भोपाल. मध्य प्रदेश के सतना ज़िले से सामने आया HIV–थैलेसीमिया मामला केवल एक मेडिकल लापरवाही की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करता है, जो जीवन रक्षक मानी जाने वाली रक्त आधान प्रक्रिया की निगरानी के लिए बनाया गया है. राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट ने जो तथ्य उजागर किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं और आम जनता की चिंता को और गहरा कर देते हैं. पांच मासूम बच्चे, जो पहले से ही थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, नियमित रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया के दौरान HIV संक्रमित पाए गए. यह सवाल अब पूरे प्रदेश में गूंज रहा है कि आखिर ऐसी चूक कैसे संभव हुई.
जांच रिपोर्ट के अनुसार, सतना जिला अस्पताल के अंतर्गत संचालित ब्लड सेंटर में नियमों और मानकों का खुला उल्लंघन हुआ. रक्तदाताओं के रिकॉर्ड को लेकर भारी अनियमितताएं पाई गईं. कई मामलों में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि रक्त किससे लिया गया, कब लिया गया और किन जरूरी जांच प्रक्रियाओं से उसे गुजारा गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ यूनिट्स में HIV परीक्षण या तो ठीक से किया ही नहीं गया या फिर परीक्षण प्रक्रिया अधूरी और संदिग्ध रही. यह तथ्य उस दावे को भी कमजोर करता है, जिसमें आम तौर पर कहा जाता है कि सरकारी ब्लड बैंकों में सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन होता है.
जांच टीम ने यह भी पाया कि ब्लड सेंटर में उपलब्ध रजिस्टर और डिजिटल रिकॉर्ड आपस में मेल नहीं खाते. कई एंट्रियां अधूरी थीं, कुछ में तारीखें गायब थीं और कुछ मामलों में दाताओं की पहचान ही दर्ज नहीं थी. विशेषज्ञों का कहना है कि रक्त आधान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में रिकॉर्ड का यह हाल किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है. थैलेसीमिया के मरीजों को जीवन भर नियमित रक्त की जरूरत होती है, और ऐसे में थोड़ी सी भी लापरवाही उनके जीवन को गंभीर खतरे में डाल सकती है.
प्रारंभिक रिपोर्ट में यह संकेत भी मिले हैं कि ब्लड सेंटर में कार्यरत स्टाफ को लेकर प्रशिक्षण और निगरानी की भारी कमी थी. मानक संचालन प्रक्रिया के तहत हर रक्त यूनिट की तीन स्तरों पर जांच जरूरी होती है, लेकिन जांच में सामने आया कि कई बार यह प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित रह गई. कुछ टेस्ट रिपोर्ट्स बिना स्पष्ट हस्ताक्षर और तारीख के पाई गईं, जिससे यह संदेह और गहरा गया कि क्या वास्तव में जांच की गई थी या नहीं.
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा झकझोरने वाला पहलू पीड़ित परिवारों की पीड़ा है. जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को बचाने के लिए हर महीने अस्पताल के चक्कर लगाए, उन्हें यह भरोसा था कि सरकारी व्यवस्था कम से कम सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराएगी. लेकिन जांच के खुलासों के बाद उनका भरोसा टूटता नजर आ रहा है. कई परिवारों का कहना है कि उन्हें समय पर पूरी जानकारी नहीं दी गई और जब बच्चों में HIV की पुष्टि हुई, तब भी अस्पताल प्रशासन ने शुरुआत में इसे तकनीकी गलती बताकर टालने की कोशिश की.
राज्य सरकार ने जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के संकेत दिए हैं. स्वास्थ्य विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि यह केवल एक अस्पताल या एक ब्लड सेंटर की समस्या नहीं हो सकती, बल्कि पूरे राज्य में ब्लड बैंकों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की जरूरत है. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अंतिम रिपोर्ट के आधार पर सख्त कदम उठाए जाएंगे और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला देशभर के लिए चेतावनी है. HIV जैसी गंभीर बीमारी का संक्रमण रक्त आधान के जरिए होना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं निगरानी तंत्र में बड़ी खामियां हैं. यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो ऐसे मामले दोबारा सामने आ सकते हैं. विशेषज्ञ यह भी मांग कर रहे हैं कि ब्लड बैंकों की नियमित स्वतंत्र ऑडिटिंग हो और तकनीक का अधिकतम इस्तेमाल कर हर रक्त यूनिट को ट्रैक किया जाए.
फिलहाल जांच टीम की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन प्रारंभिक निष्कर्षों ने यह साफ कर दिया है कि सतना का यह मामला महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है. सवाल यह भी है कि क्या यह लापरवाही केवल यहीं तक सीमित है या फिर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की खामियां छिपी हुई हैं. आम जनता की नजर अब सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी है, क्योंकि यह मामला सिर्फ पांच बच्चों का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसे का है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

