जबलपुर। शिक्षा की पवित्र दीवारों के भीतर मासूमों को किस हद तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी जा सकती है, इसका भयावह उदाहरण जबलपुर के प्रतिष्ठित अंजुमन इस्लामिया स्कूल में सामने आया है, जिसने समूचे शहर और अभिभावक वर्ग को स्तब्ध कर दिया है। तीन नन्ही बच्चियों को स्कूल की पहली मंजिल की संकरी बालकनी पर, खतरनाक तरीके से हाथ ऊपर करके लगभग आधे घंटे तक खड़े रहने की सजा देने का मामला सामने आने के बाद जबरदस्त राजनीतिक और सामाजिक उबाल आ गया है। इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया, जिसने न केवल स्कूल प्रबंधन की क्रूरता को बेनकाब किया, बल्कि शिक्षा संस्थानों में बच्चों के प्रति असंवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अल्पसंख्यक मोर्चा के महामंत्री मुजम्मिल अली ने शनिवार, 6 दिसंबर 2025 को सुबह ठीक 10 बजे जिला कलेक्टर से मुलाकात की और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करने की मांग की। महामंत्री अली ने कलेक्टर के सामने अपनी शिकायत में स्पष्ट किया कि स्कूल प्रबंधन ने जिस तरह की अमानवीय और अपमानजनक सजा बच्चियों को दी है, वह न सिर्फ बच्चों के अधिकारों का हनन है, बल्कि पूरी तरह से अवैधानिक और असांविधानिक है। यह कृत्य उन सभी नियमों और कानूनों का उल्लंघन है जो स्कूलों में बच्चों को शारीरिक या मानसिक दंड देने पर रोक लगाते हैं। वायरल वीडियो में बच्चों की बेबसी साफ दिखाई देती है, जो उनके कोमल मन पर एक गहरा और स्थायी घाव छोड़ सकती है।
शिकायत में कहा गया है कि बच्चियों को इस तरह की सजा देने से उनके मन में स्कूल के प्रति एक गहरा डर बैठ जाएगा, जिसका नकारात्मक असर उनकी शिक्षा और व्यक्तित्व विकास पर पड़ना तय है। बच्चों को खुले आसमान के नीचे, ऊंचाई पर, हाथ ऊपर करके खड़ा करना एक तरह का सार्वजनिक अपमान भी है, जो शिक्षा के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। बच्चों के अभिभावकों और आम नागरिकों में इस घटना को लेकर तीव्र आक्रोश है। लोगों का कहना है कि अगर बच्चों से कोई गलती हुई भी थी, तो भी उन्हें डांटने या समझाने के कई तरीके हो सकते थे, लेकिन इस तरह की प्रताड़ना देना सीधे तौर पर बाल अधिकारों का उल्लंघन है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोग इस स्कूल और संबंधित शिक्षिका के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, ताकि यह एक नज़ीर बन सके और भविष्य में कोई भी शिक्षण संस्थान ऐसा कृत्य करने की हिम्मत न जुटा सके।
कलेक्टर कार्यालय में शिकायत सौंपने के बाद, महामंत्री मुजम्मिल अली ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बच्चों को इस तरह की सजा देने वाले शिक्षकों को तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए और स्कूल प्रबंधन पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंजुमन इस्लामिया स्कूल एक प्रतिष्ठित संस्थान है और ऐसे संस्थान से इस तरह की बर्बरतापूर्ण घटना सामने आना निंदनीय है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेगा। इस शिकायत के बाद जिला कलेक्टर ने मामले का तुरंत संज्ञान लिया और जिला शिक्षा अधिकारी को घटना की गहन और त्वरित जांच करने के आदेश दिए हैं। कलेक्टर ने कहा है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर, जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
इधर, जिला शिक्षा विभाग ने भी मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एक जांच दल का गठन किया है, जिसने तत्काल स्कूल का दौरा किया। DEO कार्यालय से जारी प्रारंभिक बयान में बताया गया है कि जांच टीम ने स्कूल के शिक्षकों, प्रबंधन और प्रत्यक्षदर्शी छात्रों के बयान दर्ज किए हैं। जांच टीम स्कूल प्रबंधन से यह भी जानना चाहती है कि सजा देने वाली शिक्षिका कौन थी, सजा किस नियम के तहत दी गई और बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल प्रबंधन के क्या मापदंड हैं। शिक्षा विभाग ने यह बात दोहराई है कि किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक दंड शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है और इसका उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है, जिसमें स्कूल की मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है।
हालांकि, स्कूल प्रबंधन ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत बयान जारी नहीं किया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, प्रबंधन ने आंतरिक रूप से सफाई दी है कि बच्चों को यह सजा कथित तौर पर होमवर्क पूरा न करने के कारण दी गई थी। उनका दावा है कि इस घटना को अत्यधिक तूल दिया जा रहा है और वे बच्चों को परेशान करने का इरादा नहीं रखते थे। यह भी बताया गया है कि संबंधित शिक्षिका को मौखिक चेतावनी दी गई है। लेकिन यह सफाई जनता के आक्रोश को शांत करने में नाकाम साबित हो रही है, क्योंकि सवाल केवल सजा देने का नहीं, बल्कि सजा देने के तरीके और बच्चों की सुरक्षा को खतरे में डालने का है।
यह घटना जबलपुर के अभिभावकों के मन में एक गहरा डर पैदा कर रही है, जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए निजी स्कूलों में भेजते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि स्कूल की फीस और प्रतिष्ठा के बावजूद, अगर उनके बच्चों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार होता है, तो वे किसके पास न्याय के लिए जाएंगे। यह पूरा मामला अब न्यायिक जांच की ओर बढ़ रहा है और सभी की निगाहें जिला कलेक्टर और शिक्षा विभाग की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। लोगों को उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले में नजीर पेश करते हुए ऐसी कार्रवाई करेगा कि आगे कोई भी स्कूल बच्चों के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार करने की हिम्मत न करे। शिक्षा के मंदिर में मासूमों का उत्पीड़न किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

