16 दिसंबर 2025, मंगलवार के दिन पौष मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि का शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए कई महत्वपूर्ण घटनाएँ एक साथ घटित हो रही हैं, जो धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व रखती हैं।
सबसे पहले, उन सभी भक्तों के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है जिन्होंने 14-15 दिसंबर को सफला एकादशी का उपवास रखा था। एकादशी व्रत का पारण (व्रत तोड़ना) द्वादशी तिथि को किया जाता है, और पंचांग के अनुसार 16 दिसंबर 2025 को व्रत पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 07:05 बजे से 09:16 बजे तक निर्धारित किया गया है। भक्तों को इसी शुभ समय के भीतर पारण करके अपने व्रत को पूर्ण करना चाहिए।
इसी के साथ, आज का दिन ज्योतिषीय जगत में एक बड़े परिवर्तन का साक्षी बनेगा। नवग्रहों के राजा सूर्य देवता, दोपहर 01:50 बजे वृश्चिक राशि को छोड़कर देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु में प्रवेश कर जाएंगे। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को धनु संक्रांति कहा जाता है, और इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण अवधि खरमास (मलमास) का आरंभ हो जाएगा।
यह वह समय होता है जब सूर्य देव धनु और बाद में मीन राशि में गोचर करते हैं, और इस अवधि के दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, व्रतबंध (यज्ञोपवीत संस्कार) और अन्य सभी प्रकार के मांगलिक एवं शुभ कार्यों को करना वर्जित माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यता है कि खरमास में किए गए शुभ कार्यों का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता, इसलिए गोदावरी आदि पवित्र नदियों में स्नान और अन्न-वस्त्र का दान इस अवधि में श्रेष्ठ बताया गया है, जो श्रेष्ठ फल प्रदान करता है।
द्वादशी तिथि के अधिष्ठाता देव स्वयं भगवान श्री हरि नारायण हैं, इसलिए आज का पूरा दिन उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है। भक्तों को इस दिन भगवान नारायण का पूजन अवश्य करना चाहिए। विशेष रूप से विष्णुसहस्रनाम जैसे स्तोत्रों का पाठ और उनके नाम का जप अत्यंत फलदायी होता है, जिसके प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में धन, यश और प्रतिष्ठा की सहज ही प्राप्ति होती है।
हालांकि, द्वादशी तिथि के कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक है। इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। साथ ही, द्वादशी तिथि को मसूर की दाल या मसूर से निर्मित किसी भी व्यंजन का सेवन करना या दान देना त्याज्य बताया गया है।
द्वादशी तिथि को शास्त्रों में 'यशोबली' (यश और प्रतिष्ठा प्रदान करने वाली) और 'सर्वसिद्धिकारी' (सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली) तिथि भी माना जाता है। मान्यता है कि इस तिथि पर भगवान नारायण का पूजन और नाम-जप करने से मनुष्य का कोई भी बिगड़ा हुआ काम भी आसानी से बन जाता है। इस तिथि को 'भद्रा' नाम से भी जाना जाता है, जिसके तहत शुक्ल पक्ष की द्वादशी शुभ फलदायिनी होती है, जबकि कृष्ण पक्ष (जैसा कि आज है) में यह अशुभ फलदायिनी मानी जाती है, इसलिए भक्तों को आज के दिन विशेष सावधानी और सतर्कता के साथ भगवान विष्णु की आराधना में लीन रहना चाहिए।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

