स्त्री, विलासिता और अवैध संबंध जीवन को कैसे भीतर ही भीतर खोखला कर देते

स्त्री, विलासिता और अवैध संबंध जीवन को कैसे भीतर ही भीतर खोखला कर देते

प्रेषित समय :19:05:13 PM / Thu, Dec 18th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

समाज में अक्सर यह चर्चा सतह पर नहीं आती, लेकिन इसके परिणाम हर दिन किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं। अचानक बिखरते परिवार, सम्मानित पदों से गिरते लोग, धन और प्रतिष्ठा के होते हुए भी मानसिक रूप से टूटे व्यक्ति—इन सबके पीछे कई बार एक साझा सूत्र छिपा होता है। स्त्री, विलासिता और अवैध संबंध। ये तीनों अपने आप में न तो अपराध हैं और न ही निषिद्ध, लेकिन जब ये संयम, मर्यादा और नैतिक विवेक से बाहर निकल जाते हैं, तब यही आकर्षण जीवन को धीरे-धीरे रसातल की ओर ले जाता है। भारतीय ज्योतिष और जीवन-दर्शन में यह माना गया है कि स्त्री-संग, भोग-विलास और अनैतिक संबंध, यदि संयम और मर्यादा से बाहर चले जाएँ, तो वे व्यक्ति के धन, स्वास्थ्य, मान-सम्मान और आयु तक को प्रभावित कर सकते हैं।विशेष रूप से कुछ राशियों और ग्रह-योगों में इन प्रवृत्तियों का प्रभाव अधिक घातक माना गया है।

नीचे उन राशियों और ग्रह-स्थितियों का उल्लेख है, जहाँ यह जोखिम अपेक्षाकृत अधिक देखा गया है

पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक मामले सामने आए हैं, जहाँ अत्यधिक भोग-विलास और गुप्त संबंधों ने न केवल व्यक्ति के निजी जीवन को बर्बाद किया, बल्कि उसकी सामाजिक छवि, करियर और कभी-कभी जीवन तक को संकट में डाल दिया। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब कामना और विलासिता नियंत्रण से बाहर होती है, तो व्यक्ति तर्क और विवेक खो देता है। वहीं ज्योतिष इसे ग्रहों की असंतुलित स्थिति से जोड़कर देखता है, जहाँ विशेष ग्रह व्यक्ति की इच्छाओं को विवेक पर हावी कर देते हैं।

ज्योतिष शास्त्र में वृश्चिक राशि को गुप्त प्रवृत्तियों, तीव्र वासनाओं और रहस्यमय आकर्षण से जोड़ा गया है। कहा जाता है कि यदि इस राशि में शुक्र, राहु या चंद्रमा पीड़ित हों, तो व्यक्ति ऐसे संबंधों की ओर खिंच सकता है, जिनका अंत अक्सर कष्टदायक होता है। ऐसे कई उदाहरण देखे गए हैं, जहाँ बाहर से शांत और सफल दिखने वाला व्यक्ति भीतर ही भीतर दोहरे जीवन के दबाव में टूटता चला गया। यही दबाव आगे चलकर रोग, बदनामी या कानूनी उलझनों का कारण बनता है।

मकर राशि से जुड़े मामलों में भी एक अलग तरह का विरोधाभास दिखाई देता है। अनुशासन, जिम्मेदारी और कर्मठता की प्रतीक इस राशि में जब विलासिता का प्रवेश असंतुलित रूप में होता है, तो पतन तेज़ी से होता है। विशेषकर तब, जब शनि कमजोर स्थिति में हो और शुक्र या राहु का प्रभाव बढ़ जाए। समाज में कई प्रतिष्ठित पदों पर बैठे लोगों के पतन की कहानियाँ इसी विरोधाभास को उजागर करती हैं—बाहरी कठोरता और भीतर अनियंत्रित आकर्षण।

तुला राशि, जिसे संतुलन और सौंदर्य की राशि कहा जाता है, अपने आप में एक चेतावनी भी समेटे हुए है। जब इसका स्वामी शुक्र कमजोर हो या राहु-केतु के प्रभाव में आ जाए, तो संतुलन बिगड़ने लगता है। भोग-विलास, फैशन, संबंध और आकर्षण जीवन के केंद्र में आ जाते हैं और कर्तव्य पीछे छूटने लगते हैं। कई बार व्यक्ति को तब तक अपनी गलती का एहसास नहीं होता, जब तक मान-सम्मान और आर्थिक स्थिति पर आंच नहीं आ जाती।

अग्नि तत्व की राशियाँ—मेष और सिंह—में समस्या का स्वरूप कुछ अलग होता है। यहाँ आवेग, अहंकार और शीघ्र निर्णय बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब कामुकता और अधिकार भाव मिलते हैं, तो गलत संबंध केवल व्यक्तिगत नहीं रहते, वे टकराव और संघर्ष का कारण भी बनते हैं। पारिवारिक कलह, हिंसा, मुकदमे और सामाजिक टकराव के पीछे ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जहाँ एक गलत निर्णय ने पूरे जीवन की दिशा बदल दी।

ग्रह योगों की बात करें तो शुक्र और राहु का संयोग ज्योतिष में सबसे अधिक विवादास्पद माना जाता है। यह योग व्यक्ति को आकर्षण, विलासिता और वर्जित संबंधों की ओर तेजी से खींचता है। चंद्रमा और राहु का योग मानसिक भ्रम और अस्थिरता पैदा करता है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को सही ठहराते हुए गलत रास्तों पर आगे बढ़ता चला जाता है। जब ऐसे ग्रह छठे, आठवें या बारहवें भाव से जुड़े हों, तो परिणाम केवल मानसिक नहीं रहते, वे शारीरिक रोग, आर्थिक हानि और सामाजिक अपमान के रूप में सामने आते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ज्योतिष इन प्रभावों को अपरिवर्तनीय नहीं मानता। यह चेतावनी देता है, भय नहीं। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि ग्रह प्रवृत्ति बताते हैं, निर्णय नहीं लेते। निर्णय मनुष्य स्वयं करता है। संयम, नैतिकता और आत्मनियंत्रण के साथ यदि व्यक्ति अपने जीवन को संचालित करे, तो सबसे कठिन ग्रह योग भी निष्प्रभावी हो सकते हैं। इसी कारण परंपरा में ब्रह्मचर्य, मर्यादा और साधना को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक उपाय के रूप में देखा गया है।

समाजशास्त्री भी मानते हैं कि आज के डिजिटल और उपभोक्तावादी दौर में विलासिता की परिभाषा बदल चुकी है। जो पहले वर्जित था, वह अब सामान्य बताया जाता है। ऐसे में व्यक्ति के भीतर का विवेक और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जब सामाजिक स्वीकृति और आंतरिक नैतिकता के बीच संतुलन टूटता है, तब पतन की प्रक्रिया शुरू होती है, चाहे वह किसी भी वर्ग या पद का व्यक्ति क्यों न हो।

यही कारण है कि ज्योतिषीय उपायों के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव पर ज़ोर दिया जाता है। अश्लीलता से दूरी, सच्चे संबंधों की ओर झुकाव, और आत्मसंयम—ये उपाय केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक माने जाते हैं। शुक्र से जुड़े मंत्र और साधनाएँ प्रतीक हैं उस प्रयास की, जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नकारता नहीं, बल्कि उन्हें संतुलित करता है।

अंततः यह प्रश्न केवल ग्रहों या राशियों का नहीं, बल्कि चेतना का है। स्त्री, विलासिता और संबंध—तीनों जीवन को सुंदर भी बना सकते हैं और विनाश का कारण भी। फर्क केवल इतना है कि इन्हें कैसे जिया जाता है। इतिहास और वर्तमान, दोनों गवाह हैं कि जब आकर्षण मर्यादा से बाहर गया, तो पतन निश्चित हुआ। और जब संयम के साथ इनका सम्मान किया गया, तो वही जीवन शक्ति और प्रेरणा का स्रोत बने। यही चेतावनी, यही सीख, आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।

*पंडित चंद्रशेखर नेमा हिमांशु*(9893280184)

मां कामख्या साधक जन्मकुंडली विशेषज्ञ वास्तु शास्त्री

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-