसरे पक्ष (जैन परिवार) के कब्जे में थी! यानी जिस जमीन पर लोन लिया गया, उसका हकीकत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था. फर्जी सेल डीड (बिक्री विलेख) तैयार करने के लिए शातिरमाधों ने धर्मपाल सिंह के नाम पर एक अज्ञात व्यक्ति को नकली और फर्जी विक्रेता के रूप में पेश किया था. इतना ही नहीं, आरोपियों द्वारा बैंक में जमा किए गए तमाम केवाईसी और पहचान संबंधी दस्तावेज भी पूरी तरह से अमान्य और मनगढ़ंत पाए गए.

बैंक को गुमराह करने की चली चाल-

जब धोखाधड़ी का यह काला चिट्ठा खुला और शुरुआती शिकायत व बयानों का दौर चला, तो मुख्य आरोपी आशुतोष शुक्ला ने बैंक से समय मांगा. उसने हाथ जोड़कर बैंक का पूरा बकाया चुकाने का लिखित वादा (अंडरटेकिंग स्टेटमेंट) दिया और बैंक को 20 अगस्त 2026 तक इंतजार करने को कहा. लेकिन यह सब सिर्फ और सिर्फ बैंक अधिकारियों को गुमराह करने, समय बर्बाद करने और अपनी गर्दन बचाने की एक सोची-समझी चाल साबित हुई. आरोपी जानबूझकर समझौते की तय शर्तों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा और बकाया मूलधन तथा ब्याज का एक भी रुपया चुकाने में नाकामयाब रहा. शुरुआत से ही आरोपियों का यह ढुलमुल और मक्कारी भरा आचरण बैंक के साथ सोची-समझी ठगी, फर्जी दस्तावेज बनाने और बैंक के फंड के गबन के उनके साफ आपराधिक इरादों को बयां कर रहा था.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-