वॉशिंगटन डी.सी. से आई खबर ने पूरे वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने NATO देशों को सीधा संदेश देते हुए कहा है कि जब तक सभी सदस्य देश रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेंगे और चीन पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ नहीं लगाएंगे, तब तक वह रूस पर बड़े पैमाने पर प्रतिबंधों की पहल नहीं करेंगे. यह बयान ऐसे समय पर आया है जब यूक्रेन युद्ध को दो साल से ज़्यादा हो चुके हैं और पश्चिमी देशों की रणनीति बार-बार नई चुनौतियों के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है.
ट्रम्प ने अपने बयान में लिखा कि “मैं रूस पर बड़े प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन यह तभी संभव है जब हर NATO सदस्य देश रूस से तेल खरीदना बंद करे. यह हैरान करने वाला है कि अब तक रूस का तेल खरीदा जा रहा है. यह गठबंधन की एकजुटता के साथ विश्वासघात है.” उन्होंने इसे “शर्मनाक” करार दिया और चुनौती दी—“बस बताओ कब?”
चीन पर टैरिफ की धमकी और युद्ध से जोड़ाव
ट्रम्प ने अपने संदेश में केवल रूस पर निर्भरता खत्म करने की बात नहीं की, बल्कि चीन को भी सीधे तौर पर लपेटे में लिया. उनका कहना था कि चीन पर 50 से 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाना चाहिए और यह टैरिफ तभी हटेगा जब “यह घातक लेकिन बेतुका युद्ध” समाप्त होगा. इस प्रस्ताव के पीछे रणनीति यह है कि चीन रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार और तकनीकी आपूर्ति का बैकडोर है. अगर चीन को आर्थिक रूप से दबाया गया तो रूस की युद्ध मशीनरी जल्दी कमजोर हो जाएगी.
व्हाइट हाउस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि मौजूदा G7 प्राइस कैप रूस के तेल कारोबार को रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुआ है. चीन और भारत जैसे देश अब भी रूस से तेल खरीद रहे हैं और उस तेल को ग्लोबल मार्केट में बेचकर रूस को आर्थिक सहारा दे रहे हैं. ट्रम्प की सोच है कि यदि चीन को टैरिफ के जरिए दबाव में लाया जाए तो रूस की कमर तोड़ना आसान होगा.
यूरोपीय देशों की मुश्किलें
लेकिन सवाल यह है कि क्या NATO देश ट्रंप की इस शर्त को मान पाएंगे? यूरोप के कई देशों के सामने बड़ी चुनौती है. हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देश रूस की द्रुज्बा पाइपलाइन पर पूरी तरह निर्भर हैं. उनकी रिफाइनरियों का ढांचा ही ऐसा है कि वे आसानी से दूसरे स्रोतों से तेल आयात नहीं कर सकते. ऐसे में रूस का तेल छोड़ना उनके लिए लगभग नामुमकिन है.
तुर्की की स्थिति भी अहम है. वह NATO का सदस्य होने के साथ-साथ रूस के कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है. अमेरिकी दबाव के बावजूद अंकारा ने अब तक कोई संकेत नहीं दिया है कि वह इस सप्लाई चेन से बाहर निकलना चाहता है.
घरेलू राजनीति और अमेरिका की रणनीति
अमेरिका में यह पूरा विवाद घरेलू राजनीति से भी जुड़ा है. कांग्रेस फिलहाल रूस पर नए प्रतिबंधों के विधेयक पर बहस कर रही है. ट्रम्प का सख्त रुख रिपब्लिकन पार्टी के कट्टरपंथी धड़े को मज़बूती देता है, जो मानता है कि यूरोप को भी वही दर्द सहना चाहिए जो अमेरिका झेल रहा है.
आलोचकों का कहना है कि चीन पर टैरिफ लगाने से अमेरिका और यूरोप की सप्लाई चेन टूट सकती है. इससे महँगाई बढ़ेगी और आम उपभोक्ता पर बोझ पड़ेगा. चीन भी जवाबी कदम उठा सकता है, जिससे पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था को और झटका लगेगा.
इसके विपरीत, ट्रम्प के समर्थकों का तर्क है कि कठोर कदम उठाए बिना रूस-चीन धुरी को कमजोर करना नामुमकिन है. उनका मानना है कि वैश्विक सुरक्षा का सवाल इतना बड़ा है कि आर्थिक असुविधा को सहन करना ही होगा.
यूक्रेन की नाराज़गी
यूक्रेन के लिए यह स्थिति और भी निराशाजनक है. कीव सरकार का कहना है कि अमेरिका लगातार कड़े प्रतिबंधों को NATO देशों की सहमति से जोड़ देता है, जिससे रूस पर तुरंत दबाव नहीं बन पाता. यूक्रेनी नेताओं का आरोप है कि इस तरह के “शर्तों वाले” कदम युद्ध को लंबा खींच रहे हैं.
आगे की राह
अब सबकी निगाहें अगले हफ्ते होने वाली G7 वित्त मंत्रियों की बैठक पर हैं. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट वहां “राजस्व कटऑफ योजना” पर प्रस्तुति देंगे. इस योजना का उद्देश्य रूस की कमाई के स्रोतों को पूरी तरह खत्म करना है. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि NATO स्तर पर किसी भी तरह का तेल प्रतिबंध सर्वसम्मति से ही पास हो सकता है और इसके लिए महीनों की तैयारी चाहिए.
अगर सहयोगी देश पीछे हटते हैं तो ट्रम्प ने संकेत दिया है कि अमेरिका अकेले भी कदम उठा सकता है. हालांकि यह भी सच है कि भारत और चीन पर सेकेंडरी सैंक्शन की धमकी पहले भी दी गई थी, लेकिन वह कभी लागू नहीं हुई.
भारत और अन्य गैर-NATO देशों पर असर
इस पूरी बहस का असर भारत जैसे गैर-NATO देशों पर भी पड़ सकता है. भारत रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कर रहा है. यदि अमेरिका सेकेंडरी सैंक्शन लगाता है, तो भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन साधना मुश्किल होगा. एक ओर उसे अमेरिका और यूरोप जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ रिश्ते बनाए रखने हैं, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है.
चीन पर टैरिफ की स्थिति में एशियाई बाज़ारों में भी बड़ी हलचल होगी. चीन यदि जवाबी कार्रवाई करता है, तो वैश्विक व्यापार युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है, जिससे भारत समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा.
ट्रम्प का यह बयान NATO और वैश्विक राजनीति दोनों के लिए बड़ा अल्टीमेटम है. यह साफ है कि अमेरिका रूस और चीन पर दोतरफा दबाव बनाना चाहता है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब यूरोप और NATO देश एकजुट होकर कठिन निर्णय लें. सवाल यह है कि क्या यूरोप अपनी ऊर्जा निर्भरता और घरेलू राजनीतिक दबाव को किनारे रखकर इस चुनौती को स्वीकार करेगा?
फिलहाल इतना तय है कि आने वाले हफ्ते NATO और G7 देशों के लिए बेहद अहम साबित होंगे. यदि वे ट्रम्प की शर्तों को मानते हैं तो रूस और चीन दोनों पर वैश्विक दबाव बढ़ेगा. लेकिन अगर वे हिचकिचाते हैं, तो अमेरिका और NATO के बीच अविश्वास गहराएगा, और रूस-चीन धुरी और मज़बूत होकर उभरेगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

