सिर्फ ‘दुनिया की फैक्ट्री’ नहीं बल्कि अब क्लीन-टेक्नोलॉजी का वैश्विक हब बनकर नया स्वरूप ले रहा चीन

सिर्फ ‘दुनिया की फैक्ट्री’ नहीं बल्कि अब क्लीन-टेक्नोलॉजी का वैश्विक हब बनकर नया स्वरूप ले रहा चीन

प्रेषित समय :19:42:02 PM / Fri, Sep 12th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बीजिंग/नई दिल्ली. चीन अब सिर्फ़ पारंपरिक "दुनिया की फैक्ट्री" नहीं रह गया है, बल्कि तेज़ी से "दुनिया की ग्रीन फैक्ट्री" की पहचान बना रहा है. ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि चीनी कंपनियों ने विदेशों में क्लीन-टेक्नोलॉजी — जैसे बैटरी, सोलर, विंड टर्बाइन और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बनाने वाली फैक्ट्रियों — में अब तक 227 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर दिया है. ऊपरी अनुमान इसे 250 अरब डॉलर तक पहुँचाते हैं.स्पष्ट है कि चीन अपने "ग्रीन ड्रीम" को दुनिया भर में फैला रहा है. यह निवेश जलवायु संकट की लड़ाई को तेज़ कर सकता है, लेकिन यह भी तय करेगा कि कौन-सा देश मालिक बनेगा और कौन सिर्फ़ मज़दूर. भारत और दक्षिण एशिया के लिए यही सबसे बड़ा इम्तहान है—क्या वे केवल बाज़ार बने रहेंगे या सप्लाई चेन में बराबरी की भूमिका निभाएँगे.

2022 से रफ्तार पकड़ता ग्रीन निवेश
असल कहानी 2022 से शुरू होती है. पिछले तीन वर्षों में ही 387 प्रोजेक्ट्स लॉन्च हुए, जो कुल निवेश का 80% से अधिक हैं. सिर्फ़ 2024 में 165 नए प्रोजेक्ट्स घोषित किए गए, जो अब तक का रिकॉर्ड है. पहले चीन का फोकस मुख्यतः सोलर सेक्टर पर था, लेकिन अब पैसा बैटरी मटेरियल, पूरी बैटरी फैक्ट्रियाँ, इलेक्ट्रिक वाहन, चार्जिंग स्टेशन, विंड एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में जा रहा है.

निवेश का वैश्विक नक्शा
एशिया-प्रशांत (ASEAN) अभी भी सबसे बड़ा केंद्र है.

मिडल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका (MENA) का हिस्सा 2024 में अचानक 20% से ऊपर पहुँच गया.

यूरोप बैटरी निर्माण का अहम हब बना हुआ है.

लैटिन अमेरिका और सेंट्रल एशिया भी अब इस मानचित्र पर उभर रहे हैं.

कुछ देश "हॉटस्पॉट" बनकर सामने आए हैं — इंडोनेशिया (निकेल आधारित बैटरी), मोरक्को (कैथोड और ग्रीन हाइड्रोजन), गल्फ देश (सोलर और इलेक्ट्रोलाइज़र), जबकि हंगरी, स्पेन, ब्राज़ील, मिस्र बैटरी और हाइड्रोजन हब के रूप में उभर रहे हैं.

निवेश की बड़ी वजहें
मेज़बान देशों के लोकल मार्केट तक सीधी पहुँच.

तीसरे देशों के बाज़ारों को टारगेट करना.

कच्चे माल तक सीधी आपूर्ति सुनिश्चित करना.

इन प्रोजेक्ट्स का पैमाना छोटा नहीं है—60 से अधिक प्रोजेक्ट्स की लागत 1 अरब डॉलर से अधिक है.

अवसर और चुनौतियाँ
मेज़बान देशों के लिए यह निवेश बड़ा अवसर है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं. भारी-भरकम बैटरी और हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स के लिए टैक्स छूट, सस्ती ज़मीन, लॉन्ग-टर्म फाइनेंस, लोकल वैल्यू एडिशन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अनिवार्य हैं. साथ ही, बिजली ग्रिड, पोर्ट और स्किल्ड लेबर जैसी बुनियादी सुविधाएँ तैयार न होने पर यह निवेश अलग-थलग "आइलैंड" बन सकता है.

भारत और दक्षिण एशिया की स्थिति
भारत के पास धूप, पवन ऊर्जा और विशाल बाज़ार है, लेकिन चीनी कंपनियाँ यहाँ बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स लगाने की बजाय इंडोनेशिया, मोरक्को और यूरोप का रुख कर रही हैं. एक वजह यह है कि भारत चाहता है विदेशी निवेश सिर्फ़ असेंबली लाइन न बने, बल्कि वास्तविक टेक्नोलॉजी और रोजगार यहाँ आएं. लेकिन इसमें जोखिम यह है कि अगर फैसले समय पर नहीं हुए तो भविष्य में भारत को यही टेक्नोलॉजी बाहर से महँगे दामों पर खरीदनी पड़ सकती है.

दक्षिण एशियाई देशों जैसे बांग्लादेश और श्रीलंका बिजली संकट से जूझ रहे हैं और वहाँ मैन्युफैक्चरिंग की बजाय तैयार टेक्नोलॉजी सीधे आयात हो रही है. यानी वे उपभोक्ता हैं, निर्माता नहीं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-