एमपी हाईकोर्ट ने हाईवे पर शराब की दुकानों के संचालन को लेकर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस थमाया

एमपी हाईकोर्ट ने हाईवे पर शराब की दुकानों के संचालन को लेकर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस थमाया

प्रेषित समय :19:17:05 PM / Fri, Nov 21st, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने आज एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मामले में केंद्र और राज्य सरकार दोनों से जवाब तलब करते हुए एक बड़ा कदम उठाया है. यह मामला प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के किनारे स्थित शराब की दुकानों से जुड़ा है, जो सीधे तौर पर सड़क सुरक्षा और लाखों यात्रियों के जीवन से संबंधित है. न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में किसी भी तरह की ढील बर्दाश्त नहीं करेगा और इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर हो रही बहस और जनसामान्य की चिंता को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, जहाँ यह खबर दिन भर ट्रेंडिंग टॉपिक बनी रही.

न्यायमूर्ति की पीठ ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए यह नोटिस जारी किया, जिसमें याचिकाकर्ता ने यह दलील दी है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, प्रदेश भर के मुख्य मार्गों पर शराब की दुकानें परोक्ष रूप से संचालित हो रही हैं. इन दुकानों को भले ही सरकारी कागजों में हाईवे से कुछ दूरी पर दर्शाया गया हो, लेकिन उनकी दृश्यता और पहुंच मार्ग के बिल्कुल किनारे से है. कई मामलों में, दुकानों को हाईवे से सटाकर बनाई गई सर्विस रोड या एक्सेस रोड पर स्थानांतरित कर दिया गया है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है. याचिका में साफ तौर पर कहा गया है कि राजस्व के लालच में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के ऐतिहासिक फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए कई प्रशासनिक और नीतिगत हेरफेर किए हैं, जिसका सीधा परिणाम सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के रूप में सामने आ रहा है.

कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए गृह मंत्रालय (भारत सरकार) और मुख्य सचिव (मध्य प्रदेश सरकार) समेत आबकारी विभाग के प्रमुख अधिकारियों को नोटिस जारी किया है. न्यायालय ने सख्त लहजे में निर्देश दिए हैं कि सभी संबंधित अथॉरिटीज तीन सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत और तथ्यात्मक जवाब दाखिल करें. इस जवाब में उन्हें स्पष्ट करना होगा कि हाईवे किनारे शराब की बिक्री को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और वे कौन सी नीतियां हैं जिनके तहत इन दुकानों को मुख्य मार्गों के इतने करीब संचालित करने की अनुमति दी जा रही है. कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सड़क सुरक्षा के लिए शराब की दुकानों को राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से दूर रखने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि शराब पीकर वाहन चलाने (ड्रंकन ड्राइविंग) की घटनाओं में कमी आए, लेकिन मौजूदा स्थिति इस उद्देश्य को विफल कर रही है.

याचिकाकर्ता के वकील ने सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने कई आंकड़े पेश किए, जिनमें बताया गया कि पिछले कुछ वर्षों में हाईवे पर होने वाली गंभीर दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिसका एक प्रमुख कारण इन दुकानों के कारण होने वाली असावधानी और दुर्घटना के बाद मदद मिलने में देरी होना भी है. उन्होंने तर्क दिया कि जब तक शराब की दुकानें पूरी तरह से आबादी वाले क्षेत्रों या मुख्यमार्गों से काफी दूर नहीं होंगी, तब तक सड़क पर शराब पीकर वाहन चलाने वालों की संख्या कम करना मुश्किल होगा. उच्च न्यायालय ने अब इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी है और पूरे प्रदेश की निगाहें अब केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले जवाब पर टिकी हुई हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकारें किस आधार पर इन दुकानों के संचालन को सही ठहराती हैं, या फिर कोर्ट के दबाव में कोई बड़ा नीतिगत बदलाव करती हैं. यह न्यायिक हस्तक्षेप मध्य प्रदेश में सड़क सुरक्षा नीतियों के क्रियान्वयन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-