आश्विन मासे शारदीय नवरात्रि तीसरे दिन का शुभ मुहूर्त:-
तिथि:- तृतीया,, बुधवार 24 सितम्बर 2025,,
पूजा का श्रेष्ठ समय:- प्रातः 6:17 बजे से 07:40, Am. बजे तक इस के बाद सुबह 09 बजकर 30 मिनट सें 10 बजकर 45 मिनट तक विशेष मुहूर्त है।
राहुकाल: 12:13 PM से 01:43 PM (इस अवधि में पूजा न करें)
पूजा-विधि:-
1- सुबह उठकर स्नान करें और मंदिर साफ करें।
2- दुर्गा माता का गंगाजल से अभिषेक करें।
3- मैया को अक्षत, लाल चंदन, चुनरी, सफेद और लाल पुष्प अर्पित करें।
4- सभी देवी-देवताओं का जलाभिषेक कर फल, फूल और तिलक लगाएं।
5- प्रसाद के रूप में फल और मिठाई चढ़ाएं।
6- घर के मंदिर में धूपबत्ती और घी का दीपक जलाएं।
7- दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
8 - चंद्रघंटा मां का मंत्र-
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:
दोनों मंत्रो का 108 बार अलग अलग जाप करें।
09 - फिर पान के पत्ते पर कपूर और लौंग रख माता की आरती करें।
10 - अंत में क्षमा प्रार्थना करें।
माँ चंद्रघंटा पूजा का महत्व:-
(1) मानसिक शांति:- इनकी उपासना से मन की अशांति दूर होती है और आंतरिक शक्ति का विकास होता है।
(2)साहस में वृद्धि:- भक्तों को भय से मुक्ति मिलती है और जीवन संघर्षों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।
(3)वैवाहिक सुख:- कुंवारी कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है और विवाहित स्त्रियों का दांपत्य जीवन सुखमय बनता है।
(4) आध्यात्मिक उन्नति:- ध्यान और साधना में सफलता मिलती है, कुंडलिनी जागरण में सहायता मिलती है।
(5) सुरक्षा कवच:- माँ चंद्रघंटा की कृपा से भक्तों को नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से सुरक्षा प्राप्त होती है।
चंद्रघंटा मां का पसंदीदा रंग:- लाल रंग।
चंद्रघंटा मां का पसंदीदा पुष्प:- गुलाब और कमल
चंद्रघंटा मां का पसंदीदा भोग:- दूध की खीर, दूध से बनी मिठाई।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप:-
मां चंद्रघंटा शेरनी पर सवार हैं। उनका शरीर सोने की समान चमकता है। देवी की 10 भुजाएं हैं जिनमें से बाएं चार भुजाओं में उन्होंने त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडलु लिया हुआ है पांचवा हाथ वरद मुद्रा में है माता की अन्य चार भुजाओं में कमल, तीर, धनुष और जप माला है और पांचवा हाथ अभय मुद्रा में है।
1.माँ चंद्रघंटा की कथा
माँ चंद्रघंटा की कथा
बहुत समय पहले असुरराज महिषासुर ने कठिन तपस्या करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया। जब ब्रह्माजी उसके सामने प्रकट हुए, तो महिषासुर ने अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्माजी ने समझाया कि यह संभव नहीं है क्योंकि जो जन्म लेता है उसका अंत होना निश्चित है। तब महिषासुर ने चतुरता से कहा - “हे प्रभु, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों ही हो, क्योंकि मैं स्त्रियों की शक्ति को तुच्छ समझता हूँ।”
ब्रह्माजी ने "तथास्तु" कह दिया। यह वरदान पाकर महिषासुर अभिमानी हो गया और तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा। उसने इन्द्रलोक पर आक्रमण कर देवताओं को परास्त कर दिया। देवराज इन्द्र समेत सभी देवता महिषासुर की शक्ति से भयभीत होकर ब्रह्मा, विष्णु और महादेव की शरण में पहुँचे।
देवताओं ने अपनी व्यथा सुनाई तो तीनों देव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उस समय उनके मुख से एक प्रचंड ऊर्जा निकली, जो तेजोमय अग्नि के समान थी। उसी ऊर्जा से एक देवी का प्राकट्य हुआ, जिनका स्वरूप अलौकिक और दिव्य था। दस भुजाओं से सुशोभित उस देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की आकृति दमक रही थी।
देवी को युद्ध के लिए समर्थ बनाने हेतु सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र भेंट किए। भगवान शंकर ने उन्हें त्रिशूल प्रदान किया, भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र अर्पित किया, इन्द्रदेव ने एक विशेष घंटा भेंट किया, जिसकी ध्वनि से शत्रु भयभीत हो जाते थे, सूर्यदेव ने अपना तेज, तलवार और सिंह दिया। इस तरह मां चंद्रघंटा स्वरूप का प्रादुर्भाव हुआ।
माँ चंद्रघंटा ने सिंह पर आरूढ़ होकर रणभूमि में प्रवेश किया। उनके आते ही देवी की घंटियों से उत्पन्न ध्वनि से सम्पूर्ण ब्रह्मांड गूंज उठा। इस दिव्य नाद से असुरों का हृदय कांप उठा और वे भयभीत हो गए। महिषासुर और माँ चंद्रघंटा के बीच भीषण युद्ध हुआ। माँ चंद्रघंटा ने अपने शंख, धनुष, तलवार, गदा और त्रिशूल से असंख्य असुरों का संहार किया। अंततः माँ ने महिषासुर का भी वध कर तीनों लोकों को उसके अत्याचार से मुक्त कराया।
माँ चंद्रघंटा की कथा यह संदेश देती है कि चाहे दुष्ट कितना भी बलवान क्यों न हो, धर्म और शक्ति से युक्त माता सदैव उसे परास्त करती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जो साधक भय, शत्रु या नकारात्मक शक्तियों से परेशान रहते हैं, उनके लिए माँ चंद्रघंटा की आराधना अत्यंत कल्याणकारी है। ऐसा माना जाता है कि माँ चंद्रघंटा अपने भक्तों के हर संकट का निवारण करती हैं और उन्हें जीवन में सफलता तथा सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
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Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

