नई दिल्ली/लखनऊ . भारतीय रेलवे, जो देश की जीवन रेखा कहलाती है, हाल के दिनों में अपनी यात्री सुरक्षा सेवाओं के लिए नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली शिकायत प्रणाली पर उठे गंभीर सवालों के कारण आलोचना के केंद्र में है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) और अन्य मंचों पर #RailYatriSuraksha हैशटैग के साथ यात्रियों का गुस्सा फूट पड़ा है। यह गुस्सा किसी एक घटना पर नहीं, बल्कि पिछले कुछ महीनों में घटी ऐसी अनेक दुखद घटनाओं की प्रतिक्रिया है, जिन्होंने यात्रियों के मन में यह डर बैठा दिया है कि शिकायत करना, समस्या के समाधान के बजाय, मुसीबत को न्योता देना है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि रेलवे की शिकायत प्रणाली शिकायतकर्ता की गोपनीयता बनाए रखने में विफल साबित हो रही है, जिससे वेंडर या स्टाफ द्वारा शिकायतकर्ता पर पलटवार (Retaliation) का खतरा बढ़ गया है।
इस ट्रेंडिंग असंतोष को हवा देने वाली कई प्रमुख घटनाएं हैं, जिनमें हाल ही में हुई जबलपुर रेलवे स्टेशन की वेंडर मारपीट की घटना सबसे ताज़ा है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद, रेलवे प्रशासन ने वेंडर पर सख्ती दिखाई, लेकिन यात्रियों ने तुरंत यह सवाल उठा दिया कि अगर यह वीडियो वायरल न होता और किसी यात्री ने केवल हेल्पलाइन 139 पर शिकायत की होती, तो क्या उस वेंडर को इतनी आसानी से पकड़ा जा सकता था? कई यूजर्स ने अपने पुराने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि वेंडरों ने शिकायत के बाद उन्हें ट्रेन में ही धमकाया या उनके सामान को नुकसान पहुँचाने की धमकी दी। यह साफ दर्शाता है कि शिकायत दर्ज होते ही, शिकायतकर्ता की पहचान किसी न किसी स्तर पर लीक हो जाती है।
इसी तरह की एक और घटना उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख रूट पर घटी थी, जहाँ एक यात्री ने ट्रेन में खराब खाने की गुणवत्ता की शिकायत की थी। यात्री ने बाद में दावा किया कि शिकायत दर्ज होने के कुछ ही घंटों बाद, संबंधित कैटरिंग स्टाफ और वेंडर उसके कोच में आए और उससे बहस की। यात्री ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके बताया कि स्टाफ को यह कैसे पता चला कि शिकायत किस यात्री ने की है और वह किस सीट पर बैठा है? इस घटना ने यह धारणा पुख्ता कर दी कि रेलवे की शिकायत निवारण प्रक्रिया में कोई गंभीर खामी है, जिससे शिकायतकर्ता का विवरण आसानी से उन लोगों तक पहुँच जाता है जिनके खिलाफ शिकायत की गई है।
गोपनीयता के उल्लंघन का यह डर केवल वेंडरों तक सीमित नहीं है। कई यात्रियों ने ट्रेनों में टिकट जाँच कर्मचारियों (TTE) या सुरक्षा कर्मियों के दुर्व्यवहार के खिलाफ की गई शिकायतों के बाद भी ऐसी ही स्थिति का सामना करने की बात कही है। एक यात्री ने एक्स पर साझा किया कि TTE के खिलाफ अभद्र व्यवहार की शिकायत के बाद, उसे अगले स्टेशन पर अनावश्यक रूप से रोका गया और बेवजह की पूछताछ में फँसाया गया, जिसे उसने TTE द्वारा शिकायत का बदला लेने का प्रयास बताया। ये सारी घटनाएं मिलकर एक ऐसा माहौल बना रही हैं जहाँ यात्री अपनी शिकायतें करने से कतरा रहे हैं, जिससे ट्रेन में सुरक्षा और सेवा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
रेलवे ने अपनी 'रेल मदद' (Rail Madad) जैसी एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली को पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई के लिए डिज़ाइन किया है। हालांकि, जमीन पर इसका कार्यान्वयन अक्सर विफल रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही शिकायत किसी डिवीजनल कंट्रोल रूम या संबंधित ऑन-बोर्ड स्टाफ को फॉरवर्ड की जाती है, शिकायतकर्ता का नाम, कोच नंबर और सीट नंबर भी आवश्यक रूप से साझा हो जाता है ताकि स्टाफ मौके पर जाकर कार्रवाई कर सके। लेकिन यहीं पर गोपनीयता का उल्लंघन होता है। वेंडर या स्टाफ इस जानकारी का दुरुपयोग करके शिकायतकर्ता को डराते-धमकाते हैं।
यात्रियों की मांग स्पष्ट है: रेलवे को एक ऐसी फिल्टर प्रणाली लागू करनी चाहिए जो शिकायत की प्रारंभिक जांच के दौरान शिकायतकर्ता की पहचान को एनक्रिप्ट रखे या केवल बहुत वरिष्ठ पर्यवेक्षकों तक सीमित रखे। कार्रवाई शुरू करने से पहले, अधिकारी को मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लेना चाहिए, न कि शिकायतकर्ता का विवरण तुरंत आरोपी कर्मचारी को सौंप देना चाहिए।
सोशल मीडिया पर उठ रहे इस सामूहिक रोष को रेलवे को एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं; यह करोड़ों नागरिकों के भरोसे का संकट है। यदि रेलवे अपनी शिकायत प्रणाली की विश्वसनीयता और शिकायतकर्ता की गोपनीयता सुनिश्चित नहीं करता है, तो यात्री शिकायत करना बंद कर देंगे और अनैतिक वेंडर व कर्मचारी बेखौफ होकर अपनी मनमानी करते रहेंगे, जिसका सीधा असर देश की सबसे बड़ी परिवहन सेवा की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ेगा। रेलवे को इस बढ़ते अविश्वास को दूर करने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

