जबलपुर. महाकौशल के सिवनी और मंडला जिलों को भारत में सबसे बड़े सिंघाड़ा उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है, लेकिन आज ये जिले एक ऐसे आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं जिसने यहां के हजारों किसानों के सामने भुखमरी का खतरा खड़ा कर दिया है. सिंघाड़ा, जिसे आयुर्वेद में बलवर्धक और व्रत के दौरान उपयोग होने वाला 'सुपर फूड' माना जाता है, अब जबलपुर की सबसे बड़ी मंडी में मात्र $15$ रुपए प्रति किलो के पानी के मोल बिक रहा है. इस भारी गिरावट का सीधा कारण अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए $50$ प्रतिशत तक के उच्च टैरिफ को माना जा रहा है, जिसने सिंघाड़े के निर्यात चक्र को पूरी तरह तोड़ दिया है और किसानों को अपनी सालों की मेहनत पर ताला लगाने को मजबूर कर दिया है.
जबलपुर की निवाड़ गंज सब्जी मंडी, जो सिवनी, मंडला और कटनी जैसे क्षेत्रों से आने वाले सिंघाड़े का देश की सबसे बड़ी ट्रेडिंग मंडी है, इन दिनों उदासी और मंदी की शिकार है. ट्रेडिंग करने वाले राजीव यादव बताते हैं कि पिछले साल तक कच्चे सिंघाड़े का दाम $40$ से $70$ रुपए प्रति किलो तक था, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता था. इस साल, उत्पादन भले ही अच्छा न हुआ हो, लेकिन मांग में अत्यधिक कमी के चलते दाम $15$ रुपए प्रति किलो पर टिक गए हैं. राजीव के अनुसार, जबलपुर से यह सिंघाड़ा कोलकाता, गुजरात और मुंबई तक जाता था. गुजरात में कुछ फैक्ट्रियां इसकी प्रोसेसिंग कर इसे प्रोसेस्ड फूड के रूप में बड़े पैमाने पर अमेरिका निर्यात करती थीं. अमेरिकी टैरिफ के कारण उन फैक्ट्रियों का काम ठप हो गया है, जिसके चलते सिंघाड़े के बड़े खरीददार गायब हो गए हैं और बाजार में मांग शून्य हो गई है.
सिंघाड़े की खेती को कृषि क्षेत्र में सबसे कठिन और हुनर वाली खेती माना जाता है. जबलपुर के अशोक बर्मन जैसे किसान, जो चालीस साल से इस काम से जुड़े हैं, बताते हैं कि यह पूरे साल की मेहनत है. मकर संक्रांति पर बीज अंकुरित कर, उसे कम से कम चार फीट गहरे पानी वाले तालाबों की जमीन में रोपा जाता है. किसान अशोक पूरे दिन एक छोटी नाव में बेलों को सीधा करने, उलझन सुलझाने और देखभाल में लगे रहते हैं, जो अक्टूबर में फल देना शुरू करता है. अशोक बर्मन की फिक्र साफ झलकती है, "पिछले साल मुनाफा हुआ था, लेकिन इस साल लागत भी नहीं निकल रही. अब यह पूरे साल की मेहनत हम कैसे वसूल करेंगे."
मंडला से सिंघाड़ा बेचने आए आदर्श कुसमरिया की कहानी भी दर्दनाक है. आईटीआई डिप्लोमा और पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करने के बावजूद, नौकरी न मिलने पर उन्होंने पुश्तैनी सिंघाड़े की खेती शुरू की थी. आदर्श बताते हैं कि इस खेती में न केवल मेहनत बहुत है, बल्कि लागत भी बढ़ती जा रही है, क्योंकि सिंघाड़ा उत्पादन के लिए तालाब या तो मालगुजार से महंगे किराए पर लेने पड़ते हैं या सरकारी तालाबों को किराए से लेना पड़ता है, क्योंकि मछली पालन वाले तालाब में सिंघाड़ा नहीं होता. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बैंक इसे 'तकनीकी खेती' नहीं मानते, जिसके चलते सिंघाड़ा किसानों को कोई सरकारी मदद या लोन नहीं मिलता.
सिंघाड़े की खेती करने वाले $1000$ से अधिक किसान केवल जबलपुर क्षेत्र में हैं, और उनकी पुश्तैनी आजीविका अब खतरे में है. आदर्श कुसमरिया ने चेतावनी दी है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो उन्हें और उनके जैसे हजारों किसानों को यह खेती बंद करके कोई दूसरा काम ढूंढना पड़ेगा.
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में कई दलदली और जल-भराव वाले इलाके हैं, खासकर जबलपुर के आसपास, जहां दूसरी कोई फसल उगाना कठिन है, लेकिन सिंघाड़ा सदियों से यहां की भौगोलिक स्थिति के लिए सबसे अनुकूल रहा है. जबलपुर के सिंघाड़े की गुणवत्ता इतनी उच्च है कि गुजरात के व्यापारी राजेंद्र भारी भाड़ा देने के बावजूद यहीं से खरीददारी करते हैं.
किसान और व्यापारी दोनों ही सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं. उनका कहना है कि जिस तरह मखाने (फॉक्स नट) के लिए सरकार ने प्रमोशन और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर ध्यान दिया है, उसी तरह सिंघाड़े पर भी शोध और प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की जरूरत है. सिंघाड़ा सिर्फ एक फल नहीं है; यह बलवर्धक सुपर फूड है जो सही प्रोत्साहन मिलने पर हजारों लोगों को रोजगार दे सकता है और देश को निर्यात से अच्छा खासा राजस्व भी दिला सकता है. लेकिन फिलहाल, अमेरिकी टैरिफ का सीधा खामियाजा भारत के सिंघाड़ा किसान भुगत रहे हैं और उनकी मेहनत पानी के मोल बिक रही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

