मझौली के प्राचीन विष्णु वराह मंदिर को अतिक्रमण से मिलेगी मुक्ति, हाईकोर्ट ने सरकार को दिया 3 महीने का अल्टीमेटम

मझौली के प्राचीन विष्णु वराह मंदिर को अतिक्रमण से मिलेगी मुक्ति, हाईकोर्ट ने सरकार को दिया 3 महीने का अल्टीमेटम

प्रेषित समय :19:32:44 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर जिले के मझौली स्थित प्राचीन श्री विष्णु वराह मंदिर के आसपास कथित अतिक्रमण हटाने के मामले में राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मंदिर परिसर के आसपास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई यथाशीघ्र पूरी की जाए. इसके लिए अधिकारियों को अधिकतम तीन महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई है. चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने मंदिर के संरक्षण और सुरक्षा की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका का निराकरण करते हुए यह आदेश पारित किया. अदालत ने माना कि मामला लंबे समय से लंबित है और अब अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को अनिश्चितकाल तक टालना उचित नहीं है. इस आदेश के बाद मंदिर के आसपास कथित रूप से संचालित अवैध दुकानों और अन्य अतिक्रमणों को हटाने की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है.

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता की ओर से मांग की गई थी कि मंदिर के आसपास किए गए कथित अतिक्रमण हटाने के लिए अधिकारियों को स्पष्ट समय-सीमा के साथ निर्देशित किया जाए. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि विवाद कई वर्षों से चल रहा है. ऐसे में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही यथासंभव तीन महीने के भीतर पूरी करें. अदालत का यह निर्देश मंदिर के संरक्षण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि याचिका में प्राचीन स्मारक के आसपास लागू कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद कथित निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां जारी रहने का आरोप लगाया गया था.

तीन महीने में पूरी करनी होगी कार्रवाई

जनहित याचिका के निराकरण के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया समय-सीमा में पूरी करने का निर्देश दिया. अदालत ने याचिकाकर्ता की उस मांग पर विचार किया, जिसमें लंबे समय से लंबित कार्रवाई को पूरा करने के लिए निश्चित अवधि तय करने का आग्रह किया गया था. पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों को इस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए और यथासंभव तीन महीने के भीतर कार्रवाई पूरी की जानी चाहिए.

इस आदेश का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि याचिकाकर्ता का आरोप था कि अतिक्रमण हटाने के लिए पहले नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन इसके बावजूद जमीन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी. याचिका में यह भी बताया गया कि एक कथित अतिक्रमणकारी ने बेदखली की कार्रवाई के विरुद्ध दीवानी अदालत का रुख किया था. वहां उसका मुकदमा खारिज हो गया था. इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाए जाने पर सवाल उठाए गए थे.

1981 में संरक्षित स्मारक घोषित हुआ था

याचिका में श्री विष्णु वराह मंदिर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व का उल्लेख करते हुए बताया गया कि मध्यप्रदेश शासन ने 14 अगस्त 1981 को अधिसूचना जारी कर इसे प्राचीन स्मारक घोषित किया था. इसके बाद मंदिर को संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त हुआ. याचिकाकर्ता का कहना था कि संरक्षित स्मारक होने के कारण मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की गतिविधि निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अधीन ही की जा सकती है.

याचिका में प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के प्रावधानों का हवाला दिया गया. इसके अनुसार संरक्षित स्मारक को नुकसान पहुंचाने, उसमें बदलाव करने, उसे विकृत करने अथवा उसके दुरुपयोग पर दंड और जुर्माने का प्रावधान है. याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि ऐसे स्मारकों का संरक्षण केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा हुआ है. इसलिए मंदिर के आसपास किसी भी तरह का अनधिकृत निर्माण या व्यावसायिक गतिविधि रोकना आवश्यक है.

मंदिर के 300 मीटर दायरे में निर्माण पर प्रतिबंध का हवाला

याचिका में मंदिर के आसपास लागू प्रतिबंधित और विनियमित क्षेत्र की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया. याचिकाकर्ता के अनुसार, संरक्षित स्मारक के चारों ओर 100 मीटर तक का क्षेत्र प्रतिबंधित क्षेत्र और उससे आगे 100 से 200 मीटर तक का क्षेत्र विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया है. इस तरह मंदिर के आसपास कुल 300 मीटर के दायरे में निर्माण, खनन और कृषि संबंधी गतिविधियों पर संबंधित कानूनी प्रतिबंध लागू होने का दावा किया गया.

याचिकाकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि इन प्रावधानों का उद्देश्य संरक्षित स्मारक की ऐतिहासिक संरचना, स्वरूप और आसपास के वातावरण को सुरक्षित रखना है. यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में अनधिकृत निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां जारी रहती हैं, तो इससे स्मारक के संरक्षण के उद्देश्य पर असर पड़ सकता है. इसी आधार पर मंदिर के आसपास कथित अतिक्रमण हटाने और कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग की गई थी.

अवैध दुकानों के संचालन का भी लगाया गया आरोप

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया कि मंदिर के आसपास प्रतिबंधित और विनियमित क्षेत्र में कुछ अवैध दुकानें संचालित की जा रही हैं. याचिकाकर्ता ने तस्वीरों के माध्यम से अदालत के सामने यह दिखाने का प्रयास किया कि मंदिर के आसपास कथित रूप से अतिक्रमण कर व्यावसायिक गतिविधियां चलाई जा रही हैं. उनका कहना था कि संबंधित अधिकारियों को इन गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई.

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कथित अतिक्रमणकारियों को बेदखली के नोटिस जारी किए जाने के बाद भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी. एक व्यक्ति द्वारा दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किए जाने का उल्लेख करते हुए बताया गया कि उसका मामला खारिज हो चुका है. इसके बावजूद अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया लंबित रहने पर प्रशासनिक निष्क्रियता का मुद्दा उठाया गया. हालांकि, ये आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए थे. हाईकोर्ट के आदेश में संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई पूरी करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई है.

पहले सरकार से मांगा गया था स्थिति पर हलफनामा

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इससे पहले राज्य सरकार को मंदिर की वर्तमान स्थिति के संबंध में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था. अदालत ने मामले से जुड़े तथ्यों और मंदिर के संरक्षण की स्थिति को समझने के लिए सरकार से जानकारी मांगी थी. याचिका में उठाए गए मुद्दों में मंदिर की ऐतिहासिक पहचान, संरक्षित स्मारक के रूप में उसका दर्जा और आसपास कथित अतिक्रमण की स्थिति प्रमुख थी.

याचिकाकर्ता का आग्रह था कि केवल नोटिस जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा. प्रशासन को मौके पर कार्रवाई कर संरक्षित क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त कराना चाहिए. इसी मांग के साथ अदालत से समय-सीमा निर्धारित करने का अनुरोध किया गया था. खंडपीठ ने मामले के लंबे समय से लंबित होने को ध्यान में रखते हुए तीन महीने के भीतर कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया.

मझौली का श्री विष्णु वराह मंदिर क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है. इसे संरक्षित स्मारक का दर्जा मिलने के बाद इसके आसपास लागू नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है. हाईकोर्ट के ताजा निर्देश से अब संबंधित अधिकारियों पर तय समय-सीमा में कार्रवाई पूरी करने की जिम्मेदारी होगी.

अदालत ने जनहित याचिका का निराकरण करते हुए अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस अवधि में मौके पर क्या कार्रवाई करता है और कथित अतिक्रमणों को हटाने की प्रक्रिया किस तरह पूरी की जाती है. हाईकोर्ट का यह आदेश प्राचीन स्मारकों के संरक्षण और उनके आसपास लागू प्रतिबंधों के पालन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-