राजेश कुमार सिन्हा
भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयाँ बाँटने, नए कपड़े पहनने और पटाखे चलाने का त्योहार नहीं है. दरअसल यह अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और बिछोह पर मिलन की आकांक्षा का सांस्कृतिक उत्सव है. घर के दरवाजे पर रखे मिट्टी के छोटे-से दीये से लेकर किसी गगन चुम्बी़ इमारत को रोशन करती दीपमालाओं तक, दीपोत्सव की अपनी एक विजुअल भाषा है. इस भाषा में स्मृति है, आस्था है, समृद्धि की कामना है और सबसे बढ़कर अपने घर लौटने की प्रतीक्षा है. भारतीय सिनेमा ने जब इस उत्सव को अपने पर्दे पर उतारा, तो उसने केवल दीपावली की सजावट और रोशनी को कैमरे में कैद नहीं किया; उसने उसके भीतर छिपे मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं, पारिवारिक आकांक्षाओं और भावनात्मक द्वंद्वों को भी अभिव्यक्ति दी.सिनेमा मूलतः विजुअल्स, साउंड और संवेदनाओं की कला है. दीपावली जैसा पर्व उसके लिए स्वाभाविक रूप से एक समृद्ध सिनेमाई अवसर प्रस्तुत करता है. अंधेरे में जलते असंख्य दीये, रोशनी से जगमगाते घर, लक्ष्मी-पूजन की तैयारी, बच्चों की उत्सुकता, नए कपड़ों में सजे परिवार, मिठाइयों की खुशबू और किसी अनुपस्थित व्यक्ति की प्रतीक्षा ,इन सबमें एक कहानी रचने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं. लेकिन भारतीय फिल्मकारों ने दीपावली को हमेशा एक ही अर्थ में नहीं देखा. कहीं यह परिवार के पुनर्मिलन का अवसर है, कहीं अपराध और प्रतिशोध की पृष्ठभूमि, कहीं आर्थिक विषमता का प्रतीक, कहीं प्रेम की अभिव्यक्ति और कहीं अकेलेपन की ऐसी तीखी अनुभूति, जो बाहर की चकाचौंध के बीच मनुष्य के भीतर पसरे अंधकार को और गहरा कर देती है.यही कारण है कि भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव का अध्ययन केवल त्योहार से संबंधित गीतों और दृश्यों की सूची तैयार करना नहीं है. यह भारतीय समाज की बदलती मानसिकता, परिवार की संरचना, मध्यवर्गीय जीवन की आकांक्षाओं, धार्मिक प्रतीकों के व्यावसायिक इस्तेमाल और लोकप्रिय संस्कृति में उत्सव की बदलती भूमिका को समझने का भी एक माध्यम है. हिंदी सिनेमा के ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के डिजिटल युग तक दीपावली की सिनेमाई उपस्थिति में जो बदलाव दिखाई देते हैं, वे भारतीय समाज में आए परिवर्तनों की कहानी भी कहते हैं.
भारतीय फिल्मों में त्योहारों की उपस्थिति का एक व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ है. भारतीय समाज में धार्मिक और सामाजिक उत्सव सार्वजनिक जीवन से लेकर घरेलू संसार तक फैले हुए हैं. यहाँ त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, वे समय को अनुभव करने का एक विशेष तरीका भी हैं. सामान्य दिनों में जिन रिश्तों के बीच दूरी बनी रहती है, त्योहार उन्हें एक साथ बैठने का अवसर देते हैं. जो लोग रोजमर्रा के संघर्षों में उलझे रहते हैं, वे उत्सव के अवसर पर जीवन को कुछ अधिक रंगीन और अर्थपूर्ण बनाने की कोशिश करते हैं. यही वजह है कि भारतीय सिनेमा में होली, ईद, दीपावली, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा, पोंगल और अन्य पर्व केवल दृश्य सजाने के साधन नहीं रहे; वे अनेक बार कहानी के विकास और पात्रों की भावनात्मक पहचान का हिस्सा बने हैं.दीपावली के सांस्कृतिक अर्थ को भी एक या दो वाक्य में नहीं रखा जा सकता है. उत्तर भारत में इसे भगवान राम के अयोध्या लौटने और उनके स्वागत में दीप जलाने की परंपरा से जोड़ा जाता है. अनेक समुदायों में यह लक्ष्मी-पूजन, व्यापारिक वर्षारंभ और समृद्धि की कामना का अवसर है. जैन परंपरा में इसका संबंध महावीर के निर्वाण से है, जबकि कुछ अन्य भारतीय परंपराओं में इसके अलग धार्मिक और ऐतिहासिक अर्थ हैं. दक्षिण भारत में नरकासुर-वध की कथा और दीपावली की प्रादेशिक परंपराएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं. इसलिए भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव को समझते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उसका अर्थ केवल एक धार्मिक वृतांत तक सीमित नहीं है. थोड़े में कहें तो वह विविधताओं से निर्मित एक सांस्कृतिक अनुभव है. हिंदी सिनेमा ने दीपावली को जिस तरह अपनाया, उसमें लोकजीवन की सहजता और फिल्मी कल्पना की भव्यता दोनों दिखाई देती हैं. शुरुआती फिल्मों में दीपावली का दृश्य आम तौर पर घरेलू और साधारण था. मिट्टी के दीये, आँगन, परिवार के सदस्य और त्योहार से जुड़ा गीत आदि से उत्सव का वातावरण बनाया जाता था. बाद के दशकों में जब फिल्म निर्माण की तकनीक विकसित हुई, रंगीन सिनेमा का विस्तार हुआ और बड़े बजट की फिल्मों ने दर्शकों की कल्पना को प्रभावित करना शुरू किया, तब दीपावली का दृश्य भी अधिक भव्य, चमकदार और सजावटी होता गया. महलों जैसे घर, झिलमिलाती झालरें, पारंपरिक परिधानों में सजे कलाकार और विस्तृत नृत्य-संयोजन इस उत्सव के सिनेमाई रूप का हिस्सा बन गए.इस बदलाव को केवल तकनीकी प्रगति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा. इसके पीछे भारतीय मध्यवर्ग की बदलती आकांक्षाएँ, उपभोक्ता संस्कृति का विकास और सिनेमा के बाजार का विस्तार भी काम कर रहे थे. पर्दे पर दिखाई देने वाला घर धीरे-धीरे दर्शक की इच्छा का घर बनने लगा. दीपावली केवल धार्मिक आस्था का अवसर नहीं रही; वह जीवन में उपलब्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा और उपभोग की क्षमता का प्रदर्शन भी बन गई. इस अर्थ में फिल्मी दीपावली भारतीय समाज के आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों का एक दिलचस्प दस्तावेज है.भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव की यात्रा को समझने के लिए उसके आरंभिक दशकों की ओर लौटना जरूरी है. आज जिस दीपावली को हम बड़े पर्दे पर चमकदार परिधानों, भव्य घरों और आकर्षक रोशनी के बीच देखते हैं, उसकी शुरुआती सिनेमाई छवियों में जीवन की सादगी और भावनात्मक सहजता अधिक दिखाई देती है. 1940 के दशक में हिंदी फिल्मों ने दीपावली को गीतों और घरेलू दृश्यों के माध्यम से अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया था. उस समय फिल्मी गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे; वे सामाजिक अनुभवों, लोक-संवेदनाओं और सामूहिक स्मृतियों को लोकप्रिय बनाने का एक प्रभावशाली माध्यम थे.
फिल्म "खजांची" के गीत ‘दीवाली फिर आ गई सजनी’ को हिंदी सिनेमा में दीपावली से जुड़े आरंभिक उल्लेखनीय गीतों में गिना जाता है. संगीतकार गुलाम हैदर ने इस गीत में लोकधुनों की सहजता और उत्सव की लय को महत्त्व दिया. आँगन, तुलसी का पौधा और घरेलू परिवेश से जुड़ा माहौल उस समय के सामाजिक जीवन का परिचय देती है. यहाँ दीपावली किसी भव्य आयोजन का नाम नहीं, बल्कि घर-परिवार की साझा अनुभूति है. यह वह समय था जब भारतीय समाज का बड़ा हिस्सा आधुनिक उपभोक्तावादी जीवनशैली से दूर था और त्योहारों की खुशी घरेलू वस्तुओं, पारिवारिक निकटता तथा सामूहिक सहभागिता से बनती थी. इस गीत की ऐतिहासिक अहमियत केवल उसके पुराने होने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसने एक धार्मिक-सांस्कृतिक अवसर को लोकप्रिय फिल्म संगीत की दुनिया में जगह दी
शुरूआती दौर कीìकिस्मत ने दीपावली की सिनेमाई अभिव्यक्ति को एक नया भावनात्मक आयाम दिया. इस फिल्म का गीत ‘घर घर में दीवाली है, मेरे घर में अंधेरा’ भारतीय फिल्म संगीत के उन उल्लेखनीय उदाहरणों में है, जहाँ त्योहार की सामूहिक प्रसन्नता के बीच किसी व्यक्ति का निजी दुख उभरकर सामने आता है. अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज में व्यक्त यह पीड़ा केवल प्रेम-विरह का प्रसंग नहीं है. यह उस सामाजिक विषमता की ओर भी संकेत करती है जिसमें एक ही समय में कुछ घरों में उत्सव होता है, जबकि कुछ घरों में अभाव, अकेलापन और निराशा का अंधकार पसरा रहता है, और इस गीत का मूल भाव आज भी उतना ही प्रासंगिक है. कहते हैं कि दीपावली का प्रकाश सबके लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं होता. यह किसी के लिए यह समृद्धि का प्रदर्शन है, किसी के लिए अपने बच्चों की इच्छाएँ पूरी करने की कोशिश, किसी के लिए दूर बसे परिजनों से मिलने की उम्मीद और किसी के लिए अपने दुख को छिपाकर मुस्कराने की विवशता. जब गीत कहता है कि हर घर में दीवाली है, लेकिन उसके अपने घर में अंधेरा है, तब वह उत्सव की परंपरागत परिभाषा को चुनौती देता है. वह दर्शक से पूछता है कि क्या किसी समाज की खुशहाली को केवल जगमगाते घरों से मापा जा सकता है, जबकि उसी समाज में अनेक लोग अपने हिस्से की रोशनी के लिए संघर्ष कर रहे हों? अगर हम गौर से देखें तो यहाँ भारतीय सिनेमा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है. वह त्योहार की चमक से आकर्षित जरूर होता है, लेकिन अपनी श्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में उस चमक के पीछे छिपे अंधकार को भी पहचानता है. दीपावली का दृश्य तब केवल सुंदरता नहीं रह जाता, वह सामाजिक आलोचना का माध्यम बन जाता है. उत्सव और अभाव का यह विरोधाभास आगे चलकर हिंदी सिनेमा की अनेक फिल्मों, गीतों और कथानकों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है.
1944 में प्रदर्शित "रतन" का गीत ‘आई दीवाली, आई दीवाली’ इस परंपरा का एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत करता है. नौशाद के संगीत और डी. एन. मधोक के गीत के साथ जुड़ा यह गीत त्योहार की उल्लासपूर्ण अनुभूति का उदाहरण है. "रतन" ने नौशाद को व्यापक पहचान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इस गीत में दीपावली की खुशी किसी दार्शनिक व्याख्या के बजाय संगीत, सामूहिकता और सहज उत्साह के जरिए सामने आती है. गीत की लोकप्रियता यह भी बताती है कि सिनेमा ने त्योहारों से जुड़ी भावनाओं को स्मृति में सुरक्षित रखने का एक नया माध्यम उपलब्ध कराया.
फिल्मी गीतों की एक खासियत यह है कि वे फिल्म की कहानी से बाहर निकलकर भी जीवित रह सकते हैं. यह सच है कि कोई गीत किसी खास दृश्य के लिए लिखा जाता है, लेकिन समय के साथ वह उस दृश्य की सीमाएँ पार कर देता है. श्रोता उसे अपनी निजी स्मृतियों से जोड़ने लगते हैं. वह गीत घरों में बजता है, रेडियो पर सुनाई देता है, उत्सव की तैयारियों का हिस्सा बनता है और अगली पीढ़ी तक पहुँच जाता है. इस तरह सिनेमा केवल दीपावली का चित्रण नहीं करता; वह दीपावली मनाने के सांस्कृतिक अनुभव को भी प्रभावित करता है.1940 और 1950 के दशक की फिल्मों में दीपावली का घरेलू संसार अक्सर मध्यवर्गीय जीवन की सीमित आर्थिक परिस्थितियों के भीतर रचा गया था. उस समय का फिल्मी घर आज की तरह अत्यधिक सजा हुआ या डिजाइनर वस्तुओं से भरा नहीं होता था. दीये, आँगन, साधारण वस्त्र और पारिवारिक बातचीत ही वातावरण निर्मित करने के लिए पर्याप्त थे. इस सादगी का एक कारण उस दौर की फिल्म निर्माण संबंधी सीमाएँ थीं, लेकिन इसे केवल तकनीकी विवशता मानना उचित नहीं होगा. उस समय की कहानी कहने की शैली भी भावनात्मक स्थितियों को प्राथमिकता देती थी. एक दीया, किसी की प्रतीक्षा करती आँखें या पूजा की थाली के सामने खड़ा परिवार कई बार उस भव्यता से अधिक प्रभावशाली होता था, जिसे बाद के सिनेमा ने अपने दृश्य-विधान में अपनाया.
इस कालखंड में "दीवाली" "घर घर में दीवाली" और "दीवाली की रात" जैसी फिल्मों के नाम ही बताते हैं कि यह पर्व लोकप्रिय फिल्म संस्कृति में एक पहचाने जाने योग्य विषय बन चुका था. इन फिल्मों का उल्लेख दीपावली के सिनेमाई इतिहास में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि त्योहार केवल किसी दूसरी कहानी के बीच आने वाला दृश्य नहीं रहा; वह फिल्म के शीर्षक और उसके भावनात्मक संसार का हिस्सा भी बना. हालाँकि इन फिल्मों के कथानकों और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों का मूल्यांकन करते समय यह सावधानी जरूरी है कि केवल शीर्षक के आधार पर उनके पूरे वैचारिक अर्थ का अनुमान न लगाया जाए. फिर भी इनके अस्तित्व से यह स्पष्ट होता है कि दीपावली ने लोकप्रिय सिनेमा में अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान अर्जित कर ली थी. सिनेमा जानकार यह बताते हैं कि 1950 और 1960 के दशकों में भारतीय सिनेमा का सामाजिक यथार्थ से संबंध अधिक गहरा हुआ. स्वतंत्रता के बाद देश नई आर्थिक व्यवस्था, औद्योगीकरण, शहरीकरण और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच अपनी पहचान निर्मित कर रहा था. हिंदी फिल्मों में गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक अन्याय, प्रेम, त्याग और नैतिक संघर्ष जैसे विषय प्रमुख थे. ऐसे समय में दीपावली का अर्थ केवल उत्सव नहीं हो सकता था. वह समाज की असमानताओं को उजागर करने और मनुष्य की निजी पीड़ा को सामूहिक उल्लास के सामने रखने का माध्यम भी बनी.राज कपूर की फिल्म "नज़राना" का गीत ‘एक वो भी दीवाली थी’ इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है. मुकेश की आवाज में रिकॉर्ड किया गया यह गीत यादो और वर्तमान के बीच की दूरी को भावनात्मक रूप देता है. दीपावली यहाँ केवल वर्तमान का उत्सव नहीं है, बल्कि अतीत की उन खुशियों की याद भी है जो अब लौटकर नहीं आ सकतीं. किसी व्यक्ति के लिए त्योहार का अर्थ उसके जीवन में मौजूद रिश्तों से बनता है. जब वे रिश्ते बदल जाते हैं या बिछुड़ जाते हैं, तब वही त्योहार पहले जैसी खुशी नहीं दे पाता. हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों ने बार-बार यह बताया है कि बाहरी संसार की सुंदरता और आंतरिक संसार की प्रसन्नता एक ही चीज नहीं हैं. शहर में रोशनी हो सकती है, बाजारों में भीड़ हो सकती है, घरों में मिठाइयाँ बन सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के भीतर स्मृतियों, पछतावे या बिछोह का अंधेरा भी हो सकता है. इस तरह दीपावली पर केंद्रित फिल्मी गीतों में मनुष्य की भावनात्मक स्थिति को समझने का रूपक बन जाती है.1960 के दशक में "गाइड" जैसी फिल्मों ने गीतों को केवल कथा के बीच मनोरंजन के लिए रखे गए विराम के रूप में देखने की परंपरा से आगे बढ़ाया. एस. डी. बर्मन के संगीत और शैलेन्द्र के गीतों से समृद्ध "गाइड" का ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ नृत्य, प्रेम, प्रदर्शन और सांस्कृतिक वातावरण को एक साथ जोड़ता है. इसके गीतात्मक संसार में दीपावली का उल्लेख उत्सव को कथा के भावनात्मक परिवेश से जोड़ता है. यहाँ यह समझना जरूरी है कि किसी गीत में त्योहार का उल्लेख होना और पूरे गीत का दीपावली पर केंद्रित होना दो अलग बातें हैं. फिल्मी इतिहास की चर्चा में इन दोनों को अलग रखकर देखने से ही किसी गीत के सांस्कृतिक महत्त्व का सही मूल्यांकन संभव है.इसी दौर में ‘लाखों तारे आसमान पे’ जैसे गीतों ने भी दीपावली की रोशनी को निजी भावनाओं के बरक्स रखकर देखने की संवेदना को मजबूत किया. फिल्म हरियाली और रास्ता से जुड़ा यह गीत इस विचार को सामने लाता है कि रोशनी की बहुलता भी मनुष्य के भीतर के खालीपन को समाप्त नहीं कर सकती. सितारे और दीपक बाहरी संसार को सुंदर बना सकते हैं, लेकिन किसी प्रिय व्यक्ति की अनुपस्थिति से पैदा हुई पीड़ा का समाधान नहीं कर सकते. इस प्रकार दीपोत्सव फिल्मी संगीत में एक ऐसा प्रतीक बनता है जिसमें आनंद और विषाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि जीवन के दो सह-अस्तित्वमान अनुभव हैं.
भारतीय सिनेमा की यही संवेदनात्मक क्षमता उसे केवल उत्सवों का दृश्यात्मक संग्रह बनने से बचाती है. वह त्योहार को मनुष्य की मनःस्थिति से जोड़ता है. एक ही दीपावली किसी के लिए नई शुरुआत है, किसी के लिए पुराने प्रेम की स्मृति, किसी के लिए आर्थिक संकट के बीच उम्मीद और किसी के लिए बीते हुए समय की वापसी की असंभव इच्छा. दरअसल ढेर सारी अर्थों वाले ऐसे गीत दीपावली को फिल्मी कथानक के लिए काफी उपयोगी बनाते हैं.समय के साथ साथ रंगीन सिनेमा का विस्तार हुआ, कैमरे और प्रकाश-व्यवस्था में सुधार आया तथा फिल्मी सितारों की लोकप्रियता ने उत्सव के दृश्यों को अधिक आकर्षक बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया, लेकिन तकनीक से अधिक महत्त्वपूर्ण बदलाव कहानी कहने के ढंग में आया. फिल्मकारों ने महसूस किया कि दीपावली को किसी दृश्य में शामिल करने से केवल सांस्कृतिक प्रामाणिकता नहीं मिलती; यदि उस अवसर का संबंध पात्रों के जीवन में घटने वाली किसी महत्त्वपूर्ण घटना से हो, तो त्योहार कथा की संरचना का हिस्सा बन सकता है.इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण 1973 में प्रदर्शित फिल्म "जंजीर " है. प्रकाश मेहरा की इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा के नए नायक के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. फिल्म की शुरुआत में दीपावली के अवसर पर बालक विजय के माता-पिता की हत्या होती है. रोशनी और उत्सव के बीच घटित यह हिंसक घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है. दीपावली, जो सामान्यतः हर्ष, उल्लास और पारिवारिक निकटता का प्रतीक है, यहाँ एक गहरे आघात की पृष्ठभूमि बन जाती है. बाद में फिल्म के निर्णायक संघर्ष का संबंध भी इसी अतीत से जुड़ता है. फिल्म आलोचक ऐसा मानते हैं कि "जंजीर' में दीपावली का प्रयोग केवल नाटकीय प्रभाव पैदा करने के लिए नहीं है. यह फिल्म के केंद्रीय पात्र की मनोवैज्ञानिक संरचना को समझने में मदद करता है. विजय के जीवन में उत्सव की स्मृति एक ऐसी हिंसक घटना से जुड़ी है, जो उसके व्यक्तित्व, उसके क्रोध और न्याय की तलाश को प्रभावित करती है. जिस रात परिवार की सुरक्षा और सामूहिक खुशी का अनुभव होना चाहिए था, उसी रात उसका परिवार नष्ट हो जाता है. इस प्रकार फिल्म उत्सव के सांस्कृतिक अर्थ को उलट देती है. प्रकाश के बीच अंधकार का प्रवेश होता है और वही अंधकार आगे चलकर नायक की कथा का आधार बनता है. ऐसा लगता है कि यहाँ सिनेमा का एक सिद्धांत भी काम करता है. उत्सव का दृश्य सामान्य दिनों की तुलना में अधिक प्रभावशाली इसलिए होता है कि दर्शक उससे एक निश्चित भावनात्मक अपेक्षा रखते हैं. दीपावली पर सामान्यतः सुख, समृद्धि और सुरक्षा की उम्मीद की जाती है. जब उसी अवसर पर हिंसा, विश्वासघात या मृत्यु घटित होती है, तो उसका प्रभाव अधिक तीखा हो जाता है. फिल्मकार इस सांस्कृतिक अपेक्षा का इस्तेमाल कथा में तनाव पैदा करने के लिए कर सकता है. दीपावली इस तरह केवल पृष्ठभूमि नहीं रहती; वह दर्शक की भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने वाला कथात्मक उपकरण बन जाती है. फिल्म "जंजीर 'की सफलता के बाद हिंदी सिनेमा में ऐसे दृश्यों की संभावनाएँ और स्पष्ट हुईं, जिनमें उत्सव और त्रासदी साथ-साथ मौजूद हों. दीपावली का प्रकाश किसी पात्र के भीतर के अंधकार को उजागर कर सकता है. सामूहिक उत्सव किसी व्यक्ति की अकेली पीड़ा को अधिक स्पष्ट बना सकता है. परिवार की एकजुटता का दृश्य उस पात्र की स्थिति को मार्मिक बना सकता है, जो अपने ही परिवार से दूर हो चुका है. यह विरोधाभास ही फिल्मी दीपावली की सबसे महत्त्वपूर्ण नाटकीय विशेषताओं में से एक है.
1970 के दशक के आरंभ में प्रदर्शित "अनुराग "ने दीपावली को एक अलग भावनात्मक संदर्भ में प्रस्तुत किया. फिल्म में एक बच्चे की इच्छा और उसके जीवन की सीमित होती संभावनाओं के बीच त्योहार का दृश्य मार्मिकता पैदा करता है. दीपावली यहाँ केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि जीवन की सुंदरता को अनुभव करने की आकांक्षा भी है. किसी बच्चे के लिए दीयों की रोशनी, पटाखों की आवाज और आसपास के लोगों का उल्लास जीवन के सबसे सरल सुखों में शामिल हो सकता है. जब बीमारी या मृत्यु की आशंका इस सहज इच्छा पर छाया डालती है, तब वही त्योहार असाधारण भावनात्मक अर्थ ग्रहण कर लेता है. इस तरह की फिल्मों में दीपावली का अर्थ धार्मिक कर्मकांड से आगे निकलकर जीवन के प्रति मनुष्य के लगाव से जुड़ जाता है. उत्सव उस दुनिया का प्रतीक बनता है जिसमें बच्चा रहना चाहता है, उन अनुभवों का प्रतीक बनता है जिन्हें वह अपने हिस्से में देखना चाहता है. दीपावली का आनंद तब एक मानवीय अधिकार जैसा प्रतीत होता है ,जीवन को सुंदर देखने और दूसरों के साथ उसकी खुशी साझा करने का अधिकार.
1980 के दशक तक आते-आते भारतीय सिनेमा के सामाजिक और व्यावसायिक परिदृश्य में कई बदलाव आ चुके थे. शहरीकरण बढ़ रहा था, टेलीविजन का प्रभाव फैल रहा था और लोकप्रिय फिल्मों में पारिवारिक मनोरंजन के साथ-साथ मेलोड्रामा, एक्शन और सितारों की छवि का महत्त्व बढ़ रहा था. दीपावली के दृश्य भी इन प्रवृत्तियों के बीच विकसित हुए. कहीं यह प्रेमियों के मिलन का अवसर बनी, कहीं परिवार के भीतर छिपे तनावों को सामने लाने का माध्यम और कहीं रंगीन गीतों के लिए आकर्षक दृश्यात्मक संसार.
1983 की फिल्म सदमा में ‘ऐ जिंदगी गले लगा ले’ जैसे गीत को याद करते हुए यह समझा जा सकता है कि उत्सव का अर्थ केवल सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है. फिल्म का भावनात्मक संसार स्मृति, पहचान, प्रेम और असहायता के प्रश्नों से निर्मित होता है. इसके दृश्य-संसार में उत्सव की सहजता पात्रों के जीवन की जटिलताओं से जुड़ती है. फिल्म में दीपावली की उपस्थिति को किसी व्यापक धार्मिक विमर्श के रूप में नहीं, बल्कि निजी जीवन के उन क्षणों के रूप में देखना अधिक उचित है जिनमें साधारण गतिविधियाँ भी भावनात्मक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं.
1990 का दशक भारतीय समाज में आर्थिक उदारीकरण, उपभोक्ता संस्कृति और नए मध्यवर्गीय आत्मविश्वास का दौर था. टेलीविजन विज्ञापनों, निजी चैनलों, नए बाजारों और बदलती जीवनशैली ने त्योहारों के सार्वजनिक रूप को प्रभावित किया. घरों की सजावट, उपहारों का आदान-प्रदान, नए वस्त्रों की खरीदारी और महँगे उत्सवी आयोजनों को लेकर समाज की आकांक्षाएँ बढ़ीं. हिंदी सिनेमा ने इस बदलते वातावरण को ग्रहण किया और दीपावली के दृश्यों में समृद्धि, फैशन तथा पारिवारिक वैभव को पहले से अधिक महत्त्व मिलने लगा.
इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में सूरज बड़जात्या की "हम आपके हैं कौन " का उल्लेख आवश्यक है. इस फिल्म ने भारतीय लोकप्रिय सिनेमा में पारिवारिक उत्सव को एक भव्य, रंगीन और आकर्षक दृश्य-अनुभव के रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा को नई ऊँचाई दी. विवाह, पारिवारिक समारोह, संगीत, नृत्य और घरेलू रस्में फिल्म के कथानक का अभिन्न हिस्सा बन गईं. इसके उत्सवी दृश्यों में दीपावली का प्रसंग भी परिवार की एकजुटता, घरेलू समृद्धि और सामूहिक उल्लास को सामने लाता है. फिल्म का ‘धिकताना’ गीत परिवार के सदस्यों की सहभागिता और उत्सव के रंग को लोकप्रिय संगीत की ऊर्जा के साथ जोड़ता है. "हम आपके हैं कौन" को केवल एक सफल पारिवारिक फिल्म के रूप में देखना उसके सांस्कृतिक प्रभाव को सीमित करना होगा. उसने दर्शकों के सामने परिवार को एक ऐसे संसार के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें रिश्ते, समारोह, भोजन, परिधान और संगीत जीवन के केंद्रीय अनुभव हैं. फिल्म के घर में हर आयोजन के लिए पर्याप्त जगह है, हर सदस्य की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है और उत्सव परिवार की सामूहिक पहचान को मजबूत करता है. इस दृश्य-संसार में दीपावली केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन की सुंदरता का प्रदर्शन भी है.
यहाँ से फिल्मी दीपावली में एक नया बदलाव स्पष्ट होने लगता है. पहले जहाँ दीया और आँगन उत्सव के प्रमुख दृश्यात्मक प्रतीक थे, वहीं अब रोशनी के साथ सजावट, परिधानों, बड़े घरों और सामूहिक नृत्य का महत्त्व बढ़ने लगा. कैमरा केवल पूजा की थाली या जलते दीये पर नहीं ठहरता; वह पूरे घर को एक उत्सवी संसार में बदल देता है. दीपावली दृश्यात्मक भव्यता का अवसर बनती है और दर्शक को एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कराती है जहाँ रोजमर्रा की सीमाएँ कुछ समय के लिए समाप्त होती दिखाई देती हैं.यह परिवर्तन भारतीय मध्यवर्ग की मनोवृत्ति से भी जुड़ा है. आर्थिक उदारीकरण के बाद उपभोग की नई वस्तुएँ और जीवनशैली के नए प्रतिमान अधिक व्यापक रूप से दिखाई देने लगे. त्योहारों का अर्थ भी धीरे-धीरे बदलने लगा. पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ खरीदारी, सजावट और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण होने लगा. फिल्मों में इस बदलाव की उपस्थिति स्वाभाविक थी, क्योंकि लोकप्रिय सिनेमा समाज की इच्छाओं को केवल प्रतिबिंबित ही नहीं करता, उन्हें आकार भी देता है.
फिल्मी घर दर्शक के लिए एक कल्पनात्मक आदर्श बन सकता है. वह पर्दे पर दिखाई देने वाली सजावट, कपड़ों, रोशनी और पारिवारिक वातावरण से प्रभावित होता है. इस प्रभाव का अर्थ यह नहीं कि दर्शक वास्तविक जीवन में ठीक वैसा ही व्यवहार करने लगता है, लेकिन सिनेमा सामाजिक आकांक्षाओं की भाषा अवश्य निर्मित करता है. जब दीपावली बार-बार भव्य घरों और महँगे परिधानों के साथ दिखाई जाती है, तो उत्सव की दृश्यात्मक परिभाषा में समृद्धि और उपभोग का हिस्सा बढ़ने लगता है. पर यह प्रश्न भी विचारणीय है कि
हिंदी सिनेमा की दीपावली केवल वैभव और खुशहाली का उत्सव नहीं है. 1999 में प्रदर्शित संजय मांजरेकर की "वास्तव: द रियलिटी" इसका अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है. फिल्म में रघु नामक पात्र का अपराध की दुनिया में प्रवेश और उसका नैतिक पतन एक त्रासद जीवन-कथा रचता है. दीपावली के अवसर पर उसका अपने घर लौटना एक ऐसा दृश्य है जिसमें बाहरी सफलता और आंतरिक विनाश के बीच गहरा अंतर दिखाई देता है. रघु के पास पैसा है, प्रभाव है और अपराध की दुनिया में अर्जित प्रतिष्ठा है, लेकिन वह अपने परिवार के सामने ऐसी जिंदगी लेकर आता है जिसे उसकी माँ स्वीकार नहीं कर सकती."वास्तव" का दीपावली दृश्य इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह भारतीय लोकप्रिय सिनेमा में समृद्धि के सामान्य प्रतीकों को उलट देता है. सोना, पैसा और बाहरी ठाठ यहाँ सफलता के प्रमाण नहीं हैं. वे एक ऐसे जीवन की निशानी हैं जिसमें मनुष्य ने बहुत कुछ हासिल करते हुए अपनी मानवीय सहजता खो दी है. रघु की प्रसिद्ध ‘पचास तोला’ वाली शेखी उसके चरित्र की विडंबना को उजागर करती है. जिस घर में वह अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करना चाहता है, उसी घर में उसकी माँ के लिए उसका अपराधबोध और नैतिक पतन अधिक महत्त्वपूर्ण है. उत्सव की रोशनी उसके भीतर छिपे अंधकार को ढँक नहीं पाती.
यहाँ दीपावली का प्रयोग "जंजीर" से अलग प्रकार का है. "जंजीर" में त्योहार के दिन घटित हिंसा नायक के अतीत और प्रतिशोध की प्रेरणा का स्रोत बनती है. वास्तव में उत्सव पात्र के वर्तमान जीवन और पारिवारिक नैतिकता के बीच टकराव को सामने लाता है. दोनों फिल्मों में दीपावली का दृश्य सामान्य उल्लास से अलग है, लेकिन दोनों ही यह दिखाती हैं कि त्योहार की सांस्कृतिक पवित्रता मनुष्य के कर्मों को अपने आप पवित्र नहीं बना देती. बाहर दीये जल सकते हैं, लेकिन भीतर का अपराधबोध, हिंसा और नैतिक संकट अपनी जगह बने रह सकते हैं.
इस प्रकार दीपावली भारतीय सिनेमा में नैतिक मूल्यांकन का माध्यम भी बन जाती है. फिल्मकार पात्र के जीवन को किसी उत्सवी अवसर पर रखकर उसके व्यवहार की असंगति को अधिक स्पष्ट कर सकता है. जब परिवार मिलकर पूजा कर रहा हो और उसी समय कोई व्यक्ति अपनी हिंसक उपलब्धियों पर गर्व कर रहा हो, तब दृश्य में एक गहरा नैतिक तनाव पैदा होता है. दर्शक केवल पात्र को नहीं देखता; वह उसके जीवन और उन मूल्यों के बीच की दूरी को भी महसूस करता है जिनका प्रतिनिधित्व त्योहार करता है.
1990 के दशक के अंतिम वर्षों और नई सदी के आरंभ में हिंदी सिनेमा में दीपावली के दृश्य अधिक विविध रूपों में दिखाई देने लगे. एक ओर परिवार और घर वापसी का भाव था, दूसरी ओर शहरी मध्यवर्ग की जीवनशैली, प्रेम-संबंधों और सामाजिक प्रतिष्ठा का संसार था. इसी दौर में त्योहार का इस्तेमाल कहानी के निर्णायक मोड़ों के लिए भी होने लगा. किसी पात्र का घर लौटना, किसी प्रेम-संबंध का उजागर होना, किसी पारिवारिक रहस्य का सामने आना या किसी नैतिक संघर्ष का तीव्र होना इन सबके लिए दीपावली का दृश्य प्रभावशाली पृष्ठभूमि प्रदान कर सकता था.
2000 में प्रदर्शित "मोहब्बतें" में दीपावली का दृश्य युवाओं की आकांक्षाओं और कठोर संस्थागत अनुशासन के बीच टकराव को अभिव्यक्त करने में सहायक है. फिल्म का संसार एक ऐसे शिक्षण संस्थान के इर्द-गिर्द निर्मित है जहाँ परंपरा, अनुशासन और अधिकार का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रधानाचार्य युवाओं की स्वतंत्र भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहता है. दीपावली के अवसर पर युवा पात्रों की उपस्थिति और उनकी भावनात्मक दुनिया फिल्म के केंद्रीय संघर्ष से जुड़ती है. यहाँ रोशनी केवल उत्सव का संकेत नहीं; वह आशा, प्रेम और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा का प्रतीक भी बनती है.
"मोहब्बतें" का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि त्योहार का दृश्य किसी सामाजिक संस्था के मूल्यों पर प्रश्न उठाने का माध्यम भी बन सकता है. दीपावली में सामूहिकता और प्रकाश का विचार निहित है, जबकि फिल्म का संस्थागत संसार नियंत्रण और भय से संचालित होता है. दोनों के बीच का अंतर युवाओं की भावनात्मक स्वतंत्रता को अधिक अर्थपूर्ण बना देता है. इस तरह त्योहार एक वैकल्पिक नैतिक संसार की संभावना प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रेम और मानवीय संबंधों को कठोर नियमों से ऊपर स्थान दिया जाता है.
उसी वर्ष प्रदर्शित "कहो ना... प्यार है" और उसके आसपास लोकप्रिय हुए युवा-केंद्रित सिनेमा ने प्रेम, फैशन और शहरी जीवन को नई दृश्यात्मक भाषा दी. हालांकि हर ऐसी फिल्म में दीपावली कथानक का केंद्रीय तत्व नहीं थी, लेकिन बदलते फिल्मी बाजार में त्योहारों की दृश्यात्मकता और संगीत का महत्त्व बढ़ रहा था. नई पीढ़ी के दर्शक पारिवारिक मनोरंजन के साथ-साथ रोमांस, नृत्य और आधुनिक जीवनशैली की चमक भी चाहते थे. फिल्मी दीपावली इस मिश्रित आकांक्षा के अनुकूल बैठती थी.
2001 का वर्ष दीपावली की सिनेमाई उपस्थिति के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इसी वर्ष करण जौहर की "कभी खुशी कभी ग़म "और के. राघवेंद्र राव द्वारा निर्देशित "आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया" जैसी फिल्मों ने अलग-अलग सामाजिक संसारों में त्योहार के अर्थ को सामने रखा. पहली फिल्म ने पारिवारिक वैभव और बिछड़े संबंधों के पुनर्मिलन को भव्य दृश्यात्मकता के साथ प्रस्तुत किया, जबकि दूसरी ने मध्यवर्गीय घरेलू जीवन की हलचल और आर्थिक सीमाओं के बीच उत्सव की खुशी को जगह दी. दोनों फिल्मों का अंतर इस बात का प्रमाण है कि दीपावली एक ही समय में अलग-अलग वर्गों और जीवन-स्थितियों की अभिव्यक्ति बन सकती है.
"कभी खुशी कभी ग़म का" दीपावली दृश्य आधुनिक हिंदी सिनेमा की सबसे पहचानी जाने वाली उत्सवी छवियों में शामिल हो चुका है. फिल्म के आरंभिक हिस्से में दीपावली की पूजा, रोशनी से सजा विशाल घर और नंदिनी रायचंद की अपने बेटे राहुल के लौटने की प्रतीक्षा एक साथ दिखाई देती है. जया बच्चन द्वारा निभाया गया नंदिनी का चरित्र माँ की उस सहज अनुभूति का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें बेटे की उपस्थिति का आभास केवल आँखों से नहीं, हृदय से होता है. पूजा की थाली, आरती और दरवाजे की ओर उठती दृष्टि मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जिसमें धार्मिक अनुष्ठान मातृत्व की भावनात्मक भाषा बन जाता है.इस दृश्य की लोकप्रियता का कारण केवल उसकी भव्यता नहीं है. उसका वास्तविक केंद्र एक माँ की प्रतीक्षा है. विशाल घर, सुंदर परिधान और सुसज्जित पूजा-स्थल उस भावनात्मक क्षण को अधिक नाटकीय बनाते हैं, लेकिन दृश्य की आत्मा परिवार से बिछुड़ने और फिर मिलने की आकांक्षा में है. भारतीय संस्कृति में दीपावली और घर वापसी के बीच जो संबंध स्थापित किया जाता है, फिल्म उसी सांस्कृतिक स्मृति का उपयोग करती है. भगवान राम के अयोध्या लौटने की कथा से जुड़ी दीपावली की लोकप्रिय कल्पना यहाँ एक आधुनिक पारिवारिक कहानी में नया अर्थ ग्रहण करती है. अब अयोध्या कोई प्राचीन नगर भर नहीं है; वह घर भी है, जहाँ किसी अपने के लौट आने से जीवन फिर से पूर्ण हो सकता है.फिल्म का शीर्षक गीत भी इस दृश्यात्मक संसार का अभिन्न हिस्सा है. रोशनी, आरती, परिवार और प्रतीक्षा का मेल दीपावली को एक भावनात्मक नाट्य में बदल देता है. नंदिनी की आँखों में अपने बेटे के आगमन की आशा दर्शक को बताती है कि उत्सव का अर्थ केवल वर्तमान में मौजूद लोगों के साथ खुश होना नहीं, बल्कि अनुपस्थित लोगों को स्मरण करना और उनके लौटने की कामना करना भी है. परिवार के भीतर दूरी पैदा हो जाने पर दीपावली की चमक उस दूरी को और अधिक महसूस करा सकती है. यही कारण है कि फिल्म का उत्सवी दृश्य अपनी सजावट से आगे बढ़कर स्मृति और भावनाओं की पहचान बन गया.फिल्म की भव्यता का एक सामाजिक पक्ष भी है. रायचंद परिवार का संसार अत्यंत संपन्न है. घर की विशालता, परिधानों की चमक और समारोह की व्यवस्था उस आर्थिक हैसियत को सामने लाती है, जिसे हिंदी सिनेमा ने उदारीकरण के बाद तेजी से अपनाया. परिवार का भावनात्मक संघर्ष वास्तविक है, लेकिन उसकी दृश्यात्मक अभिव्यक्ति एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की जीवनशैली के बीच होती है. इस तरह फिल्म दो समानांतर संसार निर्मित करती है,एक, प्रेम और पारिवारिक संबंधों का; दूसरा, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा का. दर्शक इन दोनों से एक साथ प्रभावित होता है. वह परिवार के पुनर्मिलन की कामना करता है और साथ ही उस भव्य संसार की सुंदरता से आकर्षित भी होता है.
यही लोकप्रिय सिनेमा की शक्ति और उसकी सीमा दोनों है. वह भावनाओं को इस तरह प्रस्तुत करता है कि दर्शक सामाजिक वर्ग की दूरी के बावजूद पात्रों के दुख-सुख से जुड़ सके. लेकिन उसी प्रक्रिया में वह आर्थिक विषमता को सुंदर दृश्यात्मकता के भीतर छिपा भी सकता है. जब दीपावली का आदर्श चित्रण बड़े घरों और महँगी सजावट से जुड़ने लगता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्सव की खुशी का मूल्यांकन घर के आकार और उसकी चमक से किया जाना चाहिए? भारतीय सिनेमा ने इस प्रश्न का एकमात्र उत्तर नहीं दिया, लेकिन उसकी विभिन्न फिल्मों को साथ रखकर देखने पर उत्सव के दो अलग रूप स्पष्ट होते हैं अर्थात एक, जो उपलब्धि और वैभव का प्रदर्शन करता है; दूसरा, जो मानवीय निकटता और साझा संवेदना को महत्त्व देता है.
"आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया" में दीपावली का उत्सवी संसार इससे अलग है. ‘आई है दीवाली, सुनो जी घरवाली’ जैसे गीत में मध्यवर्गीय परिवार की हलचल, घरेलू जीवन का हास्य और सामूहिक आनंद दिखाई देता है. यहाँ उत्सव का केंद्र किसी विशाल महल जैसा घर नहीं, बल्कि ऐसा घरेलू संसार है जिसमें रोजमर्रा की आर्थिक चुनौतियों के बावजूद खुशी के लिए जगह बनाई जाती है. गीत की ऊर्जा और सामूहिकता उसे किसी एक पात्र की भावनाओं तक सीमित नहीं रहने देती; वह परिवार के साझा अनुभव का हिस्सा बन जाता है. बाद के वर्षों में भी यह गीत दीपावली के लोकप्रिय फिल्मी गीतों में गिना जाता रहा है.
इस फिल्म का महत्त्व इसलिए भी है कि वह उत्सव को केवल संपन्नता के साथ नहीं जोड़ती. भारतीय मध्यवर्ग के लिए दीपावली में खर्च और बचत, इच्छाओं और सीमाओं, बाजार और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का अनुभव भी शामिल है. मिठाई खरीदनी है, घर सजाना है, बच्चों के लिए नए कपड़े लेने हैं, रिश्तेदारों को उपहार देने हैं और साथ ही महीने के बजट का ध्यान भी रखना है. इन छोटी-छोटी स्थितियों में हास्य पैदा हो सकता है, लेकिन उनके भीतर मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ भी छिपा होता है. इस तरह की फिल्में बताती हैं कि दीपावली का आनंद हमेशा आर्थिक प्रचुरता से नहीं आता; कई बार सीमित साधनों में मिल-बाँटकर खुशियाँ मनाने से आता है.
यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय सिनेमा की दीपावली वर्गीय अनुभवों के अध्ययन का विषय बन जाती है. एक तरफ ऐसे परिवार हैं जिनके लिए उत्सव एक भव्य सामाजिक आयोजन है, दूसरी तरफ वे परिवार हैं जिनके लिए त्योहार का अर्थ अपने सीमित साधनों में खुशी की तलाश है. सिनेमा इन दोनों को एक ही सांस्कृतिक अवसर के माध्यम से दिखा सकता है. जब इन छवियों की तुलना की जाती है, तब स्पष्ट होता है कि दीपावली एक साझा पर्व होने के बावजूद सभी के लिए एक जैसा अनुभव नहीं है.
2004 की "स्वदेस " में दीपावली का दृश्य और रामायण से जुड़ी सांस्कृतिक छवि एक अलग विमर्श को जन्म देती है. फिल्म का ‘पल पल है भारी’ गीत राम और रावण के प्रसंग को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करता है. इस दृश्य-संसार में परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं है; वह वर्तमान समाज की वास्तविक परिस्थितियों से संवाद करती है. जब बिजली चली जाती है और गाँव के लोग दीयों तथा अन्य उपलब्ध साधनों से रोशनी करते हैं, तब उत्सव की दृश्यात्मकता आधुनिक सुविधाओं पर निर्भर नहीं रह जाती. प्रकाश का अर्थ फिर से सामूहिक प्रयास और मानवीय सहभागिता से जुड़ जाता है. "स्वदेस"का व्यापक संदर्भ ग्रामीण भारत, विकास, वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक जिम्मेदारी से संबंधित है. इस दृष्टि से दीपावली का दृश्य फिल्म के मूल विचारों के साथ संवाद करता है. आधुनिकता का अर्थ केवल बिजली, तकनीक और सुविधाओं का विस्तार नहीं है; वह मनुष्य की सामूहिक क्षमता और जीवन को बेहतर बनाने की इच्छा से भी जुड़ा है. जब अंधकार के बीच लोग मिलकर रोशनी पैदा करते हैं, तब दृश्य का अर्थ तकनीकी सुविधा की अनुपस्थिति से आगे निकल जाता है. वह सहयोग, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक जीवन की संभावनाओं को सामने लाता है.यहाँ दीपावली का सांस्कृतिक प्रतीक एक नए अर्थ में सामने आता है. प्रकाश किसी बाहरी शक्ति से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयत्न से निर्मित अनुभव बन जाता है. यही अर्थ भारतीय समाज के विकास संबंधी प्रश्नों पर भी लागू होता है. किसी गाँव, बस्ती या समुदाय में वास्तविक रोशनी तभी स्थायी बन सकती है, जब सामाजिक और आर्थिक विकास में सबकी भागीदारी हो. फिल्म इस विचार को किसी भाषण के बजाय दृश्य के माध्यम से व्यक्त करती है, और यही सिनेमा की विशिष्ट क्षमता है.
2007 की "तारे ज़मीन पर" ने दीपावली के उत्सवी दृश्य को एक और संवेदनशील अर्थ दिया. फिल्म में ईशान अवस्थी अपने परिवार से दूर बोर्डिंग स्कूल में है. दूसरी ओर परिवार और आसपास का संसार दीपावली की खुशियों में शामिल है. घरों में रोशनी है, लोगों में उत्साह है और बच्चे त्योहार का आनंद ले रहे हैं, लेकिन ईशान के लिए यह समय गहरे अकेलेपन का है. उसके जीवन में मौजूद शैक्षिक कठिनाइयाँ, असुरक्षा और भावनात्मक दूरी उसे उस उत्सव से अलग कर देती हैं, जो सामान्यतः बच्चों के लिए खुशी का अवसर माना जाता है. इस दृश्य की संवेदनात्मक शक्ति उसके विरोधाभास में है. बाहर पटाखों की आवाज और रोशनी का उत्सव है, भीतर एक बच्चा है जो अपने घर, अपने माता-पिता और अपने परिचित संसार से दूर होने की पीड़ा झेल रहा है. फिल्म दर्शक को ईशान की मनःस्थिति के करीब ले जाती है. दीपावली की सामान्य खुशियाँ यहाँ उसके अकेलेपन को कम नहीं करतीं; वे उसे और तीव्र बना देती हैं. जो चीज दूसरों के लिए प्रसन्नता का कारण है, वही उसके लिए अनुपस्थिति का एहसास बन जाती है.यह प्रसंग आधुनिक भारतीय परिवार और बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है. अक्सर त्योहारों को परिवार के भीतर सहज आनंद और एकजुटता का समय मान लिया जाता है, लेकिन हर व्यक्ति का अनुभव ऐसा नहीं होता. जिन बच्चों पर पढ़ाई, अनुशासन या परिवार की अपेक्षाओं का दबाव है, उनके लिए उत्सव भी चिंता और असुरक्षा से मुक्त नहीं होता. किसी बच्चे की कठिनाइयों को समझने के लिए केवल उसके बाहरी व्यवहार को देखना पर्याप्त नहीं है; उसके भावनात्मक संसार को पहचानना भी जरूरी है. "तारे ज़मीन पर" दीपावली की पृष्ठभूमि में इसी संवेदनशीलता को सामने लाती है.इस फिल्म में दीपावली का दृश्य एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी उठाता है. क्या हम उत्सव के समय केवल अपने आनंद पर ध्यान देते हैं, या उन लोगों की भावनाओं को भी समझते हैं जो हमारे आसपास किसी कारणवश अकेले हैं? परिवार, विद्यालय और समाज में संवेदनशीलता का अर्थ यही है कि खुशी की सामान्य परिभाषा को सभी पर लागू न किया जाए. हर व्यक्ति के अनुभव अलग हो सकते हैं और किसी के दुख को केवल इसलिए छोटा नहीं माना जा सकता कि बाहर का संसार उत्सव मना रहा है.
"तारे ज़मीन पर" की इस संवेदना को किस्मत के पुराने गीत से जोड़कर देखना दिलचस्प है. 1943 में एक घर का अंधकार सामाजिक और भावनात्मक विषमता के रूप में सामने आता है; 2007 में एक बच्चे का अकेलापन पारिवारिक दूरी और उसकी आंतरिक पीड़ा के माध्यम से व्यक्त होता है. दोनों के बीच छह दशकों से अधिक का अंतर है, लेकिन उत्सव और निजी दुख के बीच का विरोधाभास बना रहता है. इससे पता चलता है कि भारतीय सिनेमा में दीपावली की संवेदना समय के साथ बदलती जरूर है, लेकिन उसके कुछ मूल भाव जैसे अकेलापन, प्रतीक्षा, वंचना और अपनत्व की तलाश आदि लगातार मौजूद रहते हैं.2010 में प्रदर्शित "आइशा" ने दीपावली के शहरी, संपन्न और फैशन-केंद्रित रूप को सामने रखा. दिल्ली के उच्चवर्गीय सामाजिक परिवेश में रची गई इस फिल्म के उत्सवी दृश्य में सजावट, परिधान, सामाजिक मेलजोल और जीवनशैली की चमक प्रमुख है. यहाँ दीपावली का दृश्य धार्मिक अनुष्ठान की अपेक्षा एक आधुनिक सामाजिक आयोजन का रूप ग्रहण करता है. लोग मिलते हैं, अपने वस्त्रों और व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते हैं, संगीत का आनंद लेते हैं और सामाजिक संबंधों के बीच अपनी पहचान निर्मित करते हैं. "आइशा" जैसी फिल्मों में त्योहार का दृश्य यह बताता है कि शहरी जीवन में उत्सव निजी और सार्वजनिक पहचान के बीच एक सेतु बन सकता है. कौन-सा परिधान चुना गया, घर किस तरह सजाया गया, मेहमानों का स्वागत कैसे हुआ और सामाजिक आयोजन किस स्तर का था ये सब बातें व्यक्ति की जीवनशैली का संकेत बन जाती हैं. इस संसार में दीपावली परंपरा और आधुनिकता के बीच किसी सरल विभाजन का नाम नहीं है. पारंपरिक वस्त्रों और धार्मिक प्रतीकों के साथ आधुनिक फैशन, सामाजिक नेटवर्क और उपभोक्ता संस्कृति मौजूद रहते हैं.
इस बदलाव का एक सकारात्मक पक्ष भी है. त्योहारों की दृश्यात्मकता नए शहरी अनुभवों को जगह देती है और युवा पीढ़ी को अपनी शैली में उत्सव मनाने की स्वतंत्रता मिलती है. लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि उत्सव का सामाजिक अर्थ धीरे-धीरे प्रदर्शन और प्रतिष्ठा से जुड़ सकता है. जब किसी समारोह की सफलता को सजावट, खर्च या परिधान के आधार पर आँका जाने लगे, तब साझा खुशी की जगह प्रतिस्पर्धा ले सकती है. सिनेमा इस प्रवृत्ति को दिखाता भी है और कई बार अपनी चमकदार प्रस्तुति के माध्यम से उसे बढ़ावा भी देता है.इसलिए भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव का अध्ययन करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि पर्दे पर कितनी रोशनी है. यह भी देखना होगा कि उस रोशनी का सामाजिक अर्थ क्या है. क्या वह लोगों को एक-दूसरे के करीब लाती है, या उनके बीच आर्थिक और सांस्कृतिक दूरी को और स्पष्ट करती है? क्या वह परंपरा को जीवित रखती है, या उसे उपभोग की वस्तु में बदल देती है? क्या वह किसी पात्र के मन में आशा पैदा करती है, या उसके अकेलेपन को उजागर करती है? इन प्रश्नों के उत्तर ही किसी दृश्य को सामान्य उत्सवी सजावट से उठाकर अर्थपूर्ण सिनेमाई अभिव्यक्ति में बदलते हैं.दीपावली और हिंदी सिनेमा के संबंध का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष फिल्मी संगीत है. भारतीय समाज में त्योहारों की स्मृति अक्सर ध्वनियों के माध्यम से सुरक्षित रहती है. घरों में गूँजती आरती, शंख की आवाज, बच्चों की खिलखिलाहट और पटाखों की गूँज के बीच फिल्मी गीत एक अलग सांस्कृतिक परत जोड़ते हैं. कुछ गीत किसी विशेष फिल्म की कहानी से निकलकर वास्तविक जीवन के उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं. यह परिवर्तन सिनेमा और समाज के बीच गहरे संबंध का प्रमाण है."आई दीवाली, आई दीवाली’ से लेकर ‘आई है दीवाली, सुनो जी घरवाली’ तक हिंदी फिल्म संगीत ने उत्सव के अलग-अलग भावों को व्यक्त किया है. कहीं सामूहिक उल्लास है, कहीं घर लौटने की प्रतीक्षा, कहीं पुराने समय की स्मृति और कहीं जीवन की कठिनाइयों के बीच खुशी तलाशने का प्रयास. इन गीतों की लोकप्रियता केवल उनकी धुनों या गायकों की आवाज से नहीं बनती; उनका संबंध उन अनुभवों से भी होता है जिन्हें श्रोता अपने जीवन में पहचानते हैं. जब किसी गीत में घर, परिवार और दीयों का उल्लेख होता है, तो वह श्रोता के निजी अनुभवों के साथ जुड़ सकता है. इसीलिए पुराना फिल्मी गीत कई बार नई पीढ़ी के लिए भी भावनात्मक अर्थ ग्रहण कर लेता है.
फिल्मी गीतों की यह यात्रा भारतीय संगीत उद्योग के बदलावों को भी सामने लाती है. पहले गीतों की लोकप्रियता रेडियो, ग्रामोफोन रिकॉर्ड और बाद में कैसेट के माध्यम से बढ़ती थी. अब डिजिटल स्ट्रीमिंग, वीडियो मंचों और सामाजिक माध्यमों ने उनके प्रसार के नए रास्ते खोल दिए हैं. दीपावली के अवसर पर पुराने गीतों के वीडियो फिर से साझा किए जाते हैं, फिल्मी दृश्यों के छोटे अंश प्रसारित होते हैं और नए संगीत-संयोजन पुराने गीतों को समकालीन श्रोताओं तक पहुँचाते हैं. इस तरह किसी फिल्म की मूल रिलीज के दशकों बाद भी उसका उत्सवी दृश्य सांस्कृतिक जीवन में सक्रिय रह सकता है.इस संदर्भ में एक रोचक विरोधाभास भी है कि हिंदी सिनेमा ने दीपावली पर अनेक गीत बनाए, लेकिन सभी गीत उसी तरह स्थायी लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सके जैसी होली के कुछ गीतों को मिली. ‘रंग बरसे’ या ‘होली के दिन’ जैसे गीतों की तुलना में दीपावली के लिए कोई एक ऐसा सर्वमान्य गीत पहचानना कठिन है जो हर पीढ़ी और हर क्षेत्र में समान रूप से उत्सव का अनिवार्य हिस्सा बन गया हो. संगीत और फिल्म इतिहास पर लिखे गए कुछ विश्लेषणों ने भी इस अंतर की ओर ध्यान दिलाया है. इसके पीछे कई संभावित कारण हैं. होली में रंग, नृत्य, शारीरिक गतिविधि और सामूहिक गायन के लिए स्वाभाविक अवसर मौजूद हैं. दीपावली का घरेलू अनुभव अपेक्षाकृत विविध है,पूजा, दीये, मिठाइयाँ, पारिवारिक मिलन, बाजार और आतिशबाजी सब उसके अलग-अलग हिस्से हैं. इन सबको एक ही गीत में समेटना कठिन हो सकता है. इसके अलावा फिल्मी गीतों की लोकप्रियता केवल विषय पर निर्भर नहीं करती; उसकी धुन, फिल्म की सफलता, सितारों की लोकप्रियता, प्रसारण और बाद की सांस्कृतिक स्वीकृति भी महत्त्वपूर्ण होती है. इसलिए दीपावली के गीतों की लोकप्रियता का अध्ययन केवल उनकी संख्या से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक जीवन से किया जाना चाहिए.
फिर भी दीपावली के गीतों का सांस्कृतिक प्रभाव कम नहीं है. वे त्योहार के दृश्यात्मक और भावनात्मक रूप को सुरक्षित रखते हैं. पुराने गीत सुनते हुए एक पीढ़ी को अपना बचपन याद आ सकता है, जबकि नई पीढ़ी उसी गीत के माध्यम से बीते समय की फिल्मी दुनिया से परिचित हो सकती है. इस तरह फिल्मी संगीत एक प्रकार का सांस्कृतिक सेतु बन जाता है, जो अलग-अलग पीढ़ियों के अनुभवों को जोड़ता है.भारतीय सिनेमा की दीपावली पर चर्चा करते हुए क्षेत्रीय फिल्मों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत की सांस्कृतिक विविधता का अर्थ है कि दीपावली के अनुष्ठान, दृश्य और सामाजिक व्यवहार हर जगह एक जैसे नहीं होते. तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली और अन्य भाषाओं का सिनेमा अपने-अपने समाज की परंपराओं के अनुसार त्योहारों को प्रस्तुत करता रहा है. हिंदी फिल्मों में उत्तर भारतीय घरेलू संसार की छवियाँ अधिक दिखाई दे सकती हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा का पूरा उत्सवी अनुभव उससे कहीं व्यापक है.दक्षिण भारतीय फिल्मों में दीपावली की दृश्यात्मकता कई बार स्थानीय रीति-रिवाजों, पारिवारिक संबंधों और प्रादेशिक संगीत परंपराओं के साथ जुड़ती है. तमिल सिनेमा में दीपावली के अवसर पर नए वस्त्र पहनने, परिवार के साथ समय बिताने और स्थानीय सांस्कृतिक व्यवहारों की छवियाँ मिल सकती हैं. मराठी सिनेमा में त्योहार का घरेलू और सामुदायिक पक्ष स्थानीय शहरी तथा ग्रामीण जीवन से जुड़ सकता है. बंगाली फिल्मों में दीपोत्सव की छवि अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों के साथ संवाद करती दिखाई दे सकती है. इन उदाहरणों का महत्त्व किसी एक क्षेत्र को दूसरे से अधिक प्रामाणिक सिद्ध करने में नहीं, बल्कि भारतीय त्योहार की बहुलता को पहचानने में है.
इस विषय पर गंभीर अध्ययन के लिए फिल्मों की सूची बनाना पहला कदम हो सकता है, लेकिन पर्याप्त नहीं. क्षेत्रीय सिनेमा में दीपावली की उपस्थिति का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए विभिन्न भाषाओं की फिल्मों, उनके गीतों, दृश्य-विधान, सामाजिक संदर्भ और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं की तुलना करनी होगी. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि एक साझा सांस्कृतिक पर्व अलग-अलग भाषाई समुदायों में किस तरह भिन्न अर्थ ग्रहण करता है. भारतीय सिनेमा की वास्तविक व्यापकता तभी सामने आएगी, जब हिंदी फिल्मों के साथ क्षेत्रीय फिल्मों की विशिष्टताओं को भी समान गंभीरता से देखा जाएगा.दीपावली का एक अंतरराष्ट्रीय सिनेमाई संदर्भ भी है. भारतीय संस्कृति से जुड़े इस पर्व को विदेशों में बसे भारतीय समुदायों ने अपने सांस्कृतिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखा है. प्रवासी भारतीयों के लिए दीपावली अपने मूल समाज, परिवार और स्मृतियों से जुड़ने का अवसर हो सकती है. हिंदी सिनेमा ने भी प्रवासी भारतीयों के जीवन को कई फिल्मों में प्रस्तुत किया है. ऐसे कथानकों में त्योहार घर और विदेश, परंपरा और आधुनिकता तथा सांस्कृतिक स्मृति और नई सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम बन सकता है.
विदेश में रहने वाले किसी भारतीय परिवार के लिए दीपावली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का अवसर भी है. घर में दीये जलाना, पारंपरिक भोजन तैयार करना, परिवार के साथ मिलना और बच्चों को त्योहार का अर्थ समझाना जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्मृति जीवित रहती है. सिनेमा जब ऐसी छवियाँ प्रस्तुत करता है, तो वह प्रवासी जीवन के सांस्कृतिक अनुभव को पहचानने योग्य रूप देता है. हालांकि हर प्रवासी फिल्म में दीपावली केंद्रीय विषय नहीं होती, लेकिन घर, स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न इस त्योहार की सिनेमाई संभावनाओं को विस्तृत करते हैं.इसी तरह भारतीय फिल्मों के विदेशों में प्रसार ने दीपावली की दृश्यात्मकता को भी अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाया है. भव्य पारिवारिक समारोह, पारंपरिक परिधान, पूजा और रोशनी की छवियाँ भारतीय संस्कृति के परिचित प्रतीक बन सकती हैं. लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है. कोई भी फिल्म किसी पूरे देश या समुदाय का संपूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करती. यदि अंतरराष्ट्रीय दर्शक केवल भव्य हिंदी फिल्मों के माध्यम से भारतीय दीपावली को समझेंगे, तो उन्हें भारत के आर्थिक अंतर, क्षेत्रीय विविधता और साधारण घरेलू जीवन की पूरी तस्वीर नहीं मिल पाएगी. सिनेमा सांस्कृतिक परिचय का प्रभावशाली माध्यम है, लेकिन उसकी छवियों को वास्तविक समाज का एक चयनित रूप समझना चाहिए.
समकालीन दौर में दीपावली के सिनेमाई अर्थ में पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं. आतिशबाजी से होने वाला वायु और ध्वनि प्रदूषण, बच्चों तथा पशुओं की सुरक्षा, वृद्धों और बीमार व्यक्तियों की कठिनाइयाँ तथा सार्वजनिक स्थलों पर कचरे की समस्या ऐसे विषय हैं जिन पर समाज में चर्चा होती रही है. फिल्मों और दृश्य-माध्यमों के पास इन प्रश्नों को मानवीय संदर्भ में प्रस्तुत करने की क्षमता है. वे केवल पटाखों के विरुद्ध उपदेश देने के बजाय यह दिखा सकते हैं कि एक परिवार की खुशी दूसरे व्यक्ति के लिए परेशानी क्यों बन सकती है.दीपावली के दृश्य में दीया और आतिशबाजी दोनों दिखाई दे सकते हैं, लेकिन दोनों का सांस्कृतिक अर्थ एक जैसा नहीं है. दीया धैर्य, निरंतरता और शांत प्रकाश का प्रतीक बन सकता है, जबकि आतिशबाजी क्षणिक चमक और ध्वनि का अनुभव पैदा करती है. सिनेमा इन दोनों के बीच दृश्यात्मक विरोध रच सकता है. एक शांत घर में जलता छोटा-सा दीया कई बार उस दृश्य से अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है जिसमें पूरा आकाश पटाखों से भर जाता है. यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं है; यह इस बात से भी जुड़ा है कि फिल्मकार किस प्रकार के उत्सव को महत्त्व देना चाहता है.भारतीय फिल्मों में दीपावली का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष बच्चों का संसार है. त्योहार बच्चों के लिए नई चीजों, मिठाइयों, छुट्टियों और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर होता है. लेकिन फिल्मों में बच्चों के माध्यम से दीपावली की मासूम खुशी के साथ-साथ उनकी असुरक्षा और वंचना को भी व्यक्त किया जा सकता है. तारे ज़मीन पर इसका उदाहरण है, जहाँ उत्सव की सामूहिक खुशी के बीच एक बच्चे की भावनात्मक स्थिति कथा को गहरी संवेदना देती है. ऐसी फिल्मों से यह समझने में मदद मिलती है कि त्योहार का वास्तविक अर्थ केवल सामाजिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में भी है जो बच्चों की स्मृति का हिस्सा बनते हैं.इसी संदर्भ में दीपावली पर आधारित या दीपावली के दृश्यों वाली फिल्मों का शैक्षिक उपयोग भी संभव है. सिनेमा के विद्यार्थी किसी दृश्य का अध्ययन करते समय प्रकाश-व्यवस्था, रंग, ध्वनि, कैमरे की गति और संपादन के माध्यम से अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया को समझ सकते हैं. समाजशास्त्र के विद्यार्थी परिवार, वर्ग और उपभोग के प्रश्नों पर विचार कर सकते हैं. साहित्य के विद्यार्थी गीतों की भाषा, प्रतीकों और रूपकों का विश्लेषण कर सकते हैं. इस तरह दीपावली का सिनेमाई अध्ययन अनेक विषयों के बीच संवाद स्थापित कर सकता है.
दीपावली का सिनेमाई इतिहास यह भी बताता है कि भारतीय फिल्मकारों ने प्रकाश और अंधकार के प्रतीकों का इस्तेमाल अलग-अलग वैचारिक उद्देश्यों के लिए किया है. कहीं प्रकाश नैतिक विजय का संकेत है, कहीं प्रेम की वापसी का, कहीं पारिवारिक एकता का और कहीं ऐसी सामाजिक विषमता का, जो उत्सव की चमक में भी छिप नहीं पाती. इसी तरह अंधकार हमेशा बुराई का प्रतीक नहीं होता. कभी वह किसी व्यक्ति के दुख, कभी सामाजिक उपेक्षा और कभी स्मृतियों के बोझ को व्यक्त करता है. इन दोनों के बीच का संबंध ही दृश्य को अर्थ प्रदान करता है.
"जंजीर" में दीपावली के बीच घटित हत्या नायक के जीवन में स्थायी अंधकार का प्रवेश कराती है. "वास्तव"में उत्सव की पृष्ठभूमि अपराध और पारिवारिक मूल्यों के बीच संघर्ष को सामने लाती है. "कभी खुशी कभी ग़म में' दीपावली माँ की प्रतीक्षा और बेटे की घर वापसी की आकांक्षा से जुड़ती है. "तारे ज़मीन पर" में वही पर्व एक बच्चे के अकेलेपन को उजागर करता है. इन फिल्मों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि दीपावली का सिनेमाई अर्थ किसी एक धार्मिक या भावनात्मक सूत्र में नहीं बाँधा जा सकता. उसकी शक्ति इस बात में है कि वह जीवन की विपरीत स्थितियों को एक ही दृश्य में उपस्थित कर सकती है.इस दृष्टि से भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव का अध्ययन केवल लोकप्रिय संस्कृति के एक रोचक विषय का अध्ययन नहीं है. यह भारतीय समाज की भावनात्मक संरचना को समझने का भी प्रयास है. परिवार से जुड़ाव, घर लौटने की आकांक्षा, समृद्धि की इच्छा, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक विषमता, नैतिक संघर्ष और अकेलेपन की अनुभूति आदि ये सभी प्रश्न दीपावली के अलग-अलग फिल्मी रूपों में दिखाई देते हैं. सिनेमा इन प्रश्नों को कभी मनोरंजन के भीतर रखता है, कभी सामाजिक यथार्थ के साथ जोड़ता है और कभी संगीत तथा दृश्यात्मकता के माध्यम से ऐसी अनुभूति पैदा करता है जो लंबे समय तक दर्शक की स्मृति में बनी रहती है.आज जब डिजिटल माध्यमों ने फिल्मों को देखने और साझा करने के तरीके बदल दिए हैं, तब दीपावली के पुराने फिल्मी दृश्य एक नई सांस्कृतिक जिंदगी प्राप्त कर रहे हैं. कोई दर्शक कभी खुशी कभी ग़म का दीपावली दृश्य देखकर अपने परिवार को याद करता है, कोई पुराना गीत सुनकर बचपन में लौट जाता है और कोई तारे ज़मीन पर का दृश्य देखकर उन बच्चों के बारे में सोचता है जो उत्सव के बीच भी अकेले रह जाते हैं. इन अलग-अलग प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि फिल्मी दृश्य का जीवन फिल्म की रिलीज के साथ समाप्त नहीं होता. वह दर्शकों की निजी स्मृतियों में प्रवेश करके नए अर्थ अर्जित करता रहता है.हालाँकि समकालीन हिंदी सिनेमा में दीपावली को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मों की संख्या सीमित है, फिर भी यह पर्व लोकप्रिय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण बना हुआ है. आज बड़े बजट की फिल्मों के लिए दीपावली की रिलीज तारीख भी व्यावसायिक दृष्टि से आकर्षक मानी जाती है. त्योहार की छुट्टियाँ, परिवारों के एक साथ फिल्म देखने की संभावना और दर्शकों की बढ़ी हुई मनोरंजन संबंधी सक्रियता इसे फिल्म व्यवसाय के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर बनाती है. इस प्रकार दीपावली का संबंध केवल फिल्मों की कथाओं से नहीं, बल्कि उनके प्रदर्शन और बाजार से भी है.
यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है. जिस त्योहार का मूल सांस्कृतिक अर्थ प्रकाश, मंगल और साझा खुशी से जुड़ा है, वही फिल्म उद्योग के लिए बड़े कारोबार की संभावना भी बन जाता है. त्योहार के अवसर पर फिल्मों का प्रदर्शन, प्रचार अभियान, सितारों की उपस्थिति और दर्शकों की अपेक्षाएँ एक व्यापक व्यावसायिक वातावरण निर्मित करती हैं. इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि सिनेमा एक कला होने के साथ-साथ उद्योग भी है. प्रश्न यह है कि क्या व्यावसायिक चमक के बीच त्योहार की मानवीय संवेदना को सुरक्षित रखा जा सकता है? क्या फिल्मकार दीपावली को केवल आकर्षक दृश्यों और बड़े बाजार के रूप में देखने के बजाय उसके सामाजिक और भावनात्मक अर्थों को भी खोज सकते हैं?
भविष्य के भारतीय सिनेमा के सामने यही रचनात्मक संभावना है. दीपावली पर आधारित किसी नई फिल्म को केवल भव्य घर, सुंदर परिधान, पूजा और आतिशबाजी दिखाने तक सीमित रहने की आवश्यकता नहीं है. वह उन लोगों की कहानी भी कह सकती है जो शहरों में अपने परिवारों से दूर काम करते हैं, उन श्रमिकों की जो दूसरों के घरों को रोशन करते हुए स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताते हैं, उन बच्चों की जो आर्थिक अभाव के कारण उत्सव का पूरा आनंद नहीं ले पाते और उन परिवारों की जो किसी बिछड़े हुए सदस्य की प्रतीक्षा में दीप जलाते हैं. ऐसी कहानियाँ दीपावली को सामाजिक यथार्थ के करीब लाएँगी और उसके सांस्कृतिक अर्थ को अधिक व्यापक बनाएँगी.
इसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं और विभिन्न सामाजिक समुदायों की दीपावली को केंद्र में रखकर भी महत्त्वपूर्ण सिनेमाई प्रयोग किए जा सकते हैं. भारत की विविध परंपराओं को केवल सजावटी दृश्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके भीतर मौजूद स्मृतियों, मान्यताओं और सामाजिक संबंधों के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता है. इससे भारतीय सिनेमा की सांस्कृतिक दृष्टि अधिक व्यापक होगी. साथ ही, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, उपभोग और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे समकालीन प्रश्नों को भी संवेदनशील कहानी कहने की प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है.अंततः भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव की यात्रा मिट्टी के दीये से शुरू होकर भव्य फिल्मी महलों, रंगीन गीतों, भावनात्मक पुनर्मिलनों और सामाजिक विषमता के दृश्यों तक पहुँचती है. इस यात्रा में तकनीक बदली, कैमरे की भाषा बदली, परिवार की छवि बदली और दर्शकों की आकांक्षाएँ भी बदलीं. लेकिन एक प्रश्न लगातार बना रहा कि प्रकाश का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या प्रकाश केवल घर को जगमगाने में है, या किसी अकेले व्यक्ति तक पहुँचने में भी? क्या दीपावली की सफलता महँगी सजावट और बड़े आयोजन में है, या उन संबंधों को फिर से जोड़ने में भी है जो समय और परिस्थितियों के कारण कमजोर पड़ गए हैं? क्या उत्सव का आनंद केवल अपने परिवार के लिए है, या उसमें समाज के वंचित और उपेक्षित लोगों के लिए भी जगह होनी चाहिए?भारतीय सिनेमा की सबसे संवेदनशील दीपावली इन प्रश्नों के भीतर दिखाई देती है. वह हमें बताती है कि प्रकाश का अर्थ केवल अंधकार का अभाव नहीं, बल्कि किसी दूसरे के दुख को पहचानने की क्षमता भी है. जलता हुआ दीया अपने आसपास की जगह को रोशन करता है, लेकिन उसकी लौ का सांस्कृतिक अर्थ तब और गहरा हो जाता है जब वह किसी दूसरे के जीवन में आशा पैदा करे.इसलिए भारतीय सिनेमा में दीपोत्सव का सबसे महत्त्वपूर्ण आख्यान पटाखों की आवाज, महलों की सजावट या असंख्य विद्युत झालरों की चमक में नहीं, बल्कि उस क्षण में छिपा है जब कोई अपने बिछड़े हुए प्रियजन के लौटने की आशा करता है, कोई परिवार सीमित साधनों में खुशी बाँटता है, कोई बच्चा अपने अकेलेपन से बाहर निकलने का रास्ता खोजता है और कोई मनुष्य दूसरों के लिए रोशनी पैदा करने का निर्णय लेता है.
दीपावली का दीया छोटा होता है, लेकिन उसकी लौ अंधकार के विरुद्ध मनुष्य की सबसे पुरानी आकांक्षाओं में से एक का प्रतिनिधित्व करती है. भारतीय सिनेमा ने इसी लौ को कभी प्रेम, कभी स्मृति, कभी प्रतिरोध और कभी सामाजिक संवेदना के रूप में पर्दे पर उतारा है. यही कारण है कि दीपोत्सव का उसका वृतांत केवल त्योहार की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय जीवन के बदलते अर्थों की कहानी भी है. जब तक मनुष्य के जीवन में घर लौटने की इच्छा, रिश्तों को बचाने की कोशिश और अंधकार के बीच रोशनी खोजने की आकांक्षा बनी रहेगी, तब तक भारतीय सिनेमा के लिए दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को समझने और अभिव्यक्त करने का एक जीवंत रूपक बनी रहेगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-




