छत्तीसगढ़ के जंगलों में दशकों की दहशत टूटी, 41 नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण, सुरक्षा अभियान की सबसे बड़ी सफलता

छत्तीसगढ़ के जंगलों में दशकों की दहशत टूटी, 41 नक्सलियों का सामूहिक आत्मसमर्पण, सुरक्षा अभियान की सबसे बड़ी सफलता

प्रेषित समय :20:28:28 PM / Wed, Nov 26th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बीजापुर. छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के घने जंगलों में बुधवार का दिन इतिहास बन गया। लंबे समय से नक्सल गतिविधियों से दहशत में जी रहे इस क्षेत्र में पुलिस और प्रशासन के लिए यह बड़ी उपलब्धि रही कि बीजापुर में एक ही दिन में 41 सक्रिय और वांछित नक्सलियों ने हथियार डाल दिए। नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में इस तरह का सामूहिक आत्मसमर्पण बेहद कम देखने को मिलता है और विशेषज्ञ इसे माओवाद की कमजोर होती पकड़ का सबसे स्पष्ट संकेत मान रहे हैं। एक साथ इतने बड़े समूह द्वारा आत्मसमर्पण किए जाने से सुरक्षा बलों को न सिर्फ मनोबल मिला है बल्कि यह भी साफ हुआ है कि जंगलों में दशकों से कायम डर का किला धीरे-धीरे ध्वस्त हो रहा है।

बुधवार दोपहर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले इन 41 नक्सलियों में से अधिकांश पर भारी इनाम घोषित था। कुल मिलाकर इन पर 1 करोड़ 19 लाख रुपये का इनाम था। इनमें 39 सदस्य ऐसे थे जो माओवादी संगठन के दक्षिण सब-जोनल ब्यूरो से जुड़े थे—यह वही इकाई है जिसने सालों तक दक्षिण बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा और तेलंगाना बॉर्डर के अनेक इलाकों में नक्सल नेटवर्क को मजबूती दी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक संगठन की यह इकाई न केवल रणनीतिक गतिविधियों बल्कि बड़े हमलों की प्लानिंग और ग्रामीण क्षेत्रों को दबाव में रखने के लिए जिम्मेदार रही है। ऐसे में इस इकाई से जुड़े बड़े कैडरों द्वारा आत्मसमर्पण को माओवादी नेतृत्व के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि सरेंडर करने वालों में 29 पुरुष और 12 महिलाएं शामिल हैं। ये सभी अलग-अलग बटालियनों, कंपनियों और मिलिशिया यूनिट्स में सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। कई महिला कैडर भी वर्षों से जंगलों में बड़े रोल निभा रही थीं, जिन्होंने अब हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया है। इनमें मंगली माडवी, पाण्डो मडकम, जमली कडियम और जोगी मडकम जैसे नाम शामिल हैं, जिन पर दो लाख से लेकर आठ लाख रुपये तक के इनाम घोषित थे। प्रमुख पुरुष कैडरों में पण्डरू हपका उर्फ मोहन, बण्डी हपका, लक्खू कोरसा और बदरू पुनेम जैसे कुख्यात नाम शामिल हैं, जिन पर भी आठ-आठ लाख रुपये तक की इनाम राशि थी। यह वे लोग थे जो पीएलजीए बटालियन नंबर-01 और अन्य अहम यूनिट्स में कोर भूमिका निभाते रहे हैं।

इन सभी ने आत्मसमर्पण करते हुए न सिर्फ हिंसक विचारधारा का त्याग किया बल्कि भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताया। सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार जंगलों में लगातार बढ़ रहे दबाव, विकास कार्यों की पहुँच और स्थानीय समुदाय में नक्सलियों के प्रति घटते समर्थन ने इस फैसले को प्रभावित किया। कई नक्सलियों ने स्वीकार किया कि उन्हें अब किसी भविष्य की उम्मीद नहीं नजर आ रही थी—न नये कैडर मिल रहे थे और न ही स्थानीय लोग पहले जैसी मदद कर रहे थे। लगातार सघन हो रहे सुरक्षा अभियानों ने उन्हें समझा दिया कि आगे की राह केवल मुख्यधारा में लौटने की ही है।

राज्य सरकार ने सरेंडर पॉलिसी के तहत सभी नक्सलियों को कानूनन प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुनर्वास योजना का लाभ देने का आश्वासन दिया है। पुलिस ने बताया कि दस्तावेजों की जांच और विधिक सत्यापन के बाद प्रत्येक कैडर को 50,000 रुपये की तत्काल आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसके बाद पुनर्वास नीति के अनुसार रोजगार, सुरक्षा और समाज में पुनर्स्थापना से जुड़े लाभ भी प्रदान किए जाएंगे। ज्यादातर कैडर स्वास्थ्य समस्याओं, परिवार से वर्षों की दूरी और लगातार सुरक्षा बलों के दबाव जैसे कारणों से आत्मसमर्पण की ओर बढ़े।

नक्सल प्रभावित इलाकों में यह साल सुरक्षा एजेंसियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में अब तक 560 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, 528 गिरफ्तार हुए हैं और 144 मुठभेड़ों में मारे गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ सुरक्षा बलों की रणनीति का नतीजा नहीं है बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बदलाव हो रहा है। गांवों में विकास कार्यों के बढ़ने, सड़क और संवाद व्यवस्था के बेहतर होने और सरकारी योजनाओं की पहुँच बढ़ने से ग्रामीणों के भीतर यह भावना मजबूत हुई है कि हिंसा से समाधान नहीं बल्कि विनाश ही मिलता है।

बीजापुर में हुए इस सामूहिक आत्मसमर्पण को स्थानीय स्तर पर भी बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। वर्षों से नक्सलियों की धमकियों और बंदूकों की छाया में जी रहे ग्रामीण अब अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई ग्राम पंचायतों ने इसे "शांति की नई शुरुआत" बताते हुए उम्मीद जताई है कि आने वाले दिनों में और भी कई नक्सली हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होंगे।

अभी भी जंगलों में नक्सलियों के कुछ गुट सक्रिय हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को भरोसा है कि संगठन की अंदरूनी कमजोरियां और लगातार बढ़ता दबाव जल्द ही उन्हें भी आत्मसमर्पण की ओर ले जाएगा। बीजापुर में 41 नक्सलियों के सरेंडर ने पूरी तस्वीर बदल दी है—यह घटना न केवल सुरक्षा बलों की बड़ी जीत है बल्कि उन परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है जिन्होंने लंबे समय से हिंसा की मार झेली है।

छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह दिन एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। दशकों से जंगलों में पसरी दहशत टूट रही है और लोकतंत्र की रोशनी उन इलाकों तक पहुँचने लगी है जहाँ कभी सिर्फ बंदूक की आवाजें ही सुनी जाती थीं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-